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इस्लामिक बैंकिंग से कौन डरता है


लेखक: सुहेल वहीद, जर्मन रेडियो डाउचे वैले


अर्थथास्त्रियों के अनुमानों को सही माना जाए तो अगले पांच बरसों में दुनिया का इकॉनमिक सिस्टम इस्लामी और गैर इस्लामी में पूरी तरह बंट जाएगा। इस्लामी बैंकिंग का सिर्फ तेजी से विस्तार हो रहा है, बल्कि उसे गैर मुस्लिमों का समर्थन भी बढ़ता जा रहा है। आज जब इस्लामी कट्टरता ने बहुत से लोगों की नींद उड़ा रखी है, तो यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या इस्लामी बैंकिंग किसी खतरे को जन्म देगी? इस बारे में कोई अंदाजा लगाना और इस्लामी बैंकिंग को इस्लामी जेहाद से जोड़ना गलत होगा, लेकिन तो भी इस परिघटना के असर दुनिया के भावी स्वरूप पर बेहद गहरे पड़ेंगे, जिनका आकलन अभी होना बाकी है। अर्थ पर धर्म का असर पहले भी रहा है, लेकिन यह पहली बार है, जब ग्लोबल पैमाने पर एक मजहबी वित्तीय सिस्टम विकल्प के तौर पर उभर रहा है। पूंजीवादी अर्थशास्त्र से इसकी जबर्दस्त टक्कर होगी और नतीजे चौंकाने वाले होंगे।


फिलहाल तो इस्लामी बैंकिंग एक बड़ी लहर की तरह उठ रहा है। अमेरिका और यूरोप के लगभग सभी बैंक और वित्तीय संस्थान इसे अपना रहे हैं। भारत में भी इसकी शुरुआत हो गई है। दिल्ली की एक एसेट मैनेजमेंट कम्पनी ने सेबी से इस्लामी म्यूचुअल फंड लॉन्च करने के लिए संपर्क किया है। इस कम्पनी का दावा है कि मुसलमानों से ज्यादा गैर मुसलमानों में यह फंड पॉपुलर होगा। यह कम्पनी उन्हीं धंधों में पैसा निवेश करेगी, जिनकी शरीयत में इजाजत दी गई है। कम्पनी के मुताबिक बीएसई-100 में 71 और बीएसई-500 में 366 शेयर ऐसे हैं जो इस्लामी बैंकिंग में बताए गए कायदों पर खरे उतरते हैं। इस्लामी बैंकिंग को लेकर अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, यूरोप के कुछ देशों और थाइलैंड में भी उत्साह है। ब्याज रहित लोन तो सभी के लिए सबसे बड़ा आकर्षण है। कुवैत में एक मलयेशियाई बैंक में 40 फीसदी जमाकर्ता और 60 फीसदी कर्ज लेने वाले गैर मुस्लिम हैं।


दरअसल हुआ यह है कि 9/11 के बाद से मिडल ईस्ट के सभी मुस्लिम देशों ने अमेरिका ओर यूरोप के बैंकों में अपना पैसा जमा करना लगभग बंद कर दिया। यही नहीं, अमेरिका और यूरोप के बैंकों से मुस्लिम देशों की लगभग 800 अरब डॉलर की रकम निकाल ली गई। तेल के लगातार बढ़ते दामों से मिडल ईस्ट के खजाने भरते जा रहे हैं। अब मुस्लिम देशों ने अपनी रकम अपनी पहुंच के देशों यानी मुस्लिम देशों में ही जमा करनी शुरू कर दी है। इसी का नतीजा है कि हर साल दस फीसदी की दर से बढ़ते करीब पांच सौ अरब डॉलर के एसेट्स के साथ तीन सौ से ज्यादा इस्लामी वित्तीय संस्थान पनप चुके हैं।


इस्लामी बैंकिंग और गैर इस्लामी बैंकिंग में बुनियादी फर्क यह है कि इस्लामी वित्तीय संस्थान अपना पैसा ऐसी किसी फर्म में नहीं लगाते, जो अल्कोहल, जुआ, तम्बाकू, हथियार, सूअर या पोर्नोग्राफी का कारोबार करती हों। इसके अलावा ब्याज रहित कारोबार उसका सबसे बड़ा आकर्षण है ही। इस्लामी वित्तीय व्यवस्था में बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वे 'फंड मैनेजमेन्ट कंसेप्ट' के जरिए धन जमा करें, पैसे पर ब्याज बटोर कर नहीं। मसलन, चार साल तक कुछ लोगों का पैसा एक पूल में जमा किया जाए, उससे कोई निर्माण किया जाए, फिर उस प्रॉपर्टी को बेचकर पैसा सभी जमाकर्ताओं में बांट दिया जाए। जाहिर है यह काम बैंक का नहीं कारोबारी का है, बैंक उन्हें बिना व्याज कर्ज देता है, पूरा मुनाफा लेता है, बिल्डर्स को मेहनताना देता है।


ब्याज को बाइबल ने भी प्रतिबंधित किया है। अरस्तू ने ब्याज की निंदा की थी। रोमन साम्राज्य ने ब्याज को सीमित किया था। शुरुआत में कई ईसाई राज्यों ने ब्याज पर पाबंदी लगाई थी। लेकिन 1875 में जब मिस विदेशी कर्ज के बोझ से दब गया तो इसी का फायदा ब्रिटेन ने उठाया। उसने मिस पर कब्जा कर लिया और स्वेज कैनाल में लगे उसके शेयर हथिया लिए। इस घटना से पूरी इस्लामी दुनिया में कोहराम मच गया। मुस्लिम देशों के लिए यह वह मोड़ था जिसने ब्याज रहित इस्लामी बैंकिंग को लगभग ध्वस्त कर दिया। पूरी दुनिया में ब्याज सिस्टम ने अपनी जड़ें जमा लीं।


लेकिन अब वक्त पलट रहा है। विश्व पूंजीवाद के लीडर अमेरिका की ताकत घट रही है। 9/11 के बाद से उसकी लगातार गिरती इकॉनमी को बड़ा झटका इस साल तब लगा जब सब प्राइम संकट से उसका हाउसिंग मार्केट धराशायी हो गया। ऐसे में अमेरिका और यूरोप के अग्रणी वित्तीय संस्थानों ने हवा के रुख के साथ चलने का फैसला किया। बदलते अर्थतंत्र में अपनी जगह सभी को बचानी है। मुस्लिम देशों के पैसे से अमेरिका धीरे-धीरे महरूम हो रहा है। उसके पास और विकल्प ही क्या बचता है कि वह उन्हीं के तौर-तरीकों को अपनाए। यह बात यूरोप पर भी लागू होती है। इसीलिए इन लोगों ने इस्लामी बैंकिंग को फिलहाल मुनाफे का काम मानकर इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। इसीलिए सिटी बैंक ग्रुप ने बाकायदा एक अलग विभाग 'इस्लामिक बैंकिंग इन एशिया फॉर सिटीग्रुप' बना दिया है। सबसे पहले सिटी गुप की इसी ब्रांच ने प्राइवेट इक्विटी को इस्लामी कंसेप्ट बताया और पूरी दुनिया के इस्लामी देशों में अपना कारोबार बढ़ा लिया। सिटी बैंक ग्रुप और एचएसबीसी के बोर्ड में इस्लामी बैंकिंग के जानकारों को शामिल किया जा रहा है। लंदन, तोक्यो और हांगकांग के संस्थान भी इस्लामी बैंकिंग अपनाने को मजबूर दिख रहे हैं। मलयेशिया और कुवैत के अलावा अब तुर्की भी इस्लामी बैंकिंग के अग्रणी देशों में शुमार हो रहा है। माना जा रहा है कि जल्दी ही ऑस्ट्रेलिया, चीन सेंट्रल एशिया के देशों में भी इस्लामी बैंकिंग का विस्तार हो जाएगा।


इस्लामी बैंकिंग को मजबूत आधार देने के लिए मलयेशिया में काफी बड़े पैमाने पर काम हो रहा है। इसके लिए स्कॉलरशिप और ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं। मलयेशिया में 1962 में ही आधुनिक इस्लामी बैंक की स्थापना हो गई थी। बाद में मलयेशिया सरकार ने पूरे देश में इस्लामी बैंक खोले। सन् 2001 में सरकार ने टैक्स छूट देने की स्कीम शुरू की। इसका मकसद 2010 तक देश के कुल एसटे्स के कम से कम पांचवें हिस्से को इस्लामी वित्त व्यवस्था का अंग बनाना है। इस साल सऊदी अरब के नैशनल कमर्शल बैंक ने तूनीशिया और मोरक्को में अपनी इस्लामी बैंकिंग की शुरुआत कर दी। 


साभार: नवभारत टाइम्स


पादरी राकेश चार्ली साहब से बातचीत

मुकेश लॉरेंस से मेरी मुलाक़ात महज़ एक इत्तेफ़ाक़ थी। वह एक कम्प्यूटर कम्पोज़िंग के बाद अपने काम का प्रूफ़ निकलवा रहे थे और मुझे भी एक फ़ोटो अपनी कार्ड ड्राइव से डेवलप कराना था। मैंने उनसे चंद मिनटों के लिए उनका काम रोकने की इजाज़त मांगी तो वे खुशदिली का इज़्हार करते हुए फ़ौरन तैयार हो गए। इसी दरम्यान मेरी उनसे बहुत मुख्तसर सी बातचीत हुई। उन्होंने मेरा मोबाईल नम्बर ले लिया। उन्होंने मुझे उर्दू के बेहतरीन शेर भी सुनाए, जिन्हें किसी और मौक़े पर शायद लिख भी दिया जाए। मुकेश लॉरेंस एक बेहद नर्म मिज़ाज और मिलनसार आदमी हैं और एक अच्छे प्रचारक भी।

मेरी उनसे मुलाक़ात 28 अगस्त 2010 को दिन में हुई, शाम को ही उनका फ़ोन आ गया कि अगर मैं उन्हें वक्त दे सकूं तो वे पादरी साहब को लेकर मेरे घर आना चाहते हैं। मैंने कहा कि मुझे बेहद खुशी होगी, आप रोज़ा इफ़तार हमारे साथ करना चाहें तो इफ्तार के वक्त तशरीफ़ ले आयें वर्ना उसके थोड़ी देर बाद। उन्होंने इफ़तार के बाद साढ़े सात बजे आने के लिये कहा और वे दोनों अपने अपने दुपहिया वाहनों के ज़रिये 7.35 बजे शाम आ भी गये।

मैंने अपने बेटे अनस ख़ान को हिदायत की थी कि बेटे आज खुदा की मुक़द्दस किताब का इल्म रखने वाले दो लोग हमारे घर आ रहे हैं लिहाज़ा जब हमारी गुफ़तगू हो तो आप हमारे पास ही रहना और हमारी बात सुनना।

पादरी व्यवस्था के बजाय मौजज़े पर बल क्यों देते हैं?
मुकेश लॉरेंस साहब ने पादरी साहब का नाम राकेश चार्ली बताया। वे मैथोडिस्ट चर्च से जुड़े हुए हैं। पादरी साहब जिस्म में थोड़ा हल्के से और उम्र में मुझसे कम थे। उनके अंदर भी मैंने नर्मी देखी। मैंने उन्हें बाइबिल और नया नियम की प्रतियां दिखाईं। नया नियम को तो मैं पिछले 27 सालों से पढ़ता आ रहा हूं। उन्होंने मुझसे कहा कि वे मुझे अगली मुलाक़ात में नया नियम की उर्दू प्रति देंगे।

मेरी कुछ शुरूआती बात सुनने के बाद वे बोले कि आदमी जब तक मौज्ज़े के ज़रिये ईमान का निजि अनुभव नहीं कर लेता, तब तक वह ईमान को वास्तव में नहीं समझ सकता।
सवाल का संतोषजनक जवाब देना ही ईसा अ. का मार्ग है

मैंने अर्ज़ किया-‘देखिये, हरेक का निजी अनुभव अलग हो सकता है। मेरा निजी अनुभव कुछ और हो सकता है और आपका निजी अनुभव कुछ और हो सकता है। इसलिए मेरा निजी अनुभव आपके लिए और आपका निजी अनुभव मेरे लिए दलील नहीं बन सकता। हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम के पास जब कभी यहूदी, फ़रीसी या सदूक़ी कोई भी सवाल लेकर आये तो उन्होंने हमेशा उन्हें ऐसे जवाब दिए जिससे उनकी बुद्धि संतुष्ट हो गई या फिर वे निरूत्तर हो गये। उन्होंने कभी किसी से यह नहीं कहा कि आप किसी चमत्कार या निजी अनुभव के द्वारा सच्चाई को पाने की कोशिश कीजिये।

चमत्कार तो शैतान भी दिखा सकता है लेकिन वह ईश्वरीय व्यवस्था पर नहीं चल सकता

चमत्कार तो लोगों ने मसीह के ज़रिये भी होते देखे और एंटी-क्राइस्ट के ज़रिये भी होते देखेंगे और न्याय दिवस के दिन कुछ ऐसे लोग भी मसीह को हे प्रभु , हे प्रभु कहते हुए उनके पास मदद पाने के लिए पहुंचेंगे जिन्होंने दुनिया में उनके नाम से लोगों को दुष्टात्माओं को निकाला होगा और अजनबी भाषाओं में कलाम किया होगा लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर भगा देंगे और कहेंगे कि हे पापियों मैंने तो तुम्हें कभी जाना ही नहीं। इसलिए सिर्फ़ चमत्कार ही पैमाना नहीं बन सकता बल्कि उसके साथ यह भी देखा जायेगा कि चमत्कार दिखाने वाला मसीह की तरह शरीअत का पाबंद है या नहीं। एंटी- क्राइस्ट शरीअत का पाबंद नहीं होगा यही उसकी सबसे बड़ी पहचान होगी।

इंजील के हुक्म को न मानने वाले ईसाई कैसे हो सकते हैं ?
मैं इंजील और मसीह में आस्था रखता हूं और आप भी। मैं कुरआन और हज़रत मुहम्मद स. में आस्था रखता हूं लेकिन आप नहीं रखते। सो हमारे आपके दरम्यान इंजील और मसीह कॉमन ग्राउंड है। इसलिए हम दोनों के लिए इंजील और मसीह अलैहिस्सलाम दलील बनेंगे। इनसे न तो मैं भाग सकता हूं और न ही आपको इनसे हटने की इजाज़त दूंगा।‘

पादरी साहब ने माना कि आपकी बात सही है। मसीह के आने का मक़सद था व्यवस्था को पूरा करना, उस पर खुद चलना और लोगों को चलने की हिदायत करना

मैंने कहा-‘हम पाबंद हैं मसीह के क़ौल के,  न कि उनके बाद के सेंट पॉल आदि आदमियों के। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कहते हैं कि ‘यह न समझो कि मैं धर्म-व्यवस्था या नबियों की शिक्षाओं को मिटाने आया हूं। मैं उनको मिटाने नहीं, परन्तु पूरा करने आया हूं। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएं तब तक धर्म-व्यवस्था से एक मात्रा या एक बिन्दु भी बिना पूरा हुए नहीं टलेगा। इसलिए जो मनुष्य इन छोटी सी छोटी आज्ञाओं में से किसी एक को तोड़ेगा और वैसा ही लोगों को सिखाएगा कि वे भी तोड़ें तो वह स्वर्ग के राज्य में सबसे छोटा कहलाएगा। परन्तु जो उन आज्ञाओं का पालन करेगा और दूसरों को उनका पालन करना सिखाएगा, वही स्वर्ग के राज्य में महान कहलाएगा।‘ (मत्ती, 5, 17-20)

अब आप बताईये कि सेंट पॉल ने किस अधिकार से शरीअत मंसूख़ कर दी ? वे कहते हैं कि ‘यीशु ने अपने शरीर में बैर अर्थात व्यवस्था को उसकी आज्ञाओं तथा नियमों के साथ मिटा दिया। (इफिसियों, 2, 15)

यूहन्ना के चेलों ने जब मसीह से उनके साथियों के रोज़ा न रखने की वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि ‘वे दिन आएंगे जब दूल्हा उनसे अलग कर किया जाएगा। उस समय वे उपवास करेंगे।‘ (मत्ती, 9, 15)
उन्होंने यह तो कहा कि वे अभी रोज़ा नहीं रख रहे हैं लेकिन कहा कि वे कुछ समय बाद रखेंगे। अस्ल बात यह थी कि मसीह धर्म प्रचार के लिए लगातार सफ़र करते रहे और मुसाफ़िर को इजाज़त होती है कि वह बाद में रोज़े रख ले। उन्होंने हमेशा शरीअत की पाबंदी की बात की और कहीं भी उसे ख़त्म नहीं किया। सेंट पॉल ने शरीअत माफ़ कर दी ताकि रोमी और अन्य जातियां मसीह पर ईमान ला सकें। उन्होंने चाहे कितनी ही नेक नीयती से यह काम किया हो लेकिन उन्हें ऐसा करने का कोई अधिकार ही नहीं था।

मुसलमानों से सीखने की ज़रूरत है
आप देखते हैं कि हिंदुस्तान में कुछ लोग मुसलमानों द्वारा दी जाने वाली कुरबानी पर ऐतराज़ जताते हैं लेकिन मुसलमानों ने कभी उन्हें रिझाने की ग़र्ज़ से शरीअत को निरस्त घोषित नहीं किया। उनसे कहा जायेगा कि यह शरीअत ऐसी ही ठीक है आपका दिल चाहे कुबूल करके नजात पायें और आप इन्कार करना चाहें तो आपकी मर्ज़ी। पॉल को भी यही करना चाहिये था।

शरीअत कैंसिल करने के बाद फिर आप क्यों कहते हैं कि औरत चर्च में अपना सिर ढके ? यह हुक्म तो शरीअत का है और शरीअत को आप कैंसिल ठहरा चुके हैं।

जीवन को व्यवस्थित करने के लिए व्यवस्था ज़रूरी है
आदमी को जीने के लिये क़ानून दरकार है। उसे जायदाद का बंटवारा भी करना होता है और शादी-ब्याह और दूसरे सामाजिक मामले भी होते हैं। जब आपने शरीअत को कैंसिल कर दिया तो फिर आपने नेता चुने, उन्होंने आपके लिए क़ानून बनाये और आपने उन्हें माना। मैं पूछता हूं कि जब आपको क़ानून की ज़रूरत भी थी और आपको उसे मानना भी था तो फिर जो क़ानून खुदा ने मूसा को दिया था उसे मानते लेकिन आपने उसे छोड़ा और दुनिया के क़ानून को माना। आपने ऐसा क्यों किया ?

बाइबिल को एक से दो बना डाला
प्रोटैस्टेंट ने किस अधिकार से 7 किताबें जाली घोषित करके उन्हें बाइबिल से बाहर निकाल दिया ?
और फिर हर बीस साल बाद आप एक नया एडीशन ले आते हैं जिसमें हर बार पिछली बाइबिल के मुक़ाबले आयतें कम या ज़्यादा करते रहते हैं , ऐसा क्यों ? आज चर्च की हालत यह हो रही है कि हम आये दिन अख़बारों में पढ़ते रहते हैं कि चर्च में समलैंगिक जोड़ों की शादियां कराई जा रही हैं। जबकि नबी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम के ज़माने में समलैंगिकों पर खुदा का अज़ाब नाज़िल हुआ था।

पादरी साहब ने हामी भरी और मुकेश लॉरेंस भी पूरी दिलचस्पी से सुन रहे थे।

चर्च की धार्मिक रस्मों में शराब का प्रयोग क्यों?

मैंने कहा-‘आज चर्च में धार्मिक रस्म के तौर पर शराब पिलाई जा रही है। हज़रत मसीह पाक हैं और शराब नापाक। क्या कभी कोई नबी लोगों को शराब पिलाएगा ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘

मैंने कहा-‘इंजील में हज़रत मसीह का एक चमत्कार लिखा है कि उन्होंने पानी को दाखरस बना दिया। मैंने कहा हो सकता कि दाखरस उस समय कोई शरबत वग़ैरह हो जिसे आज शराब समझ लिया गया हो ?
दाखरस ‘शराब‘ ही होता है
पादरी साहब बोले-‘लोग समझते हैं कि चर्च में वाइन पिलाई जाती है ऐसा नहीं है। दाखरस अंगूर का रस होता है। चर्च में वही रस पिलाया जाता है।
मैंने कहा-‘क्या उस रस में फ़र्मंटेशन होता है ?‘
उन्होंने कहा-‘हां‘
मैंने कहा-‘फ़र्मंटेशन के बाद रस से दो ही चीज़ें बनती हैं। एक एसीटिक एसिड यानि सिरका और दूसरे अल्कोहल यानि शराब। अब बताईये कि क्या वह रस सिरका होता है ?‘
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब वह दाखरस शराब ही होता है। किसी इबादतख़ाने में धर्म के नाम पर धार्मिक लोगों को शराब पिलाई जाये, इससे बड़ा अधर्म भला क्या होगा ?‘
पादरी साहब चुप रहे।
हज़रत मसीह ने जिसे हराम ठहराया उसे भी हलाल कैसे ठहरा लिया ?
मैंने कहा-‘यही हाल आपने खाने-पीने में हलाल-हराम का किया। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम एक बार बिना हाथ धोये खाना खाने लगे। यहूदियों ने ऐतराज़ किया कि आप बिना हाथ धोये खाते हैं ? तब उन्होंने जवाब दिया कि जो चीज़ बाहर से अन्दर जाती है वह नापाक नहीं करती बल्कि जो चीज़ अन्दर से बाहर आती है वह इनसान को नापाक करती है।‘
उनकी बात सही थी। हाथ की धूल इनसान की दिल को नापाक नहीं करती बल्कि दिल की नापाकी और गुनाह का बोल इनसान को नापाक कर देता है। इससे नसीहत यह मिलती है कि इनसान को गुनाह की बातें ज़बान से नहीं निकालनी चाहिये और अपने दिल को पाक रखना चाहिये। अगर सफ़र में कहीं बिना हाथ धोये खाना पड़ जाये तो दीन में इसकी इजाज़त है।
‘जो बाहर से अन्दर जाता है वह नापाक नहीं करता‘ इस उसूल को इतना एक्सपैंड क्यों कर लिया कि सुअर और हराम जानवर खाना भी जायज़ कर बैठे ? हराम-हलाल की जानकारी देने के लिए मसीह ने यह बात नहीं कही थी। हराम-हलाल जानना था तो शरीअत से मालूम करते, जिसकी पाबंदी मसीह ने जीवन भर की, उनकी मां ने की। क्या कभी मसीह अलैहिस्सलाम ने सुअर खाया ?
पादरी साहब बोले-‘नहीं‘
मैंने कहा-‘तब आप सुअर खाना कहां से जायज़ कर बैठे ?‘
वे चुप रहे।
हज़रत ईसा अ. की जान के दुश्मन यहूदियों की साज़िशें
मैंने कहा-‘हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम प्रतीकात्मक भाषा बोलते थे और दृष्टांत देते थे क्योंकि यहूदी हमेशा उनकी घात में रहते थे कि उनके मुंह से कोई बात पकड़ें और उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सज़ा दिलायें। यहूदियों ने धर्म को व्यापार बना दिया था। इबादतख़ानों को तिजारत की मंडी बनाकर रख दिया था। मसीह ने उनकी चैकियां इबादतख़ानों में ही उलट दी थीं और उन्हें धिक्कारा था। (मरकुस, 11, 15)

मसीह की मौजूदगी उनकी नक़ली दीनदारी की पोल खोल रही थी और उनके लिए अपनी चैधराहट क़ायम रखना मुश्किल हो रहा था। इसीलिए एक बार वे एक व्यभिचारिणी औरत को पकड़कर मसीह के पास लाये कि इसे क्या सज़ा दी जाये ? ताकि अगर मसीह शरीअत के मुताबिक़ सज़ा सुनाये तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके उन्हें सज़ा दिलायें और अगर वे उसे माफ़ कर दें तो उन्हें नबियों की शरीअत मिटाने वाला कहकर पब्लिक में उन्हें मशहूर करें।

हज़रत मसीह अ. ने ऐसी बात कही कि यहूदियों की सारी साज़िश ही फ़ेल हो गई। उन्होंने कहा कि ‘तुम में जो निष्पाप हो, वही पुरूष सबसे पहिले इसको पत्थर मारे।‘ (यूहन्ना, 8, 8)

यह सुनकर किसी ने उस औरत को पत्थर न मारा। इस मौक़े पर भी मसीह अलैहिस्सलाम ने यहूदी चैधरियों और उनके पिछलग्गुओं को आईना दिखा दिया और ऐलानिया उन्हें गुनाहगार ठहरा दिया।
मसीह की हिकमत के सामने निरूत्तर हो गये साज़िश करने वाले
ऐसे ही एक बार उनसे साज़िशन पूछा गया कि क़ैसर को कर देना कैसा है ? ताकि अगर वे शरीअत के मुताबिक़ क़ैसर को कर देने से मना करें तो वे उन्हें क़ैसर का बाग़ी घोषित करके सैनिकों के हवाले कर सकें और अगर वे कर देने के लिये कहें तो वे उन्हें शरीअत के खि़लाफ़ अमल करने वाला ठहरा सकें।
इस बार भी इन दुष्टों को मुंह की खानी पड़ी। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने उनसे एक सिक्का लेकर पूछा कि ‘यह मूर्ति और नाम किसका है ?
उन्होंने कहा-‘कै़सर का।‘
तब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम बोले कि‘ जो क़ैसर है वह क़ैसर को दो और जो खुदा का है वह खुदा को दो।‘ (मरकुस, 12, 16 व 17)
मसीह की तरह उनका कलाम भी बुलंद है उनके कलाम को उनके शिष्य ही नहीं समझ पाते थे
हज़रत मसीह का कलाम बहुत बुलंद है, इतना ज़्यादा बुलंद कि बहुत बार उनके साथ रहने वाले वे लोग भी उनके कहने की मुराद नहीं समझ पाते थे जिन्हें कि ख़ास तौर पह खुदा की तरफ़ से आसमानी बादशाहत के रहस्यों की समझ दी गयी थी, और एक वजह यह भी थी कि वे सभी आम समाज से आये थे।
‘उन बारहों को यीशु की एक भी बात समझ में नहीं आई। यीशु की बात का अर्थ उनसे छिपा रहा। जो कहा गया था, वह उनकी समझ में न आया।‘ (लूका, 18, 34)
हज़रत ईसा मसीह अलैहिस्सलाम की बातों में छिपी चेतावनियों को यहूदी आलिम बखूबी समझते थे क्योंकि वे नबियों की किताबें पढ़ने की वजह से नबियों के अन्दाज़े-कलाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ थे लेकिन मसीह के प्रेरितों की समझ उस दर्जे की न थी। यही वजह है कि प्रेरितों को अक्सर मसीह से पूछना पड़ा कि हे गुरू आपके कहने का तात्पर्य क्या है ?
जब मसीह ने खुदा के कलाम को बीज की मिसाल देकर समझाया तब भी प्रेरितों को उनसे पूछना पड़ा कि वे कहना क्या चाहते हैं ? (मरकुस, 4, 10-12)
परमेश्वर को ‘पिता‘ कहने का वास्तविक अर्थ
मसीह ने खुदा को पिता कहकर पुकारा क्योंकि इस्राइली जाति में आने वाले नबी खुदा को अलंकारिक रूप से बाप कहकर संबोधित करते आये थे। उन्हीं नबियों की तरह मसीह ने भी खुदा को पिता कहा लेकिन लोगों ने अलंकार को यथार्थ समझ लिया और मसीह को खुदा को ऐसा ही बेटा ठहरा दिया जैसा कि आम इनसानों में बाप-बेटे का रिश्ता होता है। मसीह ने खुद को आदम का बेटा भी कहा है। यहां वे यथार्थ ही कह रहे हैं। मसीह को इंजील में पवित्रात्मा का बेटा, दाऊद का बेटा और यूसुफ़ बढ़ई का बेटा भी कहा गया है। यूसुफ़ को उनकी परवरिश करने की वजह से उनका बाप कहा गया है, दाऊद के वंश से होने के कारण दाऊद को उनका बाप कहा गया और पवित्रात्मा ने मसीह को अपना पु़त्र उनकी रूहानी खूबियों की वजह से कहा।
पवित्र इंजील में पांच लोगों के साथ उनके बाप-बेटे के रिश्ते का ज़िक्र आया है। हमें हरेक जगह उसकी सही मुराद को समझना पड़ेगा, अगर हम सत्य को पाना चाहते हैं तो, वर्ना अगर हम हरेक जगह बाप शब्द का एक ही अर्थ समझते गये तो फिर हम सच नहीं जान पाएंगे।
परमेश्वर के लिए पिता शब्द कहना अलंकार मात्र है, उसे लिटेरल सेंस में लेना ऐसी ग़लती है जिसकी वजह से ईसा मसीह को पहले खुदा का बेटा मान लिया गया और फिर उन्हें खुदा ही मान लिया गया। उन्हीं से दुआएं मांगी जाने लगीं जबकि वे खुद ज़िन्दगी भर खुदा से दुआएं मांगते रहे और अपनी दुआओं के पूरा होने पर खुदा का शुक्र बुलंद आवाज़ में अदा करते रहे ताकि कोई उनके ज़रिये से होने वाले चमत्कार देखकर कन्फ़्यूज़ न हो जाये और उन्हें खुदा न समझ बैठे।
मुर्दे को ज़िन्दा करने वाला खुदा है, मसीह अ. तो खुदा से ज़िन्दगी के लिए दुआ किया करते थे
उन्होंने लाजरस को आवाज़ दी और लाजरस अपनी क़ब्र से बाहर निकल आया, ज़िन्दा होकर तब भी मसीह ने खुदा का शुक्र अदा किया और कहा कि तू सदा मेरी प्रार्थना सुनता है। (यूहन्ना, 11, 42)
इसका मतलब लाजरस को ज़िन्दा करने के लिए मसीह ने खुदा से दुआ की थी और खुदा ने उनकी दुआ कुबूल कर ली थी। लाजरस का ज़िन्दा होना खुदा के हुक्म से था।
यहां से यह भी पता चलता है कि मसीह की दुआ हमेशा सुनी गई। इसलिये यह नामुमकिन है कि मसीह की आखि़री रात की दुआ न सुनी गई हो। जब मसीह तन्हाई में जाकर घुटने टेककर खुदा से दुआ करते हैं कि ‘हे पिता यदि तू चाहे तो इस कटोरे को मेरे पास से हटा ले। तो भी मेरी नहीं परन्तु तेरी ही इच्छा पूर्ण हो ?‘ (लूका, 22, 42)
खुदा ने हज़रत ईसा अ. की हर दुआ कुबूल की
मसीह ने ऐसा मौत के डर से नहीं कहा बल्कि उन्हें मालूम था कि उनके इन्कार के बदले में इन्कारी अज़ाब का शिकार होंगे और उन्हें मसीह मानने वाले अभी कच्चे हैं, उन्हें कुछ समय और चाहिये। मसीह की कोई दुआ कभी रद्द नहीं हुई, यह दुआ भी रद्द नहीं हुई लिहाज़ा मौत का कटोरा खुदा ने उनके सामने से हटा लिया और उन्हें जीवित ही आसमान पर उठा लिया। उन्हें सलीब पर चढ़ाया तो ज़रूर गया लेकिन सलीब पर उन्हें मौत नहीं आई। वे सलीब पर बेहोश हो गए। दूर से देखने वालों ने समझा कि वे मर गए। यह लोगों की सोच थी न कि हक़ीक़त। (लूका, 23, 49)
जो कहे कि मार्ग, जीवन और सच्चाई मैं ही हूं। (यूहन्ना, 14, 6) जो साक्षात जीवन हो उसे मौत आ भी कैसे सकती थी ? जबकि उसने खुदा से मौत का कटोरा अपने सामने से हटाने की दुआ भी की हो (मरकुस, 14, 36) और उसकी दुआ मालिक ने कभी रद्द न की हो। (यूहन्ना, 11, 42)
हज़रत ईसा अ. को मौत नहीं आई, वे ज़िन्दा हैं
मसीह को जब सलीब से उतारा गया तो वे बेहोश थे न कि मुर्दा। उन्हें यूसुफ़ अरमतियाह ने गुफ़ानुमा एक क़ब्र में रखा। उनके बदन पर मारपीट की चोटों के भी ज़ख्म थे और उस भाले का भी जो सिपाहियों ने चलते-चलते उन्हें मारा था और खून और पानी उनके बदन से निकला था (यूहन्ना, 19, 34) जोकि खुद उनकी ज़िन्दगी का सुबूत है।
तीसरे दिन मरियम मगदलीनी उनकी क़ब्र पर पहुंची लेकिन उनकी क़ब्र ख़ाली थी। हज़रत ईसा ने उसे संबोधित किया-‘हे नारी ! तू क्यों रो रही है ? तू किसे ढूंढ रही है ? (यूहन्ना, 20, 15) तो वह उन्हें पहचान नहीं पाई, वह उन्हें माली समझी। तब ईसा अलैहिस्सलाम ने खुद को उस पर ज़ाहिर किया तब वह उन्हें पहचान पाई। उन्होंने उसे खुद को छूने से रोक दिया क्योंकि वे ज़ख्मी थे। यहां यह भी क़ाबिले ग़ौर है कि उन्होंने मरियम से कहा कि मुझे मत छू ; क्योंकि मैं अब तक पिता के पास ऊपर नहीं गया हूं। (यूहन्ना, 20, 17)
और सलीब पर अपने साथ टंगे हुए एक डाकू से कहा था कि ‘मैं तुझसे सच कहता हूं, आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा । (लूका, 23, 43)
ख़ैर खुदा ने मसीह की दुआ सुन ली और उन्हें आसमान पर उठा लिया जहां से वे दोबारा तब आयेंगे जब कि खुदा उन्हें भेजना चाहेगा।
पादरी साहब और लॉरेंस मेरी बात को दिलचस्पी और ग़ौर से सुन रहे थे।
खुदा ने मसीह अ. को सलीब पर मरने के लिए भेजा ही नहीं था
खुदा ने मसीह को सलीब पर मरने के लिए नहीं भेजा था और न ही खुद मसीह की मर्ज़ी थी कि वे सलीब पर मरें। इसीलिए उन्होंने खुदा से ‘दुख के कटोरे‘ को हटाने की दुआ की। वे सलीब पर मरें, ऐसा तो यहूदी चाहते थे। उन्हें डर था कि अगर उन पर ईमान लाने वालों की तादाद इसी तरह बढ़ती रही तो रोमी उन्हें बाग़ी समझेंगे और उनकी जगह और जाति पर क़ब्ज़ा कर लेंगे। इसलिए वे कहते थे कि ‘हमारी भलाई इस बात में है कि हमारी जाति के लिए एक मनुष्य एक मरे और सारी जाति नष्ट न हो।‘ (यूहन्ना, 11, 50)
साज़िश में कही गयी मसीह के दुश्मनों की बात उनपर ईमान लाने वालों का अक़ीदा कैसे बन गई ?
आपने कैसे मान लिया कि लोगों को पैदाइशी गुनाह से मुक्ति दिलाने के लिए मसीह एक बेऐब मेमने की मानिन्द सलीब पर कुर्बान हो गए ?
ईसा अ. बच्चों को मासूम और स्वर्ग का हक़दार मानते थे न कि जन्मजात पापी

मसीह ने कभी बच्चों को पैदाइशी गुनाहगार नहीं माना। एक बार लोग अपने बच्चों को उनके पास लाये ताकि वे उनपर अपना हाथ रखें और बरकत की दुआ दें। पर चेलों ने उनको डांटा। यह देखकर मसीह ने नाराज़ होकर उनसे कहा कि ‘बच्चों को मेरे पास आने दो और उन्हें मना न करो; क्योंकि परमेश्वर का राज्य ऐसों का ही है। मैं तुमसे सच कहता हूं कि जो कोई परमेश्वर के राज्य को छोटे बच्चे के समान ग्रहण न करे, वह उस में कभी प्रवेश करने न पाएगा।‘
यीशु ने उन्हें गोद में लिया, और उन पर हाथ रखकर उन्हें आशीष दी। (मरकुस, 10, 14-16)
मसीह ने तो अपने साथियों से कहा कि वे खुद को बच्चों की मानिन्द बनायें हालांकि वे महीनों से उनके साथ थे और उन्होंने मसीह के ज़रिये होने वाले चमत्कार भी देखे थे और उन्हें ‘ईमान का निजी अनुभव‘ भी था। उन्होंने बच्चों से नहीं कहा कि वे उनके साथियों की मानिन्द बनें। अगर बच्चे पैदाइशी गुनाहगार होते तो वे अपने साथियों को उनकी मानिन्द बनने की नसीहत हरगिज़ न करते।
परमेश्वर का मेमना बचा लिया गया
दूसरी बात मेमने की कुरबान होने के बारे में है। ओल्ड टेस्टामेंट में है कि मेमना बचा लिया गया। मेमना प्रतीक है मसीह का। जब मेमने के बारे में आया है कि उसे बचा लिया गया तो इसका मतलब यही है कि मसीह को बचा लिया गया। धर्मशास्त्र में भी आया है कि ‘मैं दया से प्रसन्न से होता हूं बलिदान से नहीं।‘ (मत्ती, 12, 7)
न तो कोई बच्चा पैदाइशी गुनाहगार होता है और न ही मसीह सलीब पर लोगों के पापों के प्रायश्चित के तौर पर कुरबान होने के लिए भेजे गए थे और न ही वे सलीब पर मरना चाहते थे और न ही वे सलीब पर मरे।

मसीह का मिशन क्या था ?


मसीह का मिशन था लोगों को शैतान की गुलामी और गुनाहों की दलदल से निकालना। इसके लिए वे चाहते थे कि लोग दीनदारी का दिखावा न करें बल्कि सचमुच दीनदार बनें। इसीलिए उन्होंने कहा कि ‘हे पाखंडी शास्त्रियों और फ़रीसियों , तुम पर हाय ! तुम पोदीने, सौंफ़ और ज़ीरे जैसी छोटी-छोटी वस्तुओं का दसवां अंश देते हो। परन्तु तुम ने धर्म-व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, दया और विश्वास को छोड़ दिया है। तुम्हें चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते। हे अन्धे अगुवों, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊंट को निगल जाते हो। (मत्ती, 23, 23 व 24)

यहां पर भी मसीह ने शरीअत को कैंसिल नहीं किया बल्कि लोगों को डांटा कि वे शरीअत के अहम हुक्मों पर अमल नहीं कर रहे हैं।
मसीह का मिशन था ‘सत्य पर गवाही देना‘
वे कहते हैं कि ‘मैंने इसीलिए जन्म लिया और इसीलिए संसार में आया हूं कि सत्य पर गवाही दूं।‘ (यूहन्ना, 18, 37)
उन्होंने कहा कि ‘हे सब परिश्रम करने वालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूंगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो और मुझसे सीखो। (मत्ती, 11, 28 व 29)
मसीह का जूआ लादने के लिए ज़रूरी था कि जो जूआ उन पर पहले से लदा है वे उसे उतार फेंके, लेकिन जो फ़रीसी वग़ैरह इन ग़रीब लोगों पर अपना जूआ लादे हुए थे वे कब चाहते थे कि लोग उनके नीचे से निकल भागें।
‘तब फ़रीसियों ने बाहर जाकर यीशु के विरोध में सम्मति की, कि यीशु का वध किस प्रकार करें। (मत्ती, 12, 14)
नक़ली खुदाओं की दुकानदारी का ख़ात्मा था मसीह का मिशन
नबी के आने से नक़ली खुदाओं की खुदाई का और उनके जुल्म का ख़ात्मा होना शुरू हो जाता है, इसलिये इनसानियत के दुश्मन हमेशा नबी का विरोध करते हैं और आम लोगों को भरमाते हैं।
तब नबी का उसके देश में निरादर किया जाता है, उसे उसके देश से निकाल दिया जाता है और यरूशलम का इतिहास है कि वहां के लोगों ने बहुत से नबियों को क़त्ल तक कर डाला।
मसीह के साथ किया गया शर्मनाक बर्ताव और उन्हें क़त्ल करने की नाकाम कोशिश भी उसी परम्परा का हिस्सा थी।
मसीह का मिशन, खुदा का मिशन था और खुदा के कामों को रोकना किसी के बस में है नहीं

आखि़रकार जब मसीह के काम में रूकावट डाली गई और उन्हें ज़ख्मी कर दिया गया तो उन्हें कुछ वक्त के लिए आराम की ज़रूरत पड़ी। मालिक ने उन्हें दुनिया से उठा लिया, सशरीर और ज़िन्दा। लेकिन उनके उठा लिए जाने से खुदा का मिशन तो रूकने वाला नहीं था। सो मसीह ने दुनिया से जाने से पहले कहा था कि ‘मैं तुमसे सच कहता हूं कि मेरा जाना तुम्हारे लिए अच्छा है। जब तक मैं नहीं जाऊंगा तब तक वह सहायक तुम्हारे पास नहीं आएगा। परन्तु यदि मैं जाऊंगा तो मैं उसे तुम्हारे पास भेज दूंगा। जब वह आएगा तब संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के विषय में निरूत्तर करेगा।‘ (यूहन्ना, 16, 6-8)

‘मुझे तुमसे और भी बहुत सी बातें कहनी हैं। परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा तब तुम्हें सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताएगा। वह मेरी महिमा करेगा , क्योंकि जो मेरी बातें हैं, वह उन्हें तुम्हें बताएगा।
(यूहन्ना, 16, 12-14)
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की भविष्यवाणी पूरी हुई और दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. तशरीफ़ लाए। उन्होंने गवाही दी कि ईसा कुंवारी मां के बेटे थे और मसीह थे। खुदा के सच्चे नबी थे, मासूम थे। वे ज़िन्दा आसमान पर उठा लिए गए और दोबारा ज़मीन पर आएंगे और मानव जाति के दुश्मन ‘दज्जाल‘ (एंटी क्राइस्ट) का अंत करेंगे।
हज़रत मुहम्मद स. ने खुदा के हुक्म से हज़रत ईसा अ. के काम को ही अंजाम तक पहुंचाया है
जो बातें मसीह कहना चाहते थे लेकिन कह नहीं पाए, वे सब बातें पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. ने दुनिया को बताईं और उन्होंने संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय, के विषय में निरूत्तर किया।

आज ज़मीन पर 153 करोड़ से ज़्यादा मुसलमान आबाद हैं। हरेक मुसलमान सिर्फ़ उनकी गवाही की वजह से ही ईसा को खुदा का नबी और मसीह मानते हैं। मरियम को पाक और उनकी पैदाइश को खुदा का करिश्मा मानते हैं। क्या मसीह के बाद दुनिया में हज़रत मुहम्मद स. के अलावा कोई और पैदा हुआ है जिसने मसीह की सच्चाई के हक़ में इतनी बड़ी गवाही दी हो और खुदा की शरीअत को ज़मीन पर क़ायम किया हो ?

‘सत्य का आत्मा‘ हैं हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम
अगर आप इसके बावजूद भी हज़रत मुहम्मद स. को ‘सत्य का आत्मा‘ नहीं मानते तो फिर आप बताएं कि ‘सत्य का आत्मा‘ कौन है, जिसे मसीह ने जाकर भेजने के लिए कहा था ?

उनके अलावा आप किसे कह सकते हैं कि उसने सम्पूर्ण सत्य का मार्ग बताया है ?

क्या एक ईसाई के लिए इंजील के खि़लाफ़ अमल करना जायज़ है ?
ख़ैर , हो सकता है कि हज़रत मुहम्मद स. की सच्चाई पर मुतमईन होने में आपको कुछ वक्त लगे लेकिन जिस इंजील पर आप ईमान रखते हैं, उसके खि़लाफ़ अमल करने का आपको क्या हक़ है ?
इंजील के खि़लाफ़ न तो मैं अमल करना चाहता हूं और न ही आपको करने दूंगा।
बहुत बार ऐसा होता है कि जो बात ज्ञानियों से पोशीदा रह जाती हैं, उन्हें मालिक बच्चों पर खोल देता है। (मत्ती, 11, 25)
ज्ञानी में ज्ञान का अहंकार भी आ जाता है और उसे लगता है कि सभी ज़रूरी बातें जो जान लेनी चाहिए थीं उन्हें वह जान चुका है। ज्ञान के उसकी प्यास ख़त्म हो जाती है। प्यास ख़त्म तो समझो तलाश भी ख़त्म और नियम यह है कि ‘जो ढूंढता है वह पाता है।‘
जो ढूंढता है वह पाता है
बच्चे स्वाभाविक रूप से ही जिज्ञासु होते हैं और पक्षपात उनमें कुछ होता नहीं। सत्य को जानने के लिए यही दो आवश्यक शर्तें हैं, जो बच्चे पूरी कर देते हैं और ज्ञानी पूरी कर नहीं पाते। बच्चे ढूंढते और वे पा लेते हैं क्योंकि वे पाने की शर्तों पर खरे उतरते हैं।
मैं भी एक बच्चा ही हूं। मुझे कुछ मिला है। आप इसे देख लीजिये। आपको जंचे तो ठीक है वर्ना क़ियामत के रोज़ मसीह खुद बता देंगे कि उनके किस क़ौल का क्या मतलब था ?
तब बहुत से लोग उनके पास आएंगे और उनसे कहेंगे कि हमने तेरे साथ खाया-पीया था और तूने हमारे बाज़ारों में उपदेश दिया था।, लेकिन मसीह उन्हें धिक्कार कर कहेंगे कि हे कुकर्म करने वालो, तुम सब मुझसे दूर रहो। (लूका, 13, 27)
जीवन की सफलता के लिए ‘सत्कर्म‘ ज़रूरी है
इसीलिए मैं कहता हूं कि बिना सत्कर्म के सिर्फ़ मौज्ज़े और चमत्कार किसी की सच्चाई को परखने का सही पैमाना नहीं है। सत्कर्म का पैमाना केवल ‘व्यवस्था‘ है। यही मसीह की शिक्षा है। चमत्कार तो मसीह ने भी दिखाए और एंटी-क्राइस्ट भी दिखाएगा, लेकिन दोनों में फ़र्क़ यह होगा कि मसीह आये थे जो जो शरीअत को क़ायम करने और मसीह आएगा शरीअत को मिटाने के लिए। सही-ग़लत की पहचान का सही पैमाना शरीअत है, इसमें किसी को कभी धोखा नहीं हो सकता।
खुदा का हुक्म और मसीह की मर्ज़ी दो नहीं, बल्कि एक है
‘मसीह में जीने‘ और ‘खुदा में जीने‘ का मतलब भी यही है कि खुदा की मर्ज़ी और मसीह के तरीक़े में जीना। खुदा की मर्ज़ी और मसीह का तरीक़ा दो नहीं हैं बल्कि ‘एक‘ है। इसीलिए मसीह कहते हैं कि ‘मैं और पिता एक है।‘

खुदा की मर्ज़ी ही मसीह का तरीक़ा है और मसीह के तरीक़े का नाम ही शरीअत है। लोगों की आसानी के लिए शरीअत की तकमील ही मसीह के आने और जाने का मक़सद थी। अब मसीह जिस्मानी ऐतबार से हमारे दरम्यान नहीं हैं लेकिन उनका तरीक़ा हमारे सामने आज भी है। अगर आप मसीह में जीना चाहते हैं तो आपको उनके तरीक़े में जीना होगा। जिस तरह उन्होंने दिन गुज़ारा उस तरह आपको दिन गुज़ारना होगा और जिस तरह उन्होंने रात गुज़ारी उस तरह आपको रात गुज़ारनी होगी। जिस खुदा की उन्होंने इबादत की उसी खुदा की इबादत आपको करनी होगी और जिस खुदा से घुटने टेककर वे दुआ मांगा करते थे उसी खुदा से आपको दुआ मांगनी होगी। तब जाकर आप मसीह के तरीक़े को पा सकेंगे और मसीह में जी सकेंगे।
मसीह ने ज़िन्दगी भर केवल एक ईश्वर की उपासना की है, न तीन की और न ही दो की
यह नहीं कि मसीह तो ज़िन्दगी भर अपने पैदा करने वाले खुदा की इबादत करते रहे, उसी से दुआ मांगते रहे और दुआ पूरी होने पर उसी का शुक्र अदा करते रहे और सभी इस बात के गवाह भी हैं, लेकिन अब आप उनके तरीक़े के खि़लाफ़ खुदा को छोड़कर मसीह की इबादत करने लगें और उन्हीं से दुआएं मांगने लगें और शुक्र भी उन्हीं का अदा करने लगें और कोई पूछे तो आप कह दें कि मसीह ने कहा है कि ‘मैं और पिता एक हैं।‘
भाई ! उनका कहना बिल्कुल सही है लेकिन उनके कहने को उनके करने के साथ जोड़कर तो देखिए।
जब उन्होंने कहा कि मैं और पिता एक हैं, तो क्या वे खुद अपनी इबादत करने लगे थे या मुसीबतों में खुद से ही दुआएं किया करते थे ?
अब उनके शिष्यों को देखिए कि उनके शिष्यों ने उनके मुंह से यह सुनकर क्या किया ?
क्या उनमें से किसी ने कभी खुदा के अलावा किसी की इबादत की ?
या उन्होंने मसीह से कभी घुटने टेककर दुआएं मांगी ?
हालांकि उन्होंने मसीह से सुना कि ‘जो कुछ पिता का है वह सब मेरा है‘ और ‘स्वर्ग और धरती का अधिकार मुझे दे दिया गया।‘ इसके बावजूद भी जब कभी किसी ने मसीह को उत्तम कहा तो उन्होंने यही कहा कि ‘तू मुझे उत्तम क्यों कहता है ? कोई उत्तम नहीं, केवल एक अर्थात परमेश्वर।‘ (मरकुस, 10, 18)
‘तू अपने प्रभु परमेश्वर को प्रणाम कर और केवल उसी की उपासना कर। (लूका, 4, 8)

आखि़री विनती
पादरी राकेश चार्ली साहब और भाई मकेश लॉरैंस साहब से और भी काफ़ी बातें हुईं जिन्हें किसी और वक्त पेश किया जाएगा। मैं नहीं जानता कि इन बातों को उन्होंने कितना माना ? और कितना उन पर विचार किया ?
यही बातें अब मैं आपके सामने रखता हूं। आपको जो बात सही लगे उसे ले लीजिए और जो बात ग़लत लगे मुझे उसके बारे में बता दीजिए ताकि मैं उसे सही कर लूं। मैं आपका शुक्रगुज़ार रहूंगा।

चीन में इस्लाम

चीन में इस्लाम का इतिहास कोई 1300 साल पुराना है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, चीन में इस्लाम का आरम्भ वर्ष 651 में हुआ। इसी पूर्व वर्ष 97 में ही चीन और अरब देशों के बीच आवा-जाही शुरू हो गई थी। उस वक्त एक चीनी नागरिक कान ईंग ने सरकारी दूत की हैसियत से फारस जैसे देशों की यात्रा की। इस के पश्चात बड़ी संख्या में चीनी व अरबी समुद्री जहाज और व्यापारी एक-दूसरे के यहां गए। चीन के थांग राजवंश में दोनों की आवाजाही में उभार आया। तब बड़ी संख्या में अरबी व्यापारी फारस की खाड़ी हो गए भारत और मलाया प्रायद्वीप के जरिए दक्षिणी चीन के क्वांगचओ और छ्वेनचओ जैसे समुद्रतटीय शहर पहुंचे।
इस के बाद और बड़ी संख्या में अरबी व्यापारी फारस और मध्य एशिया से चीन आए। उन्होंने जो रास्ता तय किया था, वहां आज मशहूर रेशम मार्ग कहलाता है। आज यह मार्ग चीन की अरब देशों व ईरान के साथ दोस्ती का प्रतीक माना जाता है।


वर्ष 757, यानी चीन के थांग राजवंश में, सैनिक विद्रोह को शांत करने के लिए थांग राजवंश के सम्राट ने अरब से सैनिक सहायता की मांग की थी। यहां व्यवस्था बनाने के बाद अरबी सैनीक चीन में ही बस गए, वे चीन के मुसलिमों का एक हिस्सा माने जाते हैं।

चीन के थांग और सुंग राजवंश में बड़ी संख्या में अरबी व्यापारी चीन जाने लगे थे। वे सब इत्र, जड़ी-बूटी और आभूषण के व्यवसाय करते थे। चीन जाने वाले अरबी व्यापारियों की संख्या में बड़ी वृद्धि को देखते हुए अरबी पदाधिकारी ने अपना दूत भी चीन भेजा। 25 अगस्त, 651 को, अरब के तीसरे ख़लीफ़ा उथमान बी अफ़्फ़ान ने ऐसा प्रथम औपचारिक मिशन चीन भेजा था। मिशन ने थांग राजवंश के सम्राट से मुलाकात के दौरान अपने देश के धर्म और रीति-रिवाज से चीनी सम्राट को अवगत कराया। चीन के प्राचीन ग्रंथों में अरबी मिशन के चीन जाने को इस्लाम के चीन में प्रवेश का प्रतीक माना जाता है।

सुंग राजवंश के अंत में जंगेज ने पश्चिम पर कब्जा करने का सैनिक अभियान आरम्भ किया। इन अभियान के दौरान बड़ी संख्या में मकबूज़ा जातियों के मुसलिमों का चीन में स्थानांतरण हुआ। इन जातियों में खोरजम जाति की जनसंख्या सब से ज्यादा थी। इन जातियों के लोग बाद में चीन में ह्वेई



जाति के पूर्वज बने। वर्ष 1271 में मंगोल जाति ने दक्षिण सुंग राजवंश की सत्ता का तख्ता उलटकर य्वान राजवंश की सत्ता स्थापित की। य्वान राजवंश काल में चीन भर में ह्वेई जाति के लोग बसने लगे थे और ह्वेई व उइगुर जैसी दसेक जातियों के लोग मुसलिम बन चुके थे।

चीन के सिंच्यांग उइगुर स्वायत प्रदेश के पश्चिमी भाग में 10 वीं सदी से ही बड़ी संख्या में तुर्क लोग इसलामी धर्म के अनुयाई बन गए थे।

वर्ष 1990 के आंकड़ों के अनुसार, चीन में ह्वेई, उइगुर, कजाख, तुंगश्यांग, करकज, साला, ताजीक, उजबेक, पाउआन और तातार जैसे दस जातियों के लोग इसलाम में विश्वास रखते हैं। इन की कुल संख्या 1 करोड़ 70 लाख है। जिन में से ह्वेई जाति लोग 86 लाख, उइगूर लोग 21 लाख और खजाक लोग 11 लाख 10 हजार हैं।

चीन में अधिकांश मुसलिम सिंच्यांग उइगूर स्वायत प्रदेश में रहते हैं, शेष निंगश्या ह्वेई जाति स्वायत प्रदेश, भीतरी मंगोलिया स्वायत प्रदेश, कानसू, हनान, छिंगहै, युननान, हपेई, शानतुंग, आनह्वेई, प्रांतों और राजधानी पेइचिंग में रहते हैं। इस के अतिरिक्त अन्य प्रांतों, स्वायत प्रदेशों, केन्द्र शासित शहरों, हांगकांग, थाइवान और मकाओ में भी मुसलिमों की आबादी है।

सातवीं सदी के अंत में ह्वेई लोगों ने इसलाम पर विश्वास रखना शुरू किया। पहले खजाक लोग जोरोआस्तर, क्रीस्त धर्म और बौद्ध मत पर विश्वास रखते थे। आठवीं सदी में उन्होंने इसलाम पर विश्वास रखना शुरू किया। दसवीं सदी के मध्य में उइगुर लोगों ने पहले सामान धर्म और फिर मनी धर्म से निकल कर इस्लाम पर विश्वास रखना शुरू किया। 13 वीं सदी में मध्य एशिया से पश्चिमी चीन के लोग कानसू प्रांत में बड़ी तादाद में जा बसे, उन्हों ने मंगोल , ह्वेई और हान लोगों के साथ विवाह रचाना शुरू किया।

तुंगश्यांग लोग इनही की संतान है। साला लोगों के पूर्वज मध्य एशिया के समरकंद से पश्चिमी चीन के छिंगहै प्रांत में जा बसे थे। उन्होंने हान और तिब्बती लोगों के साथ विवाह किया। 15 वीं सदी में साला लोगों ने इसलाम पर विश्वास शुरू किया। उन का चीन की हर जाति के साथ विवाह देता है, मुसलिमों के बीच भी विवाह किया जाता है। हालांकि इस प्रकार के विवाह इतने ज्यादा नहीं होते है।

चीन में मस्जिदों की कुल संख्या 30 हजार से अधिक है। चीन के भीतरी और पश्चिमी भाग में मस्जिदों के निर्माण की शैली में फर्क भी काफी ज्यादा है। पश्चिम के मस्जिदों मे अरबी शैली नजर आती है, तो भीतरी चीन की मस्जिदें चीन की परम्परागत शैली की हैं। इमाम व आख़ुंनों की संख्या भी कोई 40 हजार के ऊपर है।

Source: China Radio International (http://hindi.cri.cn)

क्या कुरआन के अनुसार पृथ्वी गोल नहीं समतल है?

कुछ लोगो को लगता है कि कुरआन के अनुसार पृथ्वी समतल है जबकि  कुरआन की एक भी आयत यह नहीं कहती है कि पृथ्वी समतल (फ्लैट) है. कुरआन केवल एक कालीन के साथ पृथ्वी की पपड़ी की तुलना करता है.


 कुछ लोगों को लगता है की कालीन को केवल एक निरपेक्ष समतल सतह पर ही रखा जा सकता हैं. लेकिन ऐसा नहीं है, किसी कालीन को पृथ्वी जैसे किसी बड़े क्षेत्र पर फैलाया जा सकता है. पृथ्वी के एक विशाल मॉडल को किसी कालीन से साथ  ढक कर आसानी से इस बात को समझा  जा सकता है.


वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती को पालना (बिछौना) बनाया और उसमें तुम्हारे लिए रास्ते निकाले और आकाश से पानी उतरा. फिर हमने उसके द्वारा विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे निकाले [कुरआन 20:53].


 कालीन को आम तौर पर किसी ऐसी सतह पर पर डाला जाता है, जो चलने में  बहुत आरामदायक नहीं होती है. पवित्र कुरआन तार्किक आधार पर एक कालीन के रूप में पृथ्वी की पपड़ी (उपरोक्त तस्वीर के अनुसार उपरी सतह) का वर्णन करता है, जिसके  नीचे गर्म तरल पदार्थ हैं एवं  जिसके बिना मनुष्य के लिए प्रतिकूल वातावरण में जीवित रहना सक्षम नहीं होता. कुरआन का यह ज्ञान भूवैज्ञानिकों के द्वारा सदियों की खोज के बाद उल्लेख किया गया एक वैज्ञानिक तथ्य भी है.


इसी तरह, कुरआन के कई श्लोक कहते है कि "पृथ्वी को फैलाया गया है"

और धरती को हमने बिछाया, तो हम क्या ही खूब बिछाने वाले हैं. [कुरआन 51:48]
क्या ऐसा नहीं है कि हमने धरती को बिछौना बनाया और पहाडो को खूंटे? [कुरआन 78:6-7]

कुरआन की इन आयात में कुछ ज़रा सा भी निहितार्थ नहीं है कि पृथ्वी फ्लैट हैं. यह केवल इंगित करता है कि पृथ्वी विशाल है और पृथ्वी के इस फैलाव वाले स्वाभाव का कारण उल्लेख करते हुए शानदार कुरआन कहता हैं:

ऐ मेरे बन्दों, जो ईमान लाए हो! निसंदेह मेरी धरती विशाल है, अत: तुम मेरी ही बंदगी करो. [कुरआन 29:56]

कुरआन की उपरोक्त आयात से यह भी पता चलता है कि किसी का यह बहाना भी नहीं चल सकेगा कि वह परिवेश और परिस्थितियों की वजह से अच्छे कर्म नहीं सका और बुराई करने पर मजबूर हुआ था.

अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें (पार्ट-2)

प्रस्तावना : आस्तिक और नास्तिक। मानव दर्शन के दो पूरी तरह अलग अलग पहलू हैं। एक खुदा या गॉड पर यकीन रखता है। यह मानता है कि इस दुनिया को, आसमान को, सूरज को, चांद को और झिलमिलाते सितारों को बनाने वाली एक सुपर पावर मौजूद है। वही इनकी रफ्तार को, गर्दिशों को कण्ट्रोल में रखती है। एक दूसरे से मुनासिब दूरी बनाये रखती है और संसार में मौजूद सभी जानदारों की पालनहार है।


जबकि इंसानी सोच की इससे अलग विचारधारा वाले लोग जिन्हें नास्तिक कहा जाता है, यह मानते हैं कि दुनिया का सम्पूर्ण सिस्टम बिना किसी कण्ट्रोल के स्वचालित है। संसार की प्रत्येक वस्तु का जन्म अपने आप विकास प्रक्रिया के द्वारा हुआ है। जीवधारी खुद पैदा हुए हैं और यूनिवर्स के अलग अलग हिस्सों के बीच किसी तरह का कोई इण्टेलिजेंट रिलेशन यानि ताल्लुक नहीं है।


यह दो तरह की विचारधाराएँ शायद उसी वक्त पैदा हो गयी थीं जब इंसान ने पहली बार इस जमीन पर अपनी आँखें खोली थीं। और आज तक यह बहस जारी है। इस बात की भी कोई उम्मीद नहीं कि यह बहस कयामत से पहले खत्म हो जायेगी। लेकिन यह साफ है कि इस बहस से खयालात के नये दरवाजे खुलते हैं। नयी नयी फिक्रें सामने आती हैं। कभी आस्तिक नास्तिक को लाजवाब कर देता है तो कभी नास्तिक आस्तिक की बात मानने से इंकार कर देता है।


और अल्लाह या ईश्वर के वजूद से जुड़ा एक दूसरा सवाल है मजहब या धर्म का। और मज़हब के पूरी तरह उलट मानी जाती है साइंस। इस सवाल से जुड़ने वाले ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि मज़हब और साइंस दो पूरी तरह अलग चीजें हैं और दोनों के बीच कोई ताल्लुक नहीं। यहां तक कि साइंटिस्ट, जो मजहब को भी मानते हैं, अपनी रिसर्च को धर्म से पूरी तरह अलग थलग रखते हैं। वे लोग यह मानकर चलते हैं कि वैज्ञानिक तर्कों (Logic) की कसौटी में मजहब के ख्यालात की कोई जगह नहीं। धर्म आस्था से जुड़ा हुआ है और आस्था सिर्फ दिल से होती है। कोई तर्क इसमें मान्य नहीं होता।


जबकि साइंस में सिर्फ उन्हीं मान्यताओं को जगह दी जाती है जो तर्क की कसौटी पर खरी उतरती हैं। और उन्हें सैद्धान्तिक व प्रायोगिक रूप से मुमकिन कर दिया जाता है। इसी तरह मजहब से जुड़ी बातों में अगर कोई बहस करता है और किसी मान्यता की वजह जानना चाहता है तो ऐसा व्यक्ति अधर्मी कहलाने लगता है। उसे मजहब से बाहर कर दिया जाता है और कभी कभी तो उसके खिलाफ फतवा दे दिया जाता है।


मिसाल के तौर पर प्राचीन पुराणों में राक्षस और देवताओं की कहानियां मिलती हैं। लेकिन कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि राक्षस या देवताओं का इस जमीन पर कोई वजूद नहीं। क्योंकि आजकल के वक्त में न तो राक्षस दिखाई देते हैं और न देवता। मौजूदा दौर में किसी शख्स ने शैतान नहीं देखा है, शैतान जैसे इंसान जरूर देखे हैं। लेकिन अगर वह मजहबी है तो यह कभी नहीं कह सकता कि दुनिया में शैतान का कोई वजूद नहीं।


यही बात अल्लाह के वजूद के बारे में कही जाती है। अल्लाह का वजूद साइंटिफिक रिसर्च से नहीं साबित किया जा सकता। इंसान का दिल व दिमाग इस वजूद को महसूस करता है। साइंस का कोई एक्सपेरीमेन्ट इस एहसास की सच्चाई नहीं साबित कर सकता। क्योंकि हर एक्सपेरीमेन्ट की अपनी हद होती है। एक सीमित दायरा होता है। जबकि खुदा हर तरह की सीमा से बाहर है। इस तरह साइंटिफिक एक्सपेरीमेन्ट इस ताकत को नहीं दिखा सकते। यही वजह है कि साइन्टिस्ट अपने साइंस को मजहब से और खास तौर से खुदा से नहीं जोड़ता।


बहुत से ऐसे साइंटिस्ट ज़रूर गुजरे हैं जो अपनी रिसर्च का परिणाम खुदा की ख्वाहिश को समझते थे। महान साइंटिस्ट ब्लेज पास्कल गॉड में पूरा यकीन रखता था। यहां तक कि उसने एक बार अपनी रिसर्च बीच में ही रोक दी थी। क्यांकि वह समझता था कि गॉड उसकी रिसर्च को पसंद नहीं करता। बाद में एक घटना ने उसकी सोच बदल दी और वह एक बार फिर अपनी रिसर्च में जुट गया।


ऐसे वैज्ञानिकों की एक लम्बी लिस्ट है जो खुदा या गॉड में अटूट विश्वास रखते थे और उन्होंने साइंस के विकास में अद्वितीय योगदान दिया। इनमें कापरनिकस, आइजक न्यूटन, रेने डिस्कार्टस, लुई पास्चर, मैक्स प्लांक, ग्रेगर मेंडल, माईकेल फैराडे वगैरा की एक लम्बी लिस्ट है। और अगर इसमें इस्लाम के स्वर्ण युग के साइंसदानों को जोड़ दिया जाये तो यह लिस्ट और लम्बी हो जाती है। इनमें इमाम अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-), इमाम जाफर अल सादिक (अ-स-), फादर ऑफ केमिस्ट्री जाबिर इब्ने हय्यान उर्फ गेबर, फादर आफ माडर्न मेडिसिन इब्ने सेना, अलजेबरा का आविष्कारक अल ख्वारिज्म़ी वगैरा के नाम काबिले जिक्र हैं।


अल्लाह में यकीन न रखने वाले साइंटिस्ट भी किसी न किसी ऐसी ताकत की कल्पना करने पर मजबूर होते हैं जिसने या तो इस यूनिवर्स को बनाया है या फिर इसे चलाने में शामिल है। मिसाल के तौर पर आजकल एक ऐसे पर्टिकिल की खोज जोर शोर से हो रही है जिससे दुनिया का सारा मैटर बना हुआ है। इस पर्टिकिल को नाम दिया गया है हिग्स बोसॉन या गॉड पर्टिकिल।



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अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें

यह किताब अल्लाह के गुणों यानि तौहीद को साइंस की मदद से समझने की एक छोटी सी कोशिश है। अक्सर उसके गुणों को न समझने की वजह से खुदा के वजूद से ही इंकार कर दिया जाता है। जबकि अगर उन्हें इंसानी अक्ल की कसौटी पर परख लिया जाये तो यह तय है कि इन्सान खुदा के वजूद से कभी इंकार नहीं कर सकता।


आमतौर पर कोई नास्तिक फिलास्फर अपनी दलीलों के लिए साइंस का सहारा लेता है। उसके अनुसार आधुनिक साइंसी दौर में खुदा वगैरा की बातें दकियानूसी करार पायी जाती हैं। जबकि सच्चाई ये है कि साइंस का गहराई से किया जाने वाला अध्ययन इंसान को खुदा के वजूद में यकीन रखने पर मजबूर कर देता है।


इससे पहले कि मै अपनी बात की शुरुआत करूं, एक नजर डालते हैं इमाम हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-) के अजीम खुत्बे पर जिसमें उन्होंने परवरदिगार के बारे में इरशाद फरमाया,


‘‘सम्पूर्ण तारीफें उस अल्लाह के लिए हैं जिस की तारीफ तक बोलने वालों की पहुंच नहीं। जिस की रहमतों को गिनने वाले गिन नहीं सकते। न कोशिश करने वाले उसका अधिकार चुका सकते हैं। न ऊंची उड़ान भरने वाली हिम्मतें उसे पा सकती हैं। न दिमाग और अक्ल की गहराईयां उस की तह तक पहुंच सकती हैं। उस के आत्मिक चमत्कारों की कोई हद निश्चित नहीं। न उस के लिए तारीफी शब्द हैं। न उस के लिए कोई समय है जिस की गणना की जा सके। न उस का कोई टाइम है जो कहीं पर पूरा हो जाये। उस ने कायनात को अपनी कुदरत से पैदा किया। अपनी मेहरबानी से हवाओं को चलाया। कांपती हुई जमीन पर पहाड़ों के खूंटे गाड़े। दीन की शुरुआत उस की पहचान है। पहचान का कमाल उसकी पुष्टि है। पुष्टि का कमाल तौहीद है। तौहीद का कमाल निराकारता है और निराकारता का कमाल है कि उससे गुणों को नकारा जाये। क्योंकि हर गुण गवाह है कि वह अपने गुणी से अलग है और हर गुणी गवाह है कि वह गुण के अलावा कोई वस्तु है। अत: जिस ने उस के आत्म का कोई और साथी माना उसने द्विक उत्पन्न किया। जिसने द्विक उत्पन्न किया उसने उसके हिस्से बना लिये और जो उसके लिए हिस्सों से सहमत हुआ वह उससे अज्ञानी रहा और जो उससे अज्ञानी रहा उसने उसे सांकेतिक समझ लिया। और जिसने उसे सांकेतिक समझ लिया उस ने उसे सीमाबद्ध कर दिया और जिसने उसे सीमित समझा वह उसे दूसरी वस्तुओं की पंक्ति में ले आया। जिस ने यह कहा कि वह किसी वस्तु में है उसने उसे किसी प्राणी के सन्दर्भ में मान लिया और जिसने यह कहा कि वह किसी वस्तु पर है उस ने और जगहें उस से खाली समझ लीं।


वह है, हुआ नहीं। उपस्थित है लेकिन आरम्भ से वजूद में नहीं आया। वह हर प्राणी के साथ है लेकिन शारीरिक मेल की तरह नहीं है। वह हर वस्तु से अलग है लेकिन शारीरिक दूरी के प्रकार से नहीं। वह कर्ता है लेकिन चेष्टा और उपकरणों पर निर्भर नहीं है। वह उस वक्त भी देखने वाला था जब कि सृष्टि में कोई वस्तु दिखाई देने वाली न थी। वह असम्बद्ध है इसलिए कि उसका कोई साथी ही नहीं है जिससे वह अनुराग रखता हो और उसे खोकर परेशान हो जाये। उसने पहले पहल सृजन का आविष्कार किया बिना किसी चिंतन की बाध्यता के और बिना किसी अनुभव के जिससे लाभ उठाने की उसे आवश्यकता पड़ी हो और बिना किसी चेष्टा के जिसे उसने पैदा किया हो और बिना किसी भाव या उत्तेजना के जिससे वह उत्सुक हुआ हो। हर चीज को उसके वक्त के हवाले किया। बेजोड़ वस्तुओं में संतुलन और समरूपता उत्पन्न की। हर वस्तु को भिन्न तबीयत और प्रकृति सम्पन्न बनाया। और इन प्रकृतियों के लिए उचित परिस्थितियां निर्धारित कीं।  (जारी....)



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इस्लाम पर महापुरूषों के विचार

इन्सानी भाईचारा और इस्लाम पर महात्मा गाधी का ब्यानः ‘‘कहा जाता है कि यूरोप वाले दक्षिणी अफ्रीका में इस्लाम के प्रसार से भयभीत हैं, उस इस्लाम से जिसने स्पेन को सभ्य बनाया, उस इस्लाम से जिसने मराकश तक रोशनी पहुँचाई और संसार को भाईचारे की इंजील पढाई। दक्षिणी अफ्रीका के यूरोपियन इस्लाम के फैलाव से बस इसलिए भयभीत हैं कि उनके अनुयायी गोरों के साथ कहीं समानता की माँग न कर बैठें। अगर ऐसा है तो उनका डरना ठीक ही है। यदि भाईचारा एक पाप है, यदि काली नस्लों की गोरों से बराबरी ही वह चीज है, जिससे वे डर रहे हैं, तो फिर (इस्लाम के प्रसार से) उनके डरने का कारण भी समझ में आ जाता है।’’


पृष्ठ 13, प्रो. के. एस. रामाकृष्णा राव की मधुर संदेश संगम, दिल्ली से छपी पुस्तक ‘‘इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) में


खुदा के समक्ष रंक और राजा सब एक समान


इस्लाम के इस पहलू पर विचार व्यकत करते हुए सरोजनी नायडू कहती हैं-


‘‘यह पहला धर्म था जिसने जम्हूरियत (लोकतंत्र) की शिक्षा दी और उसे एक व्यावहारिक रूप दिया। क्योंकि जब मीनारों से अज़ाद दी जाती है और इबादत करने वाले मस्जिदों में जमा होते हैं तो इस्लाम की जम्हूरियत (जनतंत्र) एक दिन में पाँच बार साकार होती है, जब रंक और राजा एक-दूसरे से कंधे से कंधा मिला कर खडे होते हैं और पुकारते हैं, ‘अल्लाहु अकबर’ यानी अल्लाह ही बडा है। मैं इस्लाम की इस अविभाज्य एकता को देख कर बहुत प्रभावित हुई हूँ, जो लोगों को सहज रूप में एक-दूसरे का भाई बना देती है। जब आप एक मिस्री, एक अलजीरियाई, एक हिन्दुस्तानी और एक तुर्क (मुसलमान) से लंदन में मिलते हैं तो आप महसूस करेंगे कि उनकी निगाह में इस चीज़ का कोई महत्व नहीं है कि एक का संबंध मिस्र से है और एक का वतन हिन्दूस्तान आदि है।’’ पृष्ठ 12


विश्व प्रसिद्ध शायर गोयटे ने पवित्र कुरआन के बारे में एलान किया थाः ‘‘यह पुस्तक हर युग में लोगों पर अपना अत्यधिक प्रभाव डालती रहेगी।’’ पृष्ठ 16


जार्ज बर्नाड शा का भी कहना हैः
‘‘अगर अगले सौ सालों में इंग्लैंड ही नहीं, बल्कि पूरे यूरोप परकिसी धर्म के शासन करने की संभावना है तो वह इस्लाम है।’’


इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका’ में उल्लिखित है -‘‘समस्त पैग़म्बरों और धार्मिक क्षेत्र के महान व्यक्तित्वों में मुहम्मद सबसे ज़्यादा सफल हुए हैं।’’ पृष्ठ 21


प्रेमचंद जी ‘‘इस्लामी सभ्यता’’ पुस्तिका जो मधुर संदेश संगम, दिल्ली से भी छपी है, में लिखते हैं:
‘‘जहां तक हम जानते हैं कि किसी धर्म ने न्याय को इतनी महानता नहीं दी जितनी इस्लाम ने।’’ पृष्ठ 5
‘संसार की किसी सभ्य से सभ्य जाति की न्याय-नीति की इस्लामी न्याय-नीति से तुलना कीजिए, आप इस्लाम का पल्ला झुकता हुआ पाएँगे।’’ पृष्ठ 7
‘‘हिन्दू-समाज ने भी शूद्रों की रचना करके अपने सिर कलंक का टीका लगा लिया। पर इस्लाम पर इसका धब्बा तक नहीं। गुलामी की प्रथा तो उस समस्त संसार में भी, लेकिन इस्लाम ने गुलामों के साथ जितना अच्छा सलूक किया उस पर उसे गर्व हो सकता है।’’ पृष्ठ 10
‘‘हमारे विचार में वही सभ्यता श्रेष्ठ होने का दावा कर सकती है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक उठने का अवसर दे। इस लिहाज से भी इस्लामी सभ्यता को कोई दूषित नहीं ठहरा सकता।’’ पृष्ठ 11
‘‘हम तो याहं तक कहने को तैयार हैं कि इस्लाम में जनता को आकर्षित करने की जितनी बडी शक्ति है उतनी और किसी सस्था में नही है। जब नमाज़ पढते समय एक मेहतर अपने को शहर के बडे से बडे रईस के साथ एक ही कतार में खडा पाता है तो क्या उसके हृदय में गर्व की तरंगे न उठने लगती होंगी। उसके विरूद्ध हिन्दू समाज न जिन लोगों को नीच बना दिया है उनको कुएं की जगत पर भी नहीं चढने देता, उन्हें मंदिरों में घुसने नहीं देता।’’ पृष्ठ 14


स्नेह और सहिष्णुता के प्रचारक स्वामी विवेकानन्द कहते हैं ‘‘पैग़म्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम संसार मे समानता के संदेशवाहक थे। वे मानवजाति में स्नेह और सहिष्णुता के प्रचारक थे। उनके धर्म में जाति-बिरादरी, समूह, नस्ल आदि का कोई स्थान नहीं है।’’
स्वामी विवेकानन्द इस्लाम के बड़े प्रशंसक और इसके भाईचारा के सिद्धांत से अभिभूत थे। वेदान्ती मस्तिष्क और इस्लामी शरीर को वह भारत की मुक्ति का मार्ग मानते थे। अल्मोड़ा से दिनांक 10 जून 1898 को अपने एक मित्र नैनीताल के मुहम्मद सरफ़राज़ हुसैन को भेजे पत्र में उन्होंने लिखा कि
‘‘अपने अनुभव से हमने यह जाना है कि व्यावहारिक दैनिक जीवन के स्तर पर यदि किसी धर्म के अनुयायियों ने समानता के सिद्धांत को प्रशंसनीय मात्र में अपनाया है तो वह केवल इस्लाम है। इस्लाम समस्त मनुष्य जाति को एक समान देखता और बर्ताव करता है। यही अद्वैत है। इसलिए हमारा यह विश्वास है कि व्यावहारिक इस्लाम की सहायता के बिना, अद्वैत का सिद्धांत चाहे वह कितना ही उत्तम और चमत्कारी हो विशाल मानव-समाज के लए बिल्कुल अर्थहीन है।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 5, पेज 415
स्वामी जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि
‘‘भारत में इस्लाम की ओर धर्म परिवर्तन तलवार (बल प्रयोग) या धोखाधड़ी या भौतिक साधन देकर नहीं हुआ था।’’विवेकानन्द साहित्य, जिल्द 8, पेज 330


सी एस श्रीनिवास ‘‘हिस्ट्री आफ़ इंडिया’’ में, जो मद्रास से 1937 मे प्रकाशित हुई थी, लिखते हैं
‘‘इस्लाम के पैग़बर ने जब एक शासक का स्थान प्राप्त किया तो भी आपका जीवन पूर्व की भांति सादा रहा। आप सुधारक भी थे और विजेता भी। आपने लोगों के अख़्लाकष् को बुलंद किया। प्रतिशोध लेने को अनुचित ठहराया और खोज-बीन के बिना रक्तपात से रोका, विखंडित कष्बीलों को एक कषैम बना दिया और एक ऐसा रिश्ता दिया जो ख़ानदानी रिश्तों से ज़्यादा टिकाऊ था।आपने लोगों को पस्ती, द्वेष और पक्षपात में ग़र्क पाया, लेकिन उनको सदाकत का संदेश देकर बुलंद कर दिया। उनको आपसी ख़ानदानी झगड़े में लिप्त पाया, मगर सहिष्णुता और भ्रातृत्व के रिश्ते में जोड़ दिया। आप एक फ़रिश्ता-ए-रहमत बनकर दुनिया में तशरीफ़ लाए।’’भारतीय सभ्यता पर मुसलमानों के उपकार, पृष्ठ 31


आदर्श जीवनजगत महर्षि पै़ग़म्बरे-इस्लाम सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के विषय में महात्मा गांधी के विचार इस तरह हैं
'‘मैं पैग़म्बरे-इस्लाम की जीवनी का अध्ययन कर रहा था। जब मैंने किताब का दूसरा भाग भी ख़त्म कर लिया तो मुझे दुख हुआ कि इस महान प्रतिभाशाली जीवन का अध्ययन करने के लिए अब मेरे पास कोई और किताब बाकी नहीं। अब मुझे पहले से भी ज़्यादा विश्वास हो गया है कि यह तलवार की शक्ति न थी जिसने इस्लाम के लिए विश्व क्षेत्रा में विजय प्राप्त की, बल्कि यह इस्लाम के पैग़म्बर का अत्यन्त सादा जीवन, आपकी निःस्वार्थता, प्रतिज्ञा-पालन और निर्भयता थी, आपका अपने मित्रों और अनुयायियों से प्रेम करना और ईश्वर पर भरोसा रखना था। यह तलवार की शक्ति नहीं थी, बल्कि ये सब विशेषताएं और गुण थे जिनसे सारी बाधाएं दूर हो गयीं और आपने समस्त कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर ली।मुझसे किसी ने कहा था कि दक्षिण अफ्ऱीकष में जो यूरोपियन आबाद हैं, इस्लाम के प्रचार से कांप रहे हैं, उसी इस्लाम से जिसने मोरक्को में रौशनी फैलायी और संसार-निवासियों को भाई-भाई बन जाने का सुखद संवाद सुनाया। निःसन्देह दक्षिण अफ्ऱीका के यूरोपियन इस्लाम से नहीं डरते हैं, लेकिन वास्तव में वह इस बात से डरते हैं कि अगर इस्लाम कुबूल कर लिया तो वह श्वेत जातियों से बराबरी का अधिकार मांगने लगेंगे।आप उनको डरने दीजिए। अगर भाइ-भाई बनना पाप है, यदि वे इस बात से परेशान हैं कि उनका नस्ली बड़प्पन कायम न रह सके तो उनका डरना उचित है, क्योंकि मैंने देखा है कि अगर एक जूलो ईसाई हो जाता है तो वह सफ़ेद रंग के ईसाइयों के बराबर नहीं हो सकता। किन्तु जैसे ही वह इस्लाम ग्रहण करता है, बिल्कुल उसी वक्त वह उसी प्याले में पानी पीता है और उसी तश्तरी में खाना खाता है जिसमें कोई और मुसलमान पानी पीता और खाना खाता है, तो वास्तविक बात यह है जिससे यूरोपियन कांप रहे हैं।’’जगत महर्षि, पृष्ठ 2इन्सानियत फिर ज़िन्दा हुई


स्वामी लक्ष्मण प्रसाद लिखते हैं‘‘आस्था, विश्वास, पूजा-अर्चना, नैतिकता, सामाजिकता के सम्पूर्ण आवाहक हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के आगमन से पहले दुनिया में कहीं कोई आशा की किरन दिखाई नहीं देती थी, विश्वव्यापी गुमराहियों और भयंकर अंधकार में कहीं सभ्यता और संस्कृति की रौशनी नज़र नहीं आती थी। जब शराफ़त का नामो-निशान मिट चुका था, जब प्रकृति का वास्तविक सौंदर्य और आध्यात्मिकता की सुन्दरता ईश्वर के इन्कार मिथ्याकर्म के अंधकारों में छिप गई थी, इन्सान ख़ुदा की कष्द्र और महत्ता को भूलकर अपने गले में कुकर्म और मूर्तिपूजा की लानत की ज़ंजीर पहन चुका था, एक बार इन्सानियत मरकर फिर ज़िन्दा हुई। एशिया महाद्वीप के दक्षिण-पश्चिम में एक बड़ा प्रायद्वीप है जो अरब के नाम से मशहूर है। इसी अज्ञानता और बुराई के केन्द्र अरब के फ़ारान पर्वत की चोटियों से एक नूर चमका जिसने दुनिया के हालात को आमूल रूप से बदल दिया। गोशा-गोशा नूरे-हिदायत से जगमगा दिया।आज से तेरह सौ सदियां पहले इसी गुमराह देश मक्का की गलियों से एक क्रान्तिकारी आवाज़ उठी जिसने जुल्म-सितम के वातावरण में तहलका मचा दिया। यहीं से मार्गदर्शन का वह स्रोत फूटा जिसने दिलों की मुरझाई हुई खेतियां सरसब्ज़ कर दीं। इसी रेगिस्तानी, चमनिस्तान में रूहानियत का वह फूल खिला जिसकी रूहपर्वर महक ने नास्तिकता की दुर्गन्ध से घिरे इन्सानों के दिल व दिमाग़ों को सुगन्धित कर दिया।’’अरब का चाँद, पुस्तक से एकेश्वरवाद का सदुपयोग


हिन्दी के वरिष्ठतम साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र लिखते हैं‘‘जिस समय अरब देशवाले बहुदेवोपासना के घोर अंधकार में फंस रहे थे, उस समय महात्मा मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने जन्म लेकर उनको एकेश्वरवाद का सदुपयोग दिया। अरब के पश्चिम में ईसा मसीह का भक्तिपथ प्रकाश पा चुका था, किन्तु वह मत अरब, फ़ारस इत्यादि देशों में प्रबल नहीं था और अरब जैसे कट्टर देश में महात्मा मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के अतिरिक्त और किसी का काम न था कि वहां कोई नया मत प्रकाश करता। उस काल के अरब के लोग मूर्ख, स्वार्थ-तत्पर, निर्दय और वन्य-पशुओं की भांति कट्टर थे। यद्यपि उनमें से अनेक लोग अपने को इब्राहीम अ़लैहिस्सलाम के वंश का बतलाते और मूर्ति पूजा बुरी जानते किन्तु समाज परवश होकर सब बहुदेव उपासक बने हुए थे। इसी घोर समय में मक्के से मुहम्मद चन्द्र उदय हुआ और एक ईश्वर का पथ परिष्कार रूप से सबको दिखाई पड़ने लगा।’’


भारतेन्दु हरिश्चन्द्र समग्रसमस्त मानवजाति के मार्गदर्शकलाला काशीराम चावला ‘ऐ मुस्लिम भाई’ में लिखते हैं
‘‘समस्त धर्मों के प्रणेता और संस्थापक, बड़े-बड़े घरानों में पैदा हुए और उनकी पैदाइश पर बड़ी धूम-धाम मची, बड़े हर्ष वाद्य बजे। उदाहरणतः हज़रत ईसा अ़लैहिस्सलाम, बुद्व-भगवान, हज़रत मूसा अ़लैहिस्सलाम, भगवान कृष्ण, भगवान महावीर, गुरू नानक सबका बचपन नितांत लाड-प्यार और शानो-शौकत से गुज़रा। लेकिन आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के कष्टों का आरंभ जन्म से पहले ही हो चुका था।अभी आप माता के गर्भ ही में थे कि पिता का देहांत हो गया। छः वर्ष की अवस्था में मातृ-प्रेम से भी वंचित हो गये। दो साल दादा की गोद में खेले और आठवें वर्ष वे भी स्वर्ग सिधार गये और फिर आपके चाचा ने संभाला। इस प्रकार बचपन में शिक्षा-दीक्षा और सुख- शान्ति के समस्त साधन लुप्त हो गये। क्या वह ईश्वरीय चमत्कार नहीं कि ऐसी दशा में पला हुआ व्यक्ति आज मानवजाति के एक विशाल समूह का पथप्रदर्शक और नेता स्वीकार किया जा रहा है और उसने अरब जैसे बर्बर देश से निराश्रित अवस्था में संसार- निवासियों को मानवता का सन्देश दिया।किसे पता था कि ऐसा अप्रसिद्ध परिवार में जन्म लेने वाला अनपढ़ और अनाथ बालक अरब से अज्ञानता का नामो-निशान मिटाने वाला सुधारक बनेगा? समूचे संसार में इस्लामी पताका लहराने वाला रसूल होगा। कुरआन शरीफ़ का सन्देश पहुंचाने वाला नबी होगा? मूर्खों में महत्वपूर्ण क्रान्ति उत्पन्न करने वाला सुधारक होगा और एक बिल्कुल अनोखे नवीन धर्म का प्रकाश दिखाएगा? नितांत अल्प समय में स्वयं अशिक्षित होते हुए भी अपने बौद्विक ज्ञान से समस्त संसार के एक बहुत बड़े भाग को शिक्षा और ज्ञान से परिपूर्ण कर देगा? ऐसे ज्ञान से जो विश्व के समस्त मनुष्यों के लिए एक अनुकरणीय आदर्श है।आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने उदारता और समता, सत्य और न्याय एवं पड़ौसियों के स्वतत्वों का जो आदर्श संसार में स्थापित किया है, उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम के सुव्यवहार और समता-भाव का यह हाल था कि आपने अपने संपूर्ण जीवन में कभी किसी दास या बालक या पशू तक को न मारा, न किसी को अपशब्द कहा, एक बार बिल्ली को प्यासा देखा तो वुजू के लोटे से पानी पिलाया। इसी तरह एक बार एक बिल्ली आपके बिस्तर पर सोई हुई थी, आपने उसे उस सुख से वंचित न किया, चिड़ियों और चींटियों के मारने के विरूद्ध आदेश दिया, कुत्तों को पानी पिलाने वालों के अपराध क्षमा किये। युद्ध के बन्दियों का सम्मान किया। नितांत महत्वपूर्ण युद्ध-नियम निर्माण किये, जिसमें स्त्री, बालक, वृद्ध, सोये हुए और निहत्थे पर अस्त्रा चलाने की मनाही की। फ़सलों और मकानों को हानि पहुंचाने से रोका।आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अन्य जातियों के सरदारों का आदर-सत्कार करते थे। अन्य धर्मों के विद्वानों और प्रतिष्ठित जनों से सम्मानपूर्वक मिलते थे। जहां अपने प्रिय अनुयायियों के लिए दिन-रात ईश्वर से प्रार्थना करते रहते थे, वहीं विरोधियों और शत्रुओं के लिए भी प्रार्थना करते थे। जब उहुद के युद्ध में आपके मुख पर पत्थर मारे गये और आपके दांत शहीद हो गये तो आपने फ़रमायाः ‘‘हे मेरे ईश्वर! तू मेरी जाति के इन लोगों को क्षमा प्रदान कर, क्योंकि निस्सन्देह वे नहीं जानते (कि वे क्या कर रहे हैं)।’’आपकी दानशीलता और उदार हृदयता अद्वितीय थी। प्रार्थी किसी धर्म या सम्प्रदाय का हो आपके द्वार से निराश न लौट सकता था। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का यह आदेश था कि सृष्टि के प्राणियों पर दया करो, ईश्वर से डरो। आप कष्र्ज़ लेकर भी लोगों की ज़रूरतें पूरी किया करते थे। आपकी आज्ञा थी कि (युद्ध में) दुश्मन की लाश नष्ट न की जाए, औरतों और बच्चों की हत्या न की जाए, शरीर के अंगो को काट-काटकर प्राण-वध न किया जाए, न शरीर के किसी भाग को जलाया जाए।आपकी सत्यप्रियता, शुद्ध हृदयता, ईमानदारी और न्यायशीलता की प्रशंसा न केवल मुसलमान, बल्कि अबू जहल और अबू सुफ़यान जैसे ख़ून के प्यासे दुश्मनों ने भी की, और इन्सान की वास्तविक प्रशंसा वही है जो विरोधी को भी मान्य हो और सच्ची बुराई वह होती है जिसे मित्रा भी निःसंकोच कह दे।


क्या वह आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम का चमत्कार नहीं है कि अरब के जाहिल, अक्खड़, लड़ाके, झगड़ालू, अंधविश्वासी, जुआरी, शराबी, डाकू, व्यभिचारी, प्रतिज्ञा-भंग, कन्यावध, सौतेली माताओं से विवाह करने वाले लोग आज सीधे-सादे यात्रियों और अतिथियों का आदर-सत्कार करने वाले, मेहनती, ईमानदार, सहायक, आज्ञापालक, समतावादी और ईश्वर पूजक दिखायी देते हैं। यह आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम की शिक्षा का अलौकिक चमत्कार है कि इतने अल्प समय में इन लोगों के आचार-व्यवहार, स्वभाव, प्रकृति में एक असाधारण क्रान्ति उत्पन्न कर दी।आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने इतने अधिक प्रभाव और अधिकार के बाद भी कभी अपने स्वभाव में परिवर्तन न होने दिया। एक यात्रा में भोजन तैयार न था। आपके साथियों ने मिलकर भोजन बनाने का निश्चय किया, लोगों ने एक-एक काम बांट लिया। साथियों के रोकने के बावजूद जंगल से लकड़ी लाने का काम आपने स्वंय लिया और फ़रमायाः ‘‘कोई कारण नहीं कि मैं अपने आपको श्रेष्ठ समझूं।’’बद्र की लड़ाई में सवारियों की संख्या कम थी। बारी-बारी लोग सवार होते थे, आप भी इसी प्रकार अपनी बारी पर चढ़ते और पैदल चलते।आपकी सादा ज़िन्दगी कहावत की सीमा तक पहुंच चुकी है। यह पहले लिखा जा चुका है कि आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अपने घर का काम-काज अपने हाथ से स्वयं करते थे, कपड़ों में पेवंद लगाना, फटे जूते गांठना, झाडू देना, दूध दुहना, बाज़ार से सौदा-सुल्फ़ लाना आदि, यह सब काम हज़रत की दिनचर्या में सम्मिलित थे। दिखावे और आडमब्र को बिल्कुल पसन्द न फ़रमाते थे। मोटे, फटे कपड़े पहनते, कुर्ते का तुक्मा खुला होता था, बनाव-सिंगार को नापसंद करते थे। एक बार आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम अपनी प्रिय सुपुत्री फ़ातिमा ज़ोहरा रज़ियल्लाहु अ़न्हा के घर गये। लेकिन दीवारों पर पर्दे लटके हुए देखकर वापस चले आये। कारण पूछने पर आपने फ़रमायाः‘‘जिस घर में बनावट-सजावट में दिल लगा रहता हो, वहां मैं नहीं जा सकता।’’ऐसा क्यों था? इसलिए कि उनके पास वह ईश्वरीय आदेश पहुंच चुका था कि ईश्वरीय प्रेम के सम्मुख सांसारिक प्रेम तुच्छ है।कुरआन में एक जगह कहा गया हैः‘‘ऐ (ईश्वर पर) विश्वास रखने वालो! तुम्हें तुम्हारे (सांसारिक) धन और संतान ईश्वर उपासना से ग़ाफ़िल न कर दें, और जो ऐसा करेगा वह हानि उठाने वालों में है।’’आप सारी-सारी रात ईश्वर की उपासना में लीन रहते थे। जब घर के लोग सो जाते तो आप चुपचाप बिस्तर से उठकर ईश्वर-स्मरण में लग जाते। आपकी सुपत्नी हज़रत आइशा सिद्दीक रज़ियल्लाहु अ़न्हा फ़रमाती हैं कि एक रात मेरी आँख खुली तो आपको बिस्तर पर न पाया, मैं समझी आप किसी और हरम (पत्नी) के हुज्रे (कमरे) में तशरीफ़ ले गये हैं, किन्तु अंधेरे में टटोला तो मालूम हुआ कि आपका पवित्रा मस्तक धरती पर है और आप ईश्वर-प्रार्थना में लीन हैं। यह देखकर आप बहुत लज्जित हुईं कि आपका विचार क्या था और आप किस दशा में हैं। इसी का नाम इस्लाम है। इस्लाम का अर्थ हैः ईश्वर के आगे नतमस्तक हो जाना। आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम मानो हर समय ईश्वर के सम्मुख उपस्थित रहते थे। आपने युद्ध-क्षेत्र में भी कभी नमाज़ नहीं छोड़ी।ईश्वर पर आपका अटूट विश्वास था। आपका कथन है कि अगर जूती का तसमा भी टूटे तो ईश्वर ही से मांगो। एक बार आपकी प्रिय सुपुत्राी हज़रत फ़ातिमा रजिष्यल्लाहु अ़न्हा घरेलू कामों की अधिकता के कारण आपकी सेवा में उपस्थित हुई और बहुत डरते-डरते एक सेविका के लिए प्रार्थना की, तो आपने फ़रमायाः‘‘ऐ प्यारी बेटी! तू ईश्वर पर भरोसा रख और उसका हकष् अदा (स्वत्वपूर्ति) कर। अपने घर वालों की सेवा स्वयं कर। अगर तू किसी समय थकन अनुभव करे तो ‘सुब्हान अल्लाह’ (ईश्वर पवित्रा है) 33 बार, ‘अल्हम्दुलिल्लाह’ (सारी प्रशंसा ईश्वर के लिए है) 33 बार, ‘अल्लाहु अक्बर’ (ईश्वर ही सबसे बड़ा है) 34 बार पढ़ लिया कर, तेरी सारी थकन दूर हो जाया करेगी।’’इसका नाम है सच्ची भक्ति! इसका नाम है सच्ची ईश्वर-उपासना! इसका नाम है ईश्वर-प्रेम!आप सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम फ़रमाया करते थे, ‘‘मुसलमान की सबसे पहली निशानी यह है कि वह ईश्वर और किष्यामत के दिन के हिसाब- किताब से डरे।’’ ‘ऐ मुस्लिम भाई’, पृष्ठ 252 से


दयानिधि श्री देवदास गांधी, जो दिवंगत महात्मा गांधी के पुत्र हैं, अपने एक निबंध में लिखते हैं‘‘एक महान शक्तिशाली सूर्य के समान ईश्वर-दूत हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अ़लैहि वसल्लम ने अरब की मरूभूमि को उस समय रौशन किया, जब मानव-संसार घोर अंधकार में लीन था और जब आप इस दुनिया से विदा हुए तो आप अपना सब काम पूर्ण रूप से पूरा कर चुके थे, वह पवित्रतम काम जिससे दुनिया को स्थायी लाभ पहुंचने वाला था। दुनिया के सच्चे पथ-प्रदर्शक बहुत थोड़े हुए हैं और उनके युगों में एक-दूसरे से बहुत अन्तर रहा है और वे लोग कि जिन्होंने मुहम्मद साहब के जीवन-चरित्र का अध्ययन उसी श्रद्धा के साथ किया है, जिसके वे अधिकारी हैं, इस बात के मानने पर बाध्य हैं कि आप महान धर्म-उपदेशकों में से एक थे। आपकी महानता और गुरूता में उस समय और भी वृद्धि हो जाती है, जबकि आपका चित्रा खींचते वक्त हम उस नितांत आध्यात्मिक और नैतिक ह्नास की पृष्ठभूमि पर भी दृष्टि रखें जो आपके जन्म के समय अरब में विद्यमान थी। मुहम्मद साहब एक सभ्य और उन्नतशील वातावरण की पैदावार न थे। आपके समय में एक आदमी भी ऐसा नहीं था जिससे आप ब्रहम्वाद की शिक्षा ग्रहण करते, उस काल में ईश्वरीय धर्म के लिए तो अरब में जगह ही न थी, वह देश अपने अंधकारमय काल से गुज़र रहा था। जब ख़राबी और पतन अपनी सीमा को पहुंच गया तो उस समय आप ईश्वरीय अनुकंपा बनकर उदित हुए। ऐसी दशा में यदि उन्हें ‘रहमतुल लिल् आलमीन’ (संसार के लिए दयानिधी) की पद्वी दी जाती है, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?आपकी अदर्श जीवनी हमें बताती है कि आपने अपने उपदेश और प्रचार का जीवन भर यही नियम रखा कि जो कुछ अपने अनुयायियों को सिखाना चाहते थे, पहले वह सब स्वयं करके दिखा दिया और कभी किसी ऐसे कार्य की शिक्षा न दी जिसका उदाहरण आपने उपस्थित न कर दिया हो।आपके पवित्रा जीवन में उस समय भी किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं आया, जबकि आप पैग़म्बर के पद पर शोभायमान हो गये। आपने सम्पूर्ण जीवन उसी सरलता और सादगी से व्यतीत किया। सांसारिक सुख और जीवन के भोग-विलास उस समय भी आपको अपनी ओर आकर्षित न कर सके जब एक से अधिक साम्राज्यों का धन आपके चरणों में अर्पित हो रहा था। आपका भोजन बहुत ही सादा और थोड़ा होता था और उसे भी केवल इसलिए खाते थे कि जीवित रह सकें। चटाइयां और टाट आपके बिस्तर थे और इसी तरह पहनने के कपड़े भी बहुत साधारण होते थे। आपने कभी किसी को कटुवचन नहीं कहा, यहां तक कि लड़ाई के अवसर पर भी दुश्मनों के साथ आपका स्वर कोमल होता था। सत्य यह है कि आपको अपनी इच्छाओं और मनोभावों पर पूरा-पूरा संयम प्राप्त था। गीता में कर्मयोगी के जो गुण बताये गये हैं, वह सबके सब आपमें पूर्णतया मौजूद थे।आप अपने अप्रिय कर्तव्यों को भी सच्चे ईमान और सच्ची वीरता के साथ पूर्ण किया करते थे और इच्छाएं या घमंड कभी आपके पगों में कम्पन उत्पन्न नहीं कर सकता था। कर्मयोगी उस व्यक्ति को कहते हैं जो अपने उत्तम विचारों को भी कार्य रूप में परिणत कर दे, और मुहम्मद साहब एक ऐसे ही व्यक्ति थे। एक नश्वर मनुष्य होते हुए भी आप अलौकिक गुण रखते थे। सुख- दुख, हर्ष, क्षोभ, जिनके प्रभावों के अन्तर्गत हम साधारण मनुष्यों के जीवन व्यतीत होते हैं और जो वास्तव में हमारे जीवन में क्रान्ति उत्पन्न कर देते हैं, उनसे यह पवित्रा और महान आत्मा कभी प्रभावित न होती थी।जो लोग समाज की वर्तमान व्यवस्था और प्रणाली को परिवर्तित करने में लगे हुए हैं और चाहते हैं कि इससे अच्छे समाज को जन्म दें, उनके दिलों पर जिस बात का गहरा प्रभाव पड़ेगा वह पैग़म्बर साहब का वह उच्च आदर्श है जिसे उन्होंने मेहनत-मज़दूरी के संबंध में कषयम किया। इस ईशदूत ने ऐसे बहुत से अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित किये हैं, जिन्हें लोगों ने भुला दिया है। उनमें से एक यह है कि आप अपने कपड़ों की स्वयं मरम्मत करते थे। यही नहीं बल्कि अपने जूते भी ख़ुद ही टांकते थे। आप घर के काम-काज में प्रायः अपने सेवकों की सहायता करते थे। मस्जिद के निर्माण में आपने मज़दूरों के साथ बराबर काम किया है। मज़दूरों के साथ काम करते वक्त आप उनमें इस प्रकार घूल-मिल जाते थे कि कोई उन्हें पहचान न सकता था।बच्चों से आपको विशेष लगाव था और उनके साथ आप बहुत प्रसन्न रहते थे। वे सौभाग्यशाली बच्चे जो आपके जीवनकाल में थे और जिन्हें आपका प्रेम प्राप्त रहा, अपने घरों में इतने प्रसन्न नहीं रहते थे जितना आपके साथ। बच्चों के साहचर्य में उठना-बैठना आपके लिए कोई इत्तिफ़ाकी बात न थी, बल्कि यह आपका नियम और कार्यक्रम था कि बच्चों को ढूंढ़कर उनके साथ हो जाते और अपने उत्तम विचार उनके मस्तिष्क में अर्पित कर देते। क्या शिक्षा और उपदेश का इससे अधिक स्वाभाविक और सरल ढंग कोई हो सकता है? मासिक ‘पेशवा’, दिल्ली, जुलाई 1931 ई.


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