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अल्लाह साकार है अथवा निराकार?

साकार या निराकार की अवधारणा की जगह, वह कुरआन में अपने बारे बताता है कि:


Say: He is Allah, the One and Only! Allah, the Eternal, Absolute; He begetteth not nor is He begotten. And there is none like unto Him. [112:1-4]


कहो: "वह अल्लाह यकता (अकेला ) है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य (अर्थात न वह किसी का बाप / माँ है और न बेटा / बेटी), और न कोई उसका समकक्ष है.

ऊपर वर्णित 'सूराह इखलास' कुरआन की एक बहुत ही महत्वपूर्ण है सूराह है, क्योंकि यह ईश्वर की अखंडता (Tawhid) और बेनियाज़ / निरपेक्ष / असीमित प्रकृति की पहचान बताती है. इससे पता चलता है कि ईश्वर शाश्वत (अर्थात अनन्त / सार्वकालिक / सनातन) है. अर्थात, वह समय और स्थान की सीमा से परे है. वह (एक मां की तरह बच्चे को) जन्म नहीं देता है और न ही उसे किसी ने जन्म दिया है. और आखिरी श्लोक से पता चलता है कि जिस चीज़ की किसी से तुलना की जा सकती है वह ईश्वर नहीं हो सकता है.

इससे पता चलता है कि वह कुछ करने के लिए किसी चीज़ का मोहताज नहीं है, जैसे वह बोलने के लिए मुंह की आवश्यकता से परे है, क्योंकि किसी भी कार्य के लिए किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं है.  जब उसने दुनिया बनाने का फैसला किया तो कहा 'कुन' अर्थात 'हो जा' और वह 'फया कुन' अर्थात हो गई.

यहाँ यह भी जान लेना ज़रूरी है कि वह हमेशा ही हर एक कार्य को करने की पद्धति बनता है, यह उसका तरीका है, हालाँकि उस पद्धति का वह खुद भी मोहताज नहीं है. जैसे कि बच्चे को पैदा करने के लिए नर और नारी के मिलन को तरीका बनाया और पैदाइईश का समय तय किया, लेकिन वहीँ उसने 'ईसा मसीह' को बिना पिता के पैदा किया और पहले पुरुष को बिना माँ-बाप के पैदा किया. ऐसा इसलिए जिससे कि वह मनुष्यों को यह अहसास दिला सके कि बेनियाज़ है अर्थात संसार को चलाने के लिए पद्धति बनता अवश्य है लेकिन उस पद्धति का मोहताज नहीं है.

- Shahnawaz Siddiqui

पैग़म्बर ए इस्लाम हज़रत मोहम्मद (स.अ.व) के कुछ कथन


पैग़म्बरे इस्लाम (स.) की एक सौ हदीसें लिख रहें हैं, जिन पर अमल कर के हम अपनी दीनी व दुनयवी ज़िन्दगी को कामयाब बना सकते हैं।

 

 

1.       आदमी जैसे जैसे बूढ़ा होता जाता है उसकी हिरस व तमन्नाएं जवान होती जाती हैं।
2.       अगर मेरी उम्मत के आलिम व हाकिम फ़ासिद होंगे तो उम्मत फ़ासिद हो जायेगी और अगर यह नेक होंगें तो उम्मत नेक होगी।
3.       तुम सब, आपस में एक दूसरे की देख रेख के ज़िम्मेदार हो।
4.       माल के ज़रिये सबको राज़ी नही किया जा सकता, मगर अच्छे अख़लाक़ के ज़रिये सबको ख़ुश रखा जा सकता है।
5.       नादारी एक बला है, जिस्म की बीमारी उससे बड़ी बला है और दिल की बीमारी (कुफ़्र व शिर्क) सबसे बड़ी बला है।
6.       मोमिन हमेशा हिकमत की तलाश में रहता है।
7.       इल्म को बढ़ने से नही रोका जा सकता।
8.       इंसान का दिल, उस “ पर ” की तरह है जो बयाबान में किसी दरख़्त की शाख़ पर लटका हुआ हवा के झोंकों से ऊपर नीचे होता रहता है।
9.       मुसलमान, वह है, जिसके हाथ व ज़बान से मुसलमान महफ़ूज़ रहें।
10.   किसी की नेक काम के लिए राहनुमाई करना भी ऐसा ही है, जैसे उसने वह नेक काम ख़ुद किया हो।
12.   माँ के क़दमों के नीचे जन्नत है।
13.   औरतों के साथ बुरा बर्ताव करने में अल्लाह से डरों और जो नेकी उनके शायाने शान हो उससे न बचो।
14.   तमाम इंसानों का रब एक है और सबका बाप भी एक ही है, सब आदम की औलाद हैं और आदम मिट्टी से पैदा हुए है लिहाज़ तुम में अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा अज़ीज़ वह है जो तक़वे में ज़्यादा है।
15.   ज़िद, से बचो क्योंकि इसकी बुनियाद जिहालत है और इसकी वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़ती है।
16.   सबसे बुरा इंसान वह है, जो न दूसरों की ग़लतियों को माफ़ करता हो और न ही दूसरों की बुराई को नज़र अंदाज़ करता हो, और उससे भी बुरा इंसान वह है जिससे दूसरे इंसान न अमान में हो और न उससे नेकी की उम्मीद रखते हों।
17     ग़ुस्सा न करो और अगर ग़ुस्सा आ जाये, तो अल्लाह की क़ुदरत के बारे में ग़ौर करो।
18     जब तुम्हारी तारीफ़ की जाये, तो कहो, ऐ अल्लाह ! तू मुझे उससे अच्छा बना दे जो ये गुमान करते है और जो यह मेरे बारे में नही जानते उसको माफ़ कर दे और जो यह कहते हैं मुझे उसका मसऊल क़रार न दे।
19     चापलूस लोगों के मूँह पर मिट्टी मल दो। (यानी उनको मुँह न लगाओ)
20     अगर अल्लाह किसी बंदे के साथ नेकी करना चाहता है, तो उसके नफ़्स को उसके लिए रहबर व वाइज़ बना देता है।
21     मोमिन हर सुबह व शाम अपनी ग़लतियों का गुमान करता है।
22     आपका सबसे बड़ा दुश्मन नफ़्से अम्मारह है, जो ख़ुद आपके अन्दर छुपा रहता है।
23     सबसे बहादुर इंसान वह हैं जो नफ़्स की हवा व हवस पर ग़ालिब रहते हैं।
24     अपने नफ़्स की हवा व हवस से लड़ो, ताकि अपने वुजूद के मालिक बने रहो।
25     ख़ुश क़िस्मत हैं, वह लोग, जो दूसरों की बुराई तलाश करने के बजाये अपनी बुराईयों की तरफ़ मुतवज्जेह रहते हैं।
26     सच, से दिल को सकून मिलता है और झूट से शक व परेशानियाँ बढ़ती है।
27     मोमिन दूसरों से मुहब्बत करता है और दूसरे उससे मुहब्बत करते हैं।
28     मोमेनीन आपस में एक दूसरे इसी तरह वाबस्ता रहते हैं जिस तरह किसी इमारत के तमाम हिस्से आपस में एक दूसरे से वाबस्ता रहते हैं।
29     मोमेनीन की आपसी दोस्ती व मुब्बत की मिसाल जिस्म जैसी है जब ज़िस्म के एक हिस्से में दर्द होता है तो पर बाक़ी हिस्से भी बे आरामी महसूस करते हैं।
30     तमाम इंसान कंघें के दाँतों की तरह आपस में बराबर हैं।
31     इल्म हासिल करना तमाम मुसलमानों पर वाजिब है।
32     फ़कीरी, जिहालत से, दौलत, अक़्लमंदी से और इबादत, फ़िक्र से बढ़ कर नही है।
33     झूले से कब्र तक इल्म हासिल करो।
34     इल्म हासिल करो चाहे वह चीन में ही क्योँ न हो।
35     मोमिन की शराफ़त रात की इबादत में और उसकी इज़्ज़त दूसरों के सामने हाथ न फैलाने में है।
36     साहिबाने इल्म, इल्म के प्यासे होते है।
37     लालच इंसान को अंधा व बहरा बना देता है।
39     परहेज़गारी, इंसान के ज़िस्म व रूह को आराम पहुँचाती है।
40     अगर कोई इंसान चालीस दिन तक सिर्फ़ अल्लाह के लिए ज़िन्दा रहे, तो उसकी ज़बान से हिकमत के चश्मे जारी होंगे।
41     मस्जिद के गोशे में तन्हाई में बैठने से ज़्यादा अल्लाह को यह पसंद है, कि इंसान अपने ख़ानदान के साथ रहे।
42     आपका सबसे अच्छा दोस्त वह है, जो आपको आपकी बुराईयों की तरफ़ तवज्जोह दिलाये।
43     इल्म को लिख कर महफ़ूज़ करो।
44     जब तक दिल सही न होगा, ईमान सही नही हो सकता और जब तक ज़बान सही नही होगी दिल सही नही हो सकता।
46     तन्हा अक़्ल के ज़रिये ही नेकी तक पहुँचा जा सकता है लिहाज़ा जिनके पास अक़्ल नही है उनके पास दीन भी नही हैं।
47     नादान इंसान, दीन को, उसे तबाह करने वाले से ज़्यादा नुक़्सान पहुँचाते हैं।
48     मेरी उम्मत के हर अक़्लमंद इंसान पर चार चीज़ें वाजिब हैं। इल्म हासिल करना, उस पर अमल करना, उसकी हिफ़ाज़त करना और उसे फैलाना।
49     मोमिन एक सुराख़ से दो बार नही डसा जाता।
50     मैं अपनी उम्मत की फ़क़ीरी से नही, बल्कि बेतदबीरी से डरता हूँ।
51     अल्लाह ज़ेबा है और हर ज़ेबाई को पसंद करता है।
52     अल्लाह, हर साहिबे फ़न मोमिन को पसंद करता।
53     मोमिन, चापलूस नही होता।
54     ताक़तवर वह नही,जिसके बाज़ू मज़बूत हों, बल्कि ताक़तवर वह है जो अपने ग़ुस्से पर ग़ालिब आ जाये।
56     सबसे अच्छा घर वह है, जिसमें कोई यतीम इज़्ज़त के साथ रहता हो।
57     कितना अच्छा हो, अगर हलाल दौलत, किसी नेक इंसान के हाथ में हो।
58     मरने के बाद अमल का दरवाज़ा बंद हो जाता है,मगर तीन चीज़े ऐसी हैं जिनसे सवाब मिलता रहता है, सदक़-ए-जारिया, वह इल्म जो हमेशा फ़ायदा पहुँचाता रहे और नेक औलाद जो माँ बाप के लिए दुआ करती रहे।
59     अल्लाह की इबादत करने वाले तीन गिरोह में तक़सीम हैं। पहला गिरोह वह है जो अल्लाह की इबादत डर से करता है और यह ग़ुलामों वाली इबादत है। दूसरा गिरोह वह जोअल्लाह की इबादत इनाम के लालच में करता है और यह ताजिरों वाली इबादत है। तीसरा गिरोह वह है जो अल्लाह की इबादत उसकी मुहब्बत में करता है और यह इबादत आज़ाद इंसानों की इबादत है।
60     ईमान की तीन निशानियाँ हैं, तंगदस्त होते हुए दूसरों को सहारा देना, दूसरों को फ़ायदा पहुँचाने के लिए अपना हक़ छोड़ देना और साहिबाने इल्म से इल्म हासिल करना।
61     अपने दोस्त से दोस्ती का इज़हार करो ताकि मुब्बत मज़बूत हो जाये।
62     तीन गिरोह दीन के लिए ख़तरा हैं, बदकार आलिम, ज़ालिम इमाम और नादान मुक़द्दस।
63     इंसानों को उनके दोस्तों के ज़रिये पहचानों, क्योँकि हर इंसान अपने हम मिज़ाज़ इंसान को दोस्त बनाता है।
64     गुनहाने पिनहनी (छुप कर गुनाह करना) से सिर्फ़ गुनाह करने वाले को नुक़्सान पहुँचाता है लेकिन गुनाहाने ज़ाहिरी (खुले आम किये जाने वाले गुनाह) पूरे समाज को नुक़्सान पहुँचाते है।
65     दुनिया के कामों में कामयाबी के लिए कोशिश करो मगर आख़ेरत के लिए इस तरह कोशिश करो कि जैसे हमें कल ही इस दुनिया से जाना है।
66     रिज़्क़ को ज़मीन की तह में तलाश करो।
67     अपनी बड़ाई आप बयान करने से इंसान की क़द्र कम हो जाती है और इनकेसारी से इंसान की इज़्ज़त बढ़ती है।
68     ऐ अल्लाह ! मेरी ज़्यादा रोज़ी मुझे बुढ़ापे में अता फ़रमाना।
69     बाप पर बेटे के जो हक़ हैं उनमें से यह भी हैं कि उसका अच्छा नाम रखे, उसे इल्म सिखाये और जब वह बालिग़ हो जाये तो उसकी शादी करे।
70     जिसके पास क़ुदरत होती है, वह उसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करता है।
71     सबसे वज़नी चीज़ जो आमाल के तराज़ू में रखी जायेगी वह ख़ुश अखलाक़ी है।
72     अक़्लमंद इंसान जिन तीन चीज़ों की तरफ़ तवज्जोह देते हैं, वह यह हैं ज़िंदगी का सुख, आखेरत का तोशा (सफ़र में काम आने वाले सामान) और हलाल ऐश।
73     ख़ुश क़िसमत हैं, वह इंसान, जो ज़्यादा माल को दूसरों में तक़सीम कर देते हैं और ज़्यादा बातों को अपने पास महफ़ूज़ कर लेते हैं।
74     मौत हमको हर ग़लत चीज़ से बे नियाज़ कर देती है।
75     इंसान हुकूमत व मक़ाम के लिए कितनी हिर्स करता है और आक़िबत में कितने रंज व परेशानियाँ बर्दाश्त करता है।
76     सबसे बुरा इंसान, बदकार आलिम होता है।
77     जहाँ पर बदकार हाकिम होंगे और जाहिलों को इज़्ज़त दी जायेगी वहाँ पर बलायें नाज़िल होगी।
78     लानत हो उन लोगों पर जो अपने कामों को दूसरों पर थोपते हैं।
79     इंसान की ख़ूबसूरती उसकी गुफ़्तुगू में है।
80     इबादत की सात क़िस्में हैं और इनमें सबसे अज़ीम इबादत रिज़्क़े हलाल हासिल करना है।
81     समाज में आदिल हुकूमत का पाया जाना और क़ीमतों का कम होना, इंसानों से अल्लाह के ख़ुश होने की निशानी है।
82     हर क़ौम उसी हुकूमत के काबिल है जो उनके दरमियान पायी जाती है।
83     ग़लत बात कहने से कीनाह के अलावा कुछ हासिल नही होता।
85     जो काम बग़ैर सोचे समझे किया जाता है उसमें नुक़्सान का एहतेमाल पाया जाता है।
87     दूसरों से कोई चीज़ न माँगो, चाहे वह मिस्वाक करने वाली लकड़ी ही क्योँ न हो।
88     अल्लाह को यह पसंद नही है कि कोई अपने दोस्तों के दरमियान कोई खास फ़र्क़ रखे।
89     अगर किसी चीज़ को फाले बद समझो, तो अपने काम को पूरा करो, अगर कोई किसी बुरी चीज़ का ख़्याल आये तो उसे भूल जाओ और अगर हसद पैदा हो तो उससे बचो।
90     एक दूसरे की तरफ़ मुहब्बत से हाथ बढ़ाओ क्योँकि इससे कीनह दूर होता है।
91     जो सुबह उठ कर मुसलमानों के कामों की इस्लाह के बारे में न सोचे वह मुसलमान नही है।
92     ख़ुश अख़लाकी दिल से कीनह को दूर करती है।
93     हक़ीक़त कहने में, लोगों से नही डरना चाहिए।
94     अक़लमंद इंसान वह है जो दूसरों के साथ मिल जुल कर रहे।
95     एक सतह पर ज़िंदगी करो ताकि तुम्हारा दिल भी एक सतह पर रहे। एक दूसरे से मिलो जुलो ताकि आपस में मुहब्बत रहे।
96     मौत के वक़्त, लोग पूछते हैं कि क्या माल छोड़ा और फ़रिश्ते पूछते हैं कि क्या नेक काम किये।
97     वह हलाल काम जिससे अल्लाह को नफ़रत है, तलाक़ है।
98     सबसे बड़ा नेक काम, लोगों के दरमियान सुलह कराना।
99     ऐ अल्लाह तू मुझे इल्म के ज़रिये बड़ा बना, बुर्दुबारी के ज़रिये ज़ीनत दे, परहेज़गारी से मोहतरम बना और तंदरुस्ती के ज़रिये खूबसूरती अता कर।

इस्लाम का इतिहास

आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। लेकिन वास्तव में इस्लाम 1400 वर्षों से काफ़ी पुराना धर्म है; उतना ही पुराना जितना धरती पर स्वयं मानवजाति का इतिहास और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इसके प्रवर्तक (Founder) नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक हैं। आपका काम उसी चिरकालीन / सनातन धर्म की ओर, जो सत्यधर्म के रूप में आदिकाल से ‘एक’ ही रहा है, लोगों को बुलाने, आमंत्रित करने और स्वीकार करने के आह्वान का था। आपका मिशन, इसी मौलिक मानव धर्म को इसकी पूर्णता के साथ स्थापित कर देना था ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यावहारिक रूप साक्षात् रूप में आ जाए।


इस्लाम का इतिहास जानने का अस्ल माध्यम स्वयं इस्लाम का मूल ग्रंथ ‘क़ुरआन’ है। और क़ुरआन, इस्लाम का आरंभ प्रथम  मनुष्य ‘आदम’ से होने का ज़िक्र करता है। इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए क़ुरआन ने ‘मुस्लिम’ शब्द का प्रयोग हज़रत इबराहीम (अलैहि॰) के लिए किया है जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व एक महान पैग़म्बर (सन्देष्टा) हुए थे। हज़रत आदम (अलैहि॰) से शुरू होकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तक हज़ारों वर्षों पर फैले हुए इस्लामी इतिहास में असंख्य ईशसंदेष्टा ईश्वर के संदेश के साथ, ईश्वर द्वारा विभिन्न युगों और विभिन्न क़ौमों में नियुक्त किए जाते रहे। उनमें से 26 के नाम कु़रआन में आए हैं और बाक़ी के नामों का वर्णन नहीं किया गया है। इस अतिदीर्घ श्रृंखला में हर ईशसंदेष्टा ने जिस सत्यधर्म का आह्वान दिया वह ‘इस्लाम’ ही था; भले ही उसके नाम विभिन्न भाषाओं में विभिन्न रहे हों। बोलियों और भाषाओं के विकास का इतिहास चूंकि क़ुरआन ने बयान नहीं किया है इसलिए ‘इस्लाम’ के नाम विभिन्न युगों में क्या-क्या थे, यह ज्ञात नहीं है।


इस्लामी इतिहास के आदिकालीन होने की वास्तविकता समझने के लिए स्वयं ‘इस्लाम’ को समझ लेना आवश्यक है। इस्लाम क्या है, यह कुछ शैलियों में क़ुरआन के माध्यम से हमारे सामने आता है, जैसे:


1. इस्लाम, अवधारणा के स्तर पर ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ का नाम है। यहां ‘विशुद्ध’ से अभिप्राय है: ईश्वर के व्यक्तित्व, उसकी सत्ता व प्रभुत्व, उसके अधिकारों (जैसे उपास्य व पूज्य होने के अधिकार आदि) में किसी अन्य का साझी न होना। विश्व का...बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड और अपार सृष्टि का यह महत्वपूर्ण व महानतम सत्य मानवजाति की उत्पत्ति से लेकर उसके हज़ारों वर्षों के इतिहास के दौरान अपरिवर्तनीय, स्थायी और शाश्वत रहा है।


2. इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है।


इस्लाम की वास्तविकता, एकेश्वरवाद की हक़ीक़त, इन्सानों से एकेश्वरवाद के तक़ाज़े, मनुष्य और ईश्वर  के बीच अपेक्षित संबंध, इस जीवन के पश्चात (मरणोपरांत) जीवन की वास्तविकता आदि जानना एक शान्तिमय, सफल तथा समस्याओं, विडम्बनाओं व त्रासदियों से रहित जीवन बिताने के लिए हर युग में अनिवार्य रहा है; अतः ईश्वर ने हर युग में अपने सन्देष्टा (ईशदूत, नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त करने (और उनमें से कुछ पर अपना ‘ईशग्रंथ’ अवतरित करने) का प्रावधान किया है। इस प्रक्रम का इतिहास, मानवजाति के पूरे इतिहास पर फैला हुआ है।


4. शब्द ‘धर्म’ (Religion) को, इस्लाम के लिए क़ुरआन ने शब्द ‘दीन’ से अभिव्यक्त किया है। क़ुरआन में कुछ ईशसन्देष्टाओं के हवाले से कहा गया है (42:13) कि ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे ‘दीन’ को स्थापित (क़ायम) करें और इसमें भेद पैदा न करें, इसे (अनेकानेक धर्मों के रूप में) टुकड़े-टुकड़े न करें।


इससे सिद्ध हुआ कि इस्लाम ‘दीन’ हमेशा से ही रहा है। उपरोक्त संदेष्टाओं में हज़रत नूह (Noah) का उल्लेख भी हुआ है और हज़रत नूह (अलैहि॰) मानवजाति के इतिहास के आरंभिक काल के ईशसन्देष्टा हैं। क़ुरआन की उपरोक्त आयत (42:13) से यह तथ्य सामने आता है कि अस्ल ‘दीन’ (इस्लाम) में भेद, अन्तर, विभाजन, फ़र्क़ आदि करना सत्य-विरोधी है-जैसा कि बाद के ज़मानों में ईशसन्देष्टाओं का आह्वान व शिक्षाएं भुलाकर, या उनमें फेरबदल, कमी-बेशी, परिवर्तन-संशोधन करके इन्सानों ने अनेक विचारधाराओं व मान्यताओं के अन्तर्गत ‘बहुत से धर्म’ बना लिए।


मानव प्रकृति प्रथम दिवस से आज तक एक ही रही है। उसकी मूल प्रवृत्तियों में तथा उसकी मौलिक आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक आवश्यकताओं में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। अतः मानव का मूल धर्म भी मानवजाति के पूरे इतिहास में उसकी प्रकृति व प्रवृत्ति के ठीक अनुकूल ही होना चाहिए। इस्लाम इस कसौटी पर पूरा और खरा उतरता है। इसकी मूल धारणाएं, शिक्षाएं, आदेश, नियम...सबके सब मनुष्य की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुकूल हैं।


अतः यही मानवजाति का आदिकालीन तथा शाश्वत धर्म है।


क़ुरआन ने कहीं भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल्-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात् अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक) आदि शब्दों से कराया है।


स्वयं पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्तक’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया। आप (सल्ल॰) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, मेरे (ईशदूतत्व) द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि आप (सल्ल॰) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और आप (सल्ल॰) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (श्रृंखला) का इतिहास।


यह ग़लतफ़हमी फैलने और फैलाने में, कि इस्लाम धर्म की उम्र कुल 1400 वर्ष है दो-ढाई सौ वर्ष पहले लगभग पूरी दुनिया पर छा जाने वाले यूरोपीय (विशेषतः ब्रिटिश) साम्राज्य की बड़ी भूमिका है। ये साम्राज्यी, जिस ईश-सन्देष्टा (पैग़म्बर) को मानते थे ख़ुद उसे ही अपने धर्म का प्रवर्तक बना दिया और उस पैग़म्बर के अस्ल ईश्वरीय धर्म को बिगाड़ कर, एक नया धर्म उसी पैग़म्बर के नाम पर बना दिया। (ऐसा इसलिए किया कि पैग़म्बर के आह्वाहित अस्ल ईश्वरीय धर्म के नियमों, आदेशों, नैतिक शिक्षाओं और हलाल-हराम के क़ानूनों की पकड़ (Grip) से स्वतंत्र हो जाना चाहते थे, अतः वे ऐसे ही हो भी गए।) यही दशा इस्लाम की भी हो जाए, इसके लिए उन्होंने इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म (Muhammadanism)’ का और मुस्लिमों को ‘मुहम्मडन्स (Muhammadans)’ का नाम दिया जिससे यह मान्यता बन जाए कि मुहम्मद ‘इस्लाम के प्रवर्तक (Founder)’ थे और इस प्रकार इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष पुराना है। न क़ुरआन में, न हदीसों (पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ के कथनों) में, न इस्लामी इतिहास-साहित्य में, न अन्य इस्लामी साहित्य में...कहीं भी इस्लाम के लिए ‘मुहम्मडन-इज़्म’ शब्द और इस्लाम के अनुयायियों के लिए ‘मुहम्मडन’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, लेकिन साम्राज्यों की सत्ता-शक्ति, शैक्षणिक तंत्र और मिशनरी-तंत्र के विशाल व व्यापक उपकरण द्वारा, उपरोक्त मिथ्या धारणा प्रचलित कर दी गई।


भारत के बाशिन्दों में इस दुष्प्रचार का कुछ प्रभाव भी पड़ा, और वे भी इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म’ मान बैठे। ऐसा मानने में इस तथ्य का भी अपना योगदान रहा है कि यहां पहले से ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी, ‘‘बौद्ध धर्म’’ के; और महावीर जैन जी ‘‘जैन धर्म’’ के ‘प्रवर्तक’ के रूप में सर्वपरिचित थे। इन ‘धर्मों’ (वास्तव में ‘मतों’) का इतिहास लगभग पौने तीन हज़ार वर्ष पुराना है। इसी परिदृश्य में भारतवासियों में से कुछ ने पाश्चात्य साम्राज्यों की बातों (मुहम्मडन-इज़्म, और इस्लाम का इतिहास मात्र 1400 वर्ष की ग़लत अवधारणा) पर विश्वास कर लिया।



साभार: islamdharma.org

क्या शादी से पहले प्यार करना सही है?

क्या इस्लाम के अनुसार प्यार की कहानी के बाद की जाने वाली शादी अधिक ठीक है या वह शादी जिसे परिवार के लोग संगठित करते हैं ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

इस शादी का मामला इस आधार पर भिन्न होता है कि वह प्यार इस (शादी) से पूर्व कैसा था। यदि दोनों पक्षों के बीच जो प्यार था उसने अल्लाह तआला की शरीअत का उल्लंघन नहीं किया और दोनों साथी अवज्ञा (पाप) में नहीं पड़े; तो यह आशा की जाती है कि इस प्यार से निष्किर्षित होने वाली शादी अधिक स्थायी और स्थिर होगी; क्योंकि यह उन दोनों के एक दूसरे में रूचि रखने के नतीजे में हुई है।

यदि किसी आदमी का दिल किसी ऐसी औरत से लग जाये जिस से शादी करना उसके लिए जाइज़ है तो उसके लिए शादी के अलावा कोई अन्य समाधान नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: "प्रेमियों के लिए शादी के समान हमने कोई चीज़ नहीं देखी।" इसे इब्ने माजा (हदीस संख्या: 1847) ने रिवायत किया है, तथा बोसीरी ने इसे सहीह कहा है इसी तरह अल्बानी ने भी "अस्सिलसिला अस्सहीहा" (हदीस संख्या: 624) में इसे सहीह कहा है।

अल्लामा सिंधी कहते हैं -जैसा कि सुनन इब्ने माजा के हाशिया में है:

"आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फरमान "प्रेमियों के लिए शादी के समान हमने कोई चीज़ नहीं देखी।" में "प्रेमियों" के शब्द में दो और दो से अधिक दोनों की संभावना है, और सका अर्थ यह है कि: जब दो के बीच प्रेम हो तो उस प्रेम को शादी के समान कोई अन्य संबंध न बढ़ा सकता है और न ही उसे सदैव बाक़ी रख सकता है, यदि उनके बीच उस प्रेम के साथ शादी भी हो जाये तो वह प्रेम प्रति दिन बढ़ता ही जायेगा और उसमें शक्ति पैदा होगी। (सिंधी की बात समाप्त हुई)

और यदि यह शादी अवैध प्रेम संबंध के परिणाम में हुई है जैसे कि उस प्रेम में मुलाक़ातें, एकांत (खल्वत) और चुंबन और इसके समान अन्य चीज़ें होती थीं, तो वह शादी स्थिर नहीं होगी ; इस कारण कि इन लोगों ने शरीअत का उल्लंघन किया है और उस पर अपने जीवन का आधार रखा है जिसके परिणामस्वरूप बर्कत (ईश्वरीय आशीर्वाद) और तौफीक़ में कमी हो सकती है। क्योंकि पाप इस का सबसे बड़ा कारण हैं, यद्यपि बहुत से लोगों को शैतान के आकर्षण से यह प्रतीक होता हैं कि प्रेम -जबकि उसमें शरीअत का उल्लंघन पाया जाता है- शादी को अधिक मज़बूत बनाता है।

फिर ये अवैध संबंध जो उन दोनों के बीच शादी से पूर्व स्थापित थे उन दोनों में से हर एक के दूसरे के बारे में संदेह करने का कारण बन सकते हैं, चुनाँचि पति सोचे गा कि हो सकता है कि उसकी पत्नी इस तरह के (अवैध) संबंध उसके अलावा किसी और के साथ भी रखती रही हो, यदि वह इस सोच को टाल देता है और इसे असंभव समझता है तो वह अपने बारे में सोचे गा कि उसके साथ ऐसा घटित हुआ है। बिल्कुल यही मामला पत्नी के साथ भी होगा, वह अपने पति के बारे में सोचे गी कि संभव है कि वह किसी अन्य महिला के साथ संबंध रखता हो, यदि वह इसे असंभव समझती है तो वह अपने बारे में सोचे गी कि उसके साथ ऐसा हुआ है।

इस तरह पति-पत्नी में से प्रत्येक संदेह, शक और बदगुमानी (अविश्वास) में जीवन व्यतीत करेंगे, और इसके परिणाम स्वरूप दोनों के बीच का रिश्ता जल्दी ही या बाद में नष्ट हो जाये गा। तथा संभव है कि पति अपनी पत्नी की निंदा करे कि उसने अपने लिए इस बात को स्वीकार कर लिया कि उसके साथ शादी से पहले संबंध बनाये, जिसके कारण उसे चोट और पीड़ा पहुँचे गी और उनके बीच का संबंध दुष्ट हो जायेगा।

इसलिए हमारे विचार में वह शादी जो शादी से पूर्व अवैध संबंध पर क़ायम होती है वह अक्सर स्थिर और सफल नहीं होती है।

जहाँ तक परिवार के लोगों (माता पिता) के चयन करने का प्रश्न है, तो वह न तो सब के सब अच्छी होती है और न ही सब के सब बुरी होती है। यदि माता पिता का चुनाव अच्छा है, और महिला धार्मिक और सुंदर है, और यह पति की पसंद के अनुकूल है और वह उस से शादी की इच्छा रखता है: तो आशा है कि उन दोनों की शादी स्थिर और सफल होगी। इसीलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शादी का प्रस्ताव देने वाले को वसीयत की है कि वह उस महिला को देख ले जिसे शादी का पैगाम दे रहा है। मुग़ीरा बिन शोअबा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने एक औरत को शादी का पैगाम दिया तो इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "तुम उसे देख लो क्योंकि यह इस बात के अधिक योग्य है कि तुम दोनों के बीच प्यार स्थायी बन जाये।’’ इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 1087) ने रिवायत किया है और उसे हसन कहा है तथा नसाई (हदीस संख्या: 3235) ने रिवायत किया है।

इमाम तिर्मिज़ी ने फरमाया: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन "तुम्हारे बीच महब्बत पैदा होने के अधिक योग्य है।" का अर्थ यह है कि तुम दोनों के बीच महब्बत और प्यार के स्थायी होने के अधिक सम्भावना है।

यदि माता पिता ने अच्छा चुनाव नहीं किया है, या उन्हों ने चुनाव अच्छा किया परंतु पति उस पर सहमत नहीं है तो आम तौर पर इस शादी को असफलता और अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि जो चीज़ अरूचि और गैरदिल्चस्पी पर आधारित हो वह अक्सर स्थिर नहीं रहती है।

और अल्लाह सर्वशक्तिमान ही अधिक ज्ञान रखता है।




साभार: islam-qa.com

इस्लाम में मानवता, सौहार्द, नैतिकता, भाई-चारे की शिक्षा - डॉ कल्बे सादिक

कुछ दिनों पहले मेरा जाना बाराबंकी हुआ तो वहाँ जनाब रिजवान मुस्तफा के अनुरोध पे एक मजलिस  हुसैन (अ.स) को सुनने का मौक़ा मिला. अरविन्द विद्रोही जी भी वहाँ मजूद थे जिनको  मैंने  वहाँ बड़े ध्यान से
डॉ कल्बे सादिक को सुनते देखा था. आज उनका यह लेख देख के अच्छा लगा. पेश है अमन और शांति का पैग़ाम देता एक  बेहतरीन और इमानदारी से लिखा गया अरविन्द विद्रोही जी का  लेख - "मानवता-सौहार्द-नैतिकता-भाई चारे की शिक्षा देते संत - डॉ कल्बे सादिक"  ...एस एम मासूम


बाराबंकी के कर्बला में मजलिस ए गम में शामिल होने का निमंत्रण वरिष्ट पत्रकार रिजवान मुस्तफा के द्वारा  मुझे प्राप्त  हुआ तो अपने सामाजिक सरोकार व पत्रकारिता के धर्म का पालन करने हेतु मैं वहा पहुच गया | तक़रीबन दोपहर 12 बजे इस्लामिक - शिया धर्म गुरु  डॉ कल्बे सादिक समारोह स्थल पर आये, मंच पर आते ही उन्होंने उपस्थित जनों से मुखातिब होते हुए कार्यक्रम में देरी से आने के लिए माफ़ी मांगी | आज के दौर में जहा पर लोग अपनी बड़ी गलतियो पर सामाजिक-सार्वजनिक रूप से माफ़ी नहीं मांगते है, उस दौर में एक प्रख्यात हस्ती, एक धर्म गुरु द्वारा सामान्य जन से कार्यक्रम  के प्रारंभ में ना आ सकने की माफ़ी मांगना, यकीन मानिये  मैं तो हतप्रभ रह गया | और तो और देर से आने की पूर्व सूचना  भी धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने आयोजक रिजवान मुस्तफा को दे दी थी | उसके बाद भी माफ़ी | आह ! विनम्रता की प्रतिमूर्ति - तुझे मेरा प्रणाम, उसी पल मैंने मन ही मन उन्हें अपना अभिवादन प्रेषित किया | मुझे आभास हुआ की आज यह समारोह कुछ विशिष्ट सन्देश  प्राप्ति का स्थल बनेगा | अपने संबोधन में डॉ कल्बे सादिक ने धर्म क्या है, पर सरल व मृदु वचनों में कहा कि  धर्म  वो है जो आपको गलत रास्ते पर जाने से बचाए |

आज धर्म को बचाने की बात होती है, कोई इन्सान धर्म कैसे बचा सकता है? धर्म तो आपको बचाने, सही रास्ता दिखाने के लिए है | धर्म के नाम पर मतभेद ख़त्म करने की अपील करते हुए धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने कहा  कि आज यहाँ कर्बला में  शिया - सुन्नी, हिन्दू सभी धर्म के मानने वाले मौजूद है | मैं  हज़रत साहेब को मानने वालो से पूछना चाहता हूँ कि हज़रत साहेब  से जंग क्या हिन्दू ने लड़ी थी? बगैर ज्ञान के मनुष्य जानवर से भी बदतर  होता है | खुदा, परमेश्वर जो भी कहिये उसने सबसे बुद्धिमान मनुष्य को बनाया है और यह मनुष्य अपने कर्मो से अपने को सबसे नीचे गिरा लेता है | ज्ञान व विज्ञान इन्सान व  इस्लाम के फायदे के लिए है | ज्ञान हासिल करना नितांत जरुरी है | कई घटनाओ का हवाला देते हुए डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि जुल्म के खिलाफ  लड़ने वाला ही सच्चा मुसलमान होता है, जुल्म  करने वाला मुसलमान हो ही नहीं सकता | आतंकवाद के सवाल पर धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि मैं यह जिम्मेदारी लेता हूँ कि हज़रत मोहम्मद साहेब को मानने वाला कभी भी दहशत गर्त  हो ही नहीं सकता, जो दहशत गर्त  हैं और जो  बेगुनाहों का  खून बहाते है उनसे पूछा जाये यकीनन वो जुल्मी यजीद को मानने वाले ही होंगे | मोहम्मद साहेब को मानने वाला जुल्मी हो ही नहीं सकता | बहकावे और उकसाने वाली कार्यवाहियो से बचे रहने तथा अमन चैन की  पैरोकारी करने की अपील करते हुए डॉ कल्बे सादिक ने एक वाकया सुनाया | उन्होंने बताया की यह बात हज़रत साहेब के दौर की है |

एक अरबी उस मस्जिद में पाहुजा जिसे खुदा की इबादत के लिए रसूल ने अपने हाथो से तामीर की थी | उस अरबी ने मस्जिद में पेशाब करना शुरु कर दिया , वहा रसूल के साथ  मौजूद सेवक  ने उस अरबी को रोकना चाहा, रसूल ने सेवक से कहा - जरा ठहरो, उसे कर लेने दो पेशाब | वहा गन्दगी फैला कर वह  अरबी वापस चल दिया, अब रसूल ने कहा मस्जिद में जो गन्दगी इसने पेशाब करके फैलाई है, उसको पानी से धो कर साफ़ कर दो | खुद रसूल ने कई बाल्टी पानी डाल डाल कर वहा सफाई करवाई | अरबी वहा आया था खलल पैदा करने के मकसद से व मार पीट के इरादे से | रसूल के इस प्रकार के व्यव्हार से वह  अरबी भी रसूल का मुरीद हो गया | यह वाकया सुना कर डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि  यह है हज़रत मोहम्मद साहेब का चरित्र | इस क्षमा और विनम्रता की  राह पर चल कर रसूल ने इस्लाम को विस्तार दिया था और आज आप मुसलमान क्या कर रहे हो ? यह सोचिये... हिन्दुओ के त्यौहार होली में रंग अगर मस्जिद की दीवारों पर पड़ जाये तो आप उत्तेजित हो जाते हो | अरे.. होली का रंग तो पाक  होता है, दीवारों पर  चूना लगा कर दीवारों को फिर से चमका सकते हो लेकिन आप लोग तो इंसानों को चुना लगा सकते हो लेकिन मस्जिद की रंग लगी दीवारों पर चूना नहीं लगा सकते हो | इस्लाम  जुल्म के खिलाफ लड़ने का, आपसी भाईचारे का, विनम्रता का सन्देश देता है |

धर्मगुरु डॉ  कल्बे सादिक ने मुसलमानों से कहा कि  आप कि पहचान क्या है ? आज आप समाज में लम्बे कुरते, ऊँचे पायजामे, लम्बी दाढ़ी, टोपी से पहचाने जा रहे है | जिस जगह मीनारे, गुम्बद , मस्जिद होती है - लोग कहते है यहाँ मुसलमान रहते है | आज आपका बाहरी व्यक्तित्व  आपकी पहचान बन चुका है | इस्लाम व मुसलमान का वास्तविक रूप सामने लाने की जरुरत है | डॉ कल्बे सादिक ने बताया कि सही मायने में मुसलमान बस्ती वो है जहा पर कोई मांगने वाला ना हो सब देने वाले हो | मस्जिद खुदा का घर होता है | वह पाक जमीन पर बननी चाहिए | किसी दुसरे की जमीन पर  जुल्म जबरदस्ती के जोर से मस्जिद बनाने से वो खुदा का घर नहीं हो जाता | जुल्मी शासक  लोग धर्म का इस्तेमाल अपने गुनाहों और जुल्मो को छिपाने के लिए धर्म का बेजा इस्तेमाल करते रहे है | ऐसे जुल्मी कभी भी खुदा के बन्दे नहीं हो सकते | जनाब डॉ कल्बे सादिक ने इस पर भी एक वाकया सुनाया | उन्होंने कहा कि अगर एक जरुरत मंद का मकान बनवा दिया जाये तो खुदा उसको अपना आशियाना मानता है | जरुरतमंदो की मदद करना खुदा के बताये राह पर चलना है | नेक कामों से इस्लाम का विस्तार हुआ , आज नेकी की राह पर सभी को चलने की जरुरत है |

समाज में और विशेष कर मुसलमानों में शिक्षा की कमी पर धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने बार बार चिंता व्यक्त की | उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद्  के नेता प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा है कि हर मस्जिद के बगल में मंदिर बनाया जायेगा, मैं उनसे अनुरोध करता हूँ कि वे हर मस्जिद के बगल में विद्या मंदिर की स्थापना जरुर करवा दे | जिससे हिन्दुओ के साथ साथ मुसलमान बच्चे भी शिक्षा ग्रहण करे और ज्ञान कि रौशनी में भारत की  तरक्की में अपना योगदान करे |

अंत में अपनी वाणी को विराम देने के पहले इस्लामिक शिया धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि बैगैर ज्ञान के इन्सान व देश - समाज की तरक्की नामुमकिन है | इसलिए ज्ञान हासिल कीजिये | समापन के अवसर पर कर्बला की जंग के वाकये को याद करते  व दिलाते हुए धर्म गुरु ने सवाल किया कि यह जंग क्या हिन्दुओ से लड़ी गयी थी ? अरे ..वो यजीद और उसके लोग थे, और वो भी पांचो वक़्त के नमाज़ी ही थे.. जिन्होंने रसूल के नवासे को प्यासा ही मार डाला था | यह बात जन समुदाय को उद्वेलित कर गयी | लोगो की सिसकियाँ  रुदन में तब्दील हो चुकी थी, इसी समय डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि खुदा ना करे कभी ऐसा हो, लेकिन अगर कही फसाद हो जाये और आप मुसलमान किसी हिन्दू बस्ती में अपने परिवार व बच्चो के साथ पीने का पानी मांगोगे तो यह मेरा यकीन है कि हिन्दू फसाद भूल कर आपको अपने घर में पनाह देंगे, पानी - खाना देंगे, लेकिन इतिहास गवाह है कि उन यजीद के मानने वालो ने प्यासा ही मार डाला था | कर्बला का वह दर्दनाक मंज़र सुनकर रुदन कर रहे जन समुदाय का ह्रदय जुल्म के खिलाफ लड़कर शहीद हुए कर्बला के वीरो को अपने श्रधा सुमन अर्पित करने लगा था | इन्सान मात्र से प्रेम, शिक्षा ग्रहण करने की सलाह, जरुरत मंदों की मदद, अन्याय - जुल्म से लड़ने की सीख़ देते  हुए इस्लामिक शिया धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने  अपनी वाणी को विराम दिया



लेखक अरविंद विद्रोही

एक सामाजिक कार्यकर्ता और आज़ाद पत्रकारिता .गोरखपुर में जन्म, वर्तमान में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में निवास है। छात्र जीवन में छात्र नेता रहे हैं। वर्तमान में सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। डेलीन्यूज एक्टिविस्ट समेत इंटरनेट पर लेखन कार्य किया है तथा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा लगाया है। अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 1, अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 2 तथा आह शहीदों के नाम से तीन पुस्तकें प्रकाशित। ये तीनों पुस्तकें बाराबंकी के सभी विद्यालयों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुफ्त वितरित की गई हैं।

इंसाफ के दिन का इंतजार क्यों?

कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि ईश्वर 'इंसाफ के दिन' अर्थात 'क़यामत' का इंतजार क्यों करता है, आदमी इधर हलाक हुआ उधर उसका हिसाब करे.

अल्लाह ने इन्साफ का दिन तय किया, जहाँ वह सभी मनुष्यों को एक साथ इकठ्ठा करेगा ताकि इन्साफ सबके सामने हो। यह इसलिए भी हो सकता है, क्योंकि बहुत से पुन्य और पाप ऐसे होते हैं जिनका सम्बन्ध दुसरे व्यक्ति या व्यक्तियों से होता है. इसलिए "इन्साफ के दिन" उन सभी सम्बंधित लोगो का इकठ्ठा होना ज़रूरी है। जब इन्साफ होगा तब ईश्वर गवाह भी पेश करेगा, कई बार तो हमारे शरीर के अंग ही अच्छे-बुरे कर्मो के गवाह होंगे।

दूसरी बात यह है कि मनुष्य कुछ ऐसे कर्म भी करते हैं जिसका पाप या पुन्य बढ़ने का सिलसिला इस दुनिया के समाप्त होने तक बढ़ता रहेगा। जिस व्यक्ति ने कोई "गुनाह" पहली बार किया, उसने आने वाले समय के लिए उस गुनाह का रास्ता औरों को भी बता दिया। उस "गुनाह" को अमुक व्यक्ति कि बाद जितने भी लोग करते जाएँगे, उन सभी के पापो में उस पहले व्यक्ति की भी ज़िम्मेदारी बनती है, इसलिए उन लोगों के गुनाहों की सजा उस पहले व्यक्ति को भी होगी। जैसे कि जिस इंसान ने पहली बार किसी दुसरे इंसान की हत्या की होगी, तो उसके खाते में जितने भी इंसानों कि हत्या होगी उन सबका पाप लिखा जायेगा। क्योंकि उसने क़यामत तक के इंसानों को कुकर्म का एक नया रास्ता बताया.

इसे इस तरह समझा जा सकता है, मान लीजिये किसी व्यक्ति ने दुसरे व्यक्ति की हत्या के इरादे से किसी सड़क पर गड्ढा खोदा, उसमें वह व्यक्ति गिर कर मर गया। लेकिन गड्ढा कई सालों तक वहां बरकरार रहा और उसमें कई और व्यक्ति भी गिर कर मरे अथवा घायल हुए, इस स्तिथि में इस पाप के लिए केवल पहला ही नहीं बल्कि जितने व्यक्तियों की मृत्यु होगी अथवा घायल होंगे उन सभी का पाप गड्ढा खोदने वाले व्यक्ति के सर पर होगा। ऐसे ही अगर किसी ने कोई बुरा रास्ता किसी दुसरे व्यक्ति को दिखाया तो जब तक उस रास्ते पर चला जाता रहेगा, अर्थात दूसरा व्यक्ति तीसरे को, फिर दूसरा और तीसरा क्रमशः चौथे एवं पांचवे को तथा दूसरा, तीसरा, चौथा एवं पांचवा व्यक्ति मिलकर आगे जितने भी व्यक्तियों को पाप का रास्ता दिखाएंगे उसका पाप पहले व्यक्ति को भी मिलेगा, पहला व्यक्ति सभी के गलत राह पर चलने का जिम्मेदार होगा। क्योंकि उसी ने वह रास्ता दिखाया है, अगर वह बुराई की राह दुसरे को दिखता ही नहीं तो दुसरे, तीसरे, चौथे और इससे आगे के व्यक्तियों तक वह बुराई पहुँचती ही नहीं या कम से कम उसके ज़रिये तो नहीं पहुँचती। इस तरह इस ज़ंजीर में से जो भी व्यक्ति जानबूझ कर और लोगो को पाप के रास्ते पर डालेगा वह भी उससे आगे के सभी व्यक्तियों के पापो का पूरा-पूरा भागीदार होगा.

ठीक इसी तरह अगर कोई भलाई का काम करता है जैसे कि पानी पीने के लिए प्याऊ बनाया तो जब तक वह प्याऊ है, तब तक उसका पुन्य अमुक व्यक्ति को मिलता रहेगा, चाहे वह कब का मृत्यु को प्राप्त हो गया हो. या फिर कोई किसी एक व्यक्ति को भलाई की राह पर ले कर आया, तो जो व्यक्ति भलाई कि राह पर आया वह आगे जितने भी व्यक्तियों को भलाई कि राह पर लाया और अच्छे कार्य किये, उन सभी के अच्छे कार्यो का पुन्य पहले व्यक्ति को और साथ ही साथ सम्बंधित व्यक्तियों को भी पूरा पूरा मिलता रहेगा, यहाँ तक कि इस पृथ्वी के समाप्ति का दिन आ जाये.

इससे पता चलता है कि मृत्यु के बाद फ़ौरन हिसाब-किताब होना और उसका फल मिलना व्यवहारिक नहीं है, कर्मों का हिसाब करते समय अर्थात 'इंसाफ के दिन' धरती के आखिरी कुकर्म अथवा सुकर्म करने वाले की पेशी होना आवश्यक है.

अल्लाह इन्साफ के दिन पर कहता है:

"और हम वजनी, अच्छे न्यायपूर्ण कार्यो को इन्साफ के दिन (क़यामत) के लिए रख रहे हैं. फिर किसी व्यक्ति पर कुछ भी ज़ुल्म न होगा, यद्दपि वह (कर्म) राइ के दाने ही के बराबर हो, हम उसे ला उपस्थित करेंगे. और हिसाब करने के लिए हम काफी हैं. (21/47)"

कर्बला की कहानी और मकसद ए क़ुरबानी - ज्ञान कुमार

दास्ताने कर्बला मैं उन्होंने सबसे पहले इमाम हुसैन (अ.स) के बारे मैं बताया फिर उनकी जंग यजीद से क्यों हुई और कैसे कैसे यजीद ने ज़ुल्म धाये इसका ज़िक्र बखूबी किया है. उन्सको पढने के बाद कोई भी शख्स जो इंसान का दिल रखता है उसकी आँखों मैं आंसू अवश्य आ जाएंगे.


मैं उनकी किताब के एक हिस्से मकसद ए क़ुरबानी को पेश कर रहा हूँ . हजरत इमाम हुसैन (अ.स) ने अपने व अपने इकहत्तर साथियों ,रिश्तेदारों की अज़ीम , बेमिसाल अलौकिक व अदभुद क़ुरबानी पेश करके दुनिया को पैगाम दिया है की:"ए दुनिया के हक परस्तों कभी भी बातिल के आगे सर ख़म ना करना (शीश ना झुकाना ), बातिल चाहे कितना भी ताक़तवर और ज़ालिम क्यों ना हो."


दुनिया काएम होने से लेकर हर युग मैं हमेशा न्याय -अन्याय, सत्य -असत्य ,नेकी-बड़ी ,अच्छाई-बुराई एव हक और बातिल के दरमियान जंग होतो रही है. जिसमें जीत हमेशा न्याय, सत्य ,नेकी, अच्छाई ,एवं हक की ही हुई है. चाहे उसे ताक़त से जीता गया हो या कुर्बानियां दी गयी हों.जिसके लिए इतिहास गवाह है.


हजरत इमाम हुसैन (अ.स) ने कर्बला मैं यजीद जैसे बातिल परस्त (बुराई की राह पे चलने वाला ) फ़ासिक़ को पूरी तरह से बेनकाब करके उसका घिनौना चरित्र दुनिया के सामने दिखा दिया. यजीद ने सोंचा था की अपनी ताक़त व दौलत के ज़ोर से तमाम ज़ुल्म ओ सितम ध कर सत्य को झुकने पे मजबूर कर देगा.


लेकिन ऐसा वो कर ना सका और इमाम हुसैन (अ.स ) ने यजीद के हाथों खुद को बेचने (बैय्यत) से इनकार कर दिया. इस इनकार के बदले यजीद ने कर्बला मैं इमाम हुसैन (अ.स) के ७२ साथियों और रिश्तेदारों, बच्चों को , भूखा , प्यासा शहीद करवा दिया. यजीद के ज़ुल्म की कहानी सुन के आज भी कोई शरीफुल नफ्स अपने बच्चे का नाम यजीद नहीं रखता जबकि नाम ए हुसैन आज हर दुसरे मुसलमान का हुआ करता है.


अब तक हर युग मैं धर्म -अधर्म के युद्ध हुए हैं. त्रेता युग मैं राम और रवां का, द्वापर युग मैं कृष्ण और कंस का और महाभारत काल मैं अर्जुन ने कौरवों का युद्ध.कर्बला भी धर्म और अधर्म के लिए घटित हुई थी जिसमें यजीद जैसा अधर्मी शासक ने महान धर्म परायण व पवित्र शक्सियत का क़त्ल कर के दुनिया के सामने अपनी हठधर्मिता एवं अविजेता का प्रदर्शन करना चाहता था.


आज १४०० साल बाद भी इमाम हुसैन की इस क़ुरबानी जो मुहर्रम की दस तारिख सन ६१ हिजरी मैं हुई थी सभी धर्मो के लोग याद करते हैं.


" दुनिया के किसी भी दीं धर्म की बुनियाद सत्य -न्याय एवं मानवता पर ही आधारित है. सभी धर्मो का सन्देश है की दुनिया मैं अमन और शांति काएम रखी जाए और सभी को जीने के सामान अधिकार व अवसर प्रदान किए जाएं, जिस से इंसानी वजूद दुनिया मैं हमेशा काएम रहे तथा आपस मैं भाईचारा बरक़रार रहे.


इसी मूल मंत्र के कारण इमाम हुसैन (अ.स) ने पना सब कुछ कर्बला मैं लुटा दिया तथा अपना भरा घर अपने नाते रिश्तेदारों समेत खुद को कुर्बान कर दिया.


आएये हम सभी मिलकर इस ईश्वरीय पैगाम पे ग़ौर ओ फ़िक्र करें तथा कर्बला की घटना से सीख लें जिससे दुनिया मैं फैल रहे ज़ुल्म ओ सितम ,दुराचार,अनाचार,नाते रिश्तों मैं हो रही गिरावट ,बेगुनाहों की हो रही हत्याओं एवं मानवता पे हो रहे हमलों को रोका जा सके. अवन दुनिया को आतंकवाद के चंगुल से बचने का संकल्प लें.


यही है हजरत इमाम हुसैन (.स) से सच्ची मुहब्बत एवं उनके पैगाम व क़ुरबानी में हिस्सेदारी एवं अल्लाह (इश्वर) के बताए हुए अहकाम व आदेशों का पालना.



 

ज्ञान कुमार,

जौनपुर

9721275498

इस्लाम को हिंसक बनाना चाहते हैं लालची लोग - मौलाना वहीदुद्दीन खान

प्रसिद्ध इस्लामी बुद्धिजीवी मौलाना वहीदुद्दीन खान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके संदेशों में शांति को प्राथमिकता दी जाती है। यही कारण है कि जब अयोध्या में विवादित ढांचे के ध्वस्तीकरण को लेकर पूरे देश में तूफान मचा हुआ था और लगभग सभी मुसलमान नेता गुस्से में तमतमा रहे थे तब उनका बहुत सुलझा हुआ बयान आया था। उन्होंने कहा था कि हमें अतीत पर आंसू बहाने की बजाय भविष्य की ओर देखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि दु:ख पहुंचाने वाली बातों को भूलने की आदत डालनी चाहिए।

इसी प्रकार, अफ़ग़ानिस्तान में इस्लाम के नाम पर सक्रिय संगठन तालिबान का विरोध आम तौर पर अब हो रहा है, लेकिन मौलाना वहीदुद्दीन खान ने 1996 में ही इस संगठन को रद्द कर दिया था और स्पष्ट शब्दों में कहा था कि तालिबान की ओर से जो कुछ हो रहा है उसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है। मौलाना वहीदुद्दीन खान ने अपनी नई किताब द प्रोफिट ऑफ पीस द्वारा एक बार फिर इस्लाम के वास्तविक संदेश को पेश करने की उत्साहवर्धक कोशिश की है। इसमें साफ कहा गया है कि तालिबान या इस प्रकार के अन्य संगठनों की ओर से जो कुछ किया जा रहा है उसका इस्लाम से कुछ लेना देना नहीं है। पैगम्बर-ए-इस्लाम मोहम्मद (स.) शांति का संदेश लेकर आए थे, प्रारम्भिक इस्लाम के शब्दकोश में हिंसा शब्द है ही नहीं। बाद में कुछ लोगों ने अपने हित के लिए हिंसा को इस्लाम से जोड़कर उसे इसका हिस्सा बना दिया।

मौलाना कहते हैं कि हिंसा द्वारा दुनिया में इस्लामी शासन लाने की कोशिश खतरनाक है। लेखक ने कुरान और हदीस के हवाले से इस्लाम को शांति का धर्म करार देते हुए कहा है कि मुसलमान वह है जिसकी जुबान और हाथ से लोग सुरक्षित रहें। आतंकवाद को राजनीतिक इस्लाम का अंग करार देते हुए मौलाना कहते हैं कि पश्चिम से सत्ता समाप्त होने के बाद एक वर्ग घुटन महसूस करने लगा और वह वर्ग विशेषकर अरब दुनिया इस दुख को बर्दाश्त न कर सकी और दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। 19वीं शताब्दी में जमालुद्दीन अफ़गानी ने कट्टरपंथी इस्लाम का नज़रिया पेश किया जिसके बाद इस्लामी आंदोलनों का तांता लग गया।

मौलाना उग्र आंदोलनों को गुमराह करने वाले बताते हुए लिखते हैं कि वास्तविक इस्लामी आंदोलन वही हो सकता है जिसमें हिंसा का कोई स्थान न हो। पैगम्बर-ए-इस्लाम के शांतिप्रिय होने का उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने लिखा है कि मक्का पर विजय के बाद मोहम्मद साहब ने उन सब लोगों को माफ कर दिया था जिन्होंने उन्हें और उनके साथियों को काफी दु:ख पहुंचाया था। उनमें वह व्यक्ति भी था जिसने उनके चाचा हज़रत हमज़ा को शहीद किया था। मौलाना के अनुसार इस्लाम को समझने के लिए कुरान और हदीस पढ़ना चाहिए। उन लोगों पर ध्यान नहीं देना चाहिए जो इस्लाम की बदनामी के जि़म्मेदार हैं।


साभार: प्रेसनोट डोट इन

गैर-मुसलमानों के साथ सम्बन्ध कैसे होने चाहिए

हमें विस्तार से पता होना चाहिए कि इस्लाम के अनुसार मुसलमानों को गैर-मुसलमानों के साथ कैसे संबंध रखने चाहिए और कैसे उनके साथ इस्लामी शरी'अह के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिए?

 

सब तारीफें अल्लाह ही के  लिए हैं.

 

पहली बात तो यह कि इस्लाम दया और न्याय का धर्म है. इस्लाम के लिए इस्लाम के अलावा अगर कोई और शब्द इसकी पूरी व्याख्या कर सकता है तो वह है न्याय". मुसलमानों को आदेश है कि ग़ैर-मुसलमानों को ज्ञान, सुंदर उपदेश तथा बेहतर ढंग से वार्तालाप से बुलाओ. ईश्वर कुरआन में कहता है (अर्थ की व्याख्या):

[29: 46] और किताबवालों से बस उत्तम रीति से वाद-विवाद करो - रहे वे लोग जो उनमे ज़ालिम हैं, उनकी बात दूसरी है. और कहो: "हम ईमान लाए उस चीज़ पर जो हमारी और अवतरित हुई और तुम्हारी और भी अवतरित हुई. और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं."


[9:6] और यदि मुशरिकों (जो ईश्वर के साथ किसी और को भी ईश्वर अथवा शक्ति मानते हैं) में से कोई तुमसे शरण मांगे, तो तुम उसे शरण दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले. फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दो; क्यों वे ऐसे लोग हैं, जिन्हें ज्ञान नहीं है.


इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, या डराने की, या आतंकित करने, या उसकी संपत्ति गबन करने की, या उसे उसके सामान के अधिकार से वंचित करने की, या उसके ऊपर अविश्वास करने की, या उसे उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, या उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की जबकि उनका माल खरीदा जाए. या अगर साझेदारी में व्यापार है तो उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.


इस्लाम के अनुसार यह मुसलमानों पर अनिवार्य है गैर मुस्लिम पार्टी के साथ किया करार या संधियों का सम्मान करें. एक मुसलमान अगर किसी देश में जाने की अनुमति चाहने के लिए नियमों का पालन करने पर सहमत है (जैसा कि वीसा इत्यादि के समय) और उसने पालन करने का वादा कर लिया है, तब उसके लिए यह अनुमति नहीं है कि उक्त देश में शरारत करे, किसी को धोखा दे, चोरी करे, किसी को जान से मार दे अथवा किसी भी तरह की विनाशकारी कार्रवाई करे. इस तरह के किसी भी कृत्य की अनुमति इस्लाम में बिलकुल नहीं है.


जहाँ तक प्यार और नफरत की बात है, मुसलमानों का स्वाभाव ग़ैर-मुसलमानों के लिए उनके कार्यो के अनुरूप अलग-अलग होता है. अगर वह ईश्वर की आराधना करते हैं और उसके साथ किसी और को ईश्वर अथवा शक्ति नहीं मानते तो इस्लाम उनके साथ प्रेम के साथ रहने का हुक्म देता है. और अगर वह किसी और को ईश्वर का साझी मानते हैं, या ईश्वर पर विश्वास नहीं करते या धर्म के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और ईश्वर की सच्चाई से नफरत करते है, तो ऐसा करने के कारणवश उनके लिए दिल में नफरत का भाव आना स्वाभाविक है.


[अल-शूरा 42:15, अर्थ की व्याख्या]:


"और मुझे तुम्हारे साथ न्याय का हुक्म है. हमारे और आपके प्रभु एक ही है. हमारे साथ हमारे कर्म हैं और आपके साथ आपके कर्म."


इस्लाम यह अनुमति अवश्य देता है कि अगर ग़ैर-मुस्लिम मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का एलान करें, उनको उनके घर से बेदखल कर दें अथवा इस तरह का कार्य करने वालो की मदद करें, तो ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.


[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.


[60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.


क्या इस्लाम काफिरों का क़त्ल करने का हुक्म देता है?


कुछ लोग इस्लाम के बारे में भ्रान्तिया फ़ैलाने के लिए कहते हैं, कि इस्लाम में गैर-मुसलमानों को क़त्ल करने का हुक्म है. इस बारे में ईश्वर के अंतिम संदेष्ठा, महापुरुष मौहम्मद (स.) की कुछ बातें लिख रहा हूँ, इन्हें पढ़ कर फैसला आप स्वयं कर सकते हैं:


"जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)


"जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)


"जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)


"न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)


"अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).


एवं पवित्र कुरआन में ईश्वर कहता है कि:


इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्‍ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]


- शाहनवाज़ सिद्दीकी


वादा और अमानत


1. हे आस्तिको ! प्रतिज्ञाओं को पूरा करो। -कुरआन [5, 1]


2. ...और अपनी प्रतिज्ञाओं का पालन करो, निःसंदेह प्रतिज्ञा के विषय में जवाब तलब किया जाएगा।  -कुरआन [17, 34]


3. ...और अल्लाह से जो प्रतिज्ञा करो उसे पूरा करो। -कुरआन [6,153]


4. और तुम अल्लाह के वचन को पूरा करो जब आपस में वचन कर लो और सौगंध को पक्का करने के बाद न तोड़ो और तुम अल्लाह को गवाह भी बना चुके हो, निःसंदेह अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो। -कुरआन [16, 91]


5. निःसंदेह अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतें उनके हक़दारों को पहुंचा दो और जब लोगों में फ़ैसला करने लगो तो इंसाफ़ से फ़ैसला करो।  -कुरआन [4, 58]


6. और तुम लोग अल्लाह के वचन को थोड़े से माल के बदले मत बेच डालो (अर्थात लालच में पड़कर सत्य से विचलित न हुआ करो), निःसंदेह जो अल्लाह के यहां है वही तुम्हारे लिए बहुत अच्छा है यदि समझना चाहो। -कुरआन [16, 95]


महत्वपूर्ण आदेश आज्ञाकारी और पूर्ण समर्पित लोगों को ही दिए जाते हैं। जो लोग समर्पित नहीं होते वे किसी को अपना मार्गदर्शक भी नहीं मानते और न ही वे अपने घमंड में उनकी दिखाई राह पर चलते हैं। इसीलिए यहां जो आदेश दिए गए हैं, उनका संबोधन ईमान वालों से है।

समाज की शांति के लिए यह ज़रूरी है कि समाज के लोग आपस में किए गए वादों को पूरा करें और जिस पर जिस किसी का भी हक़ वाजिब है, वह उसे अदा कर दे।  अगर समाज केसदस्य लालच में पड़कर ऐसा न करें और यह चलन आम हो जाए तो जिस फ़ायदे के लिए वे ऐसा करेंगे उससे बड़ा नुक्सान समाज को वे पहुंचाएंगे और आखि़रकार कुछ समय बादखुद भी वे उसी का शिकार बनेंगे। परलोक की यातना का कष्ट भी उन्हें झेलना पड़ेगा, जिसके सामने सारी दुनिया का फ़ायदा भी थोड़ा ही मालूम होगा। वादे,वचन और संधि केबारे में परलोक में पूछताछ ज़रूर होगी। यह ध्यान में रहे तो इंसान के दिल से लालच और उसके अमल से अन्याय घटता चला जाता है।स्वर्ग में दाखि़ले की बुनियादी शर्त है सच्चाई। जिसमें सच्चाई  का गुण है तो वह अपने वादों का भी पाबंद ज़रूर होगा। जो अल्लाह से किए गए वादों को पूरा करेगा, वह लोगों से किए गए वायदों को भी पूरा करेगा। वादों और प्रतिज्ञाओं का संबंध ईमान और सच्चाई से है और जिन लोगों में ये गुण होंगे, वही लोग स्वर्ग में जाने के अधिकारी हैं और जिस समाज में ऐसे लोगों की अधिकता होगी, वह समाज दुनिया में भी स्वर्ग की शांति का आनंद पाएगा।


अमानत को लौटाना भी एक प्रकार से वायदे का ही पूरा करना है। यह जान और दुनिया का सामान जो कुछ भी है, कोई इंसान इसका मालिक नहीं है बल्कि इन सबका मालिक एक अल्लाह है और ये सभी चीज़ें इंसान के पास अमानत के तौर पर हैं। वह न अपनी जान दे सकता है और न ही किसी की जान अन्यायपूर्वक ले सकता है। दुनिया की चीज़ों को भी उसे वैसे ही बरतना होगा जैसे कि उसे हुक्म दिया गया है। दुनिया के सारे कष्टों और आतंकवाद को रोकने के लिए बस यही काफ़ी है।


अरबी में ‘अमानत‘ शब्द का अर्थ बहुत व्यापक अर्थों में प्रयोग किया जाता है।


ज़िम्मेदारियों को पूरा करना, नैतिक मूल्यों को निभाना, दूसरों के अधिकार उन्हें सौंपना और सलाह के मौक़ों पर सद्भावना सहित सलाह देना भी अमानत के दायरे में हीआता है। अमानत के बारे में आखि़रत मे सवाल का ख़याल ही उसके सही इस्तेमाल गारंटी है। कुरआन यही ज्ञान देता है।


वास्तव में सिर्फ़ इस दुनिया का बनाने वाला ही बता सकता है कि इंसान के साथ उसकी मौत के बाद क्या मामला पेश आने वाला है ?


और वे कौन से काम हैं जो उसे मौत के बाद फ़ायदा देंगे ?


वही मालिक बता सकता है इंसान को दुनिया में कैसे रहना चाहिए ?


और मानव का धर्म वास्तव में क्या है ?


कुरआन उसी मालिक की वाणी है जो कि मार्ग दिखाने का वास्तविक अधिकारी है क्योंकि मार्ग, जीवन और सत्य, हर चीज़ को उसी ने बनाया है।


अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (अंतिम पार्ट-18)

सृष्टि के मैदान में खुदा की निशानियाँ

गणितीय पथ पर विचार करने के पश्चात अब हम सृष्टि के मैदान में अल्लाह के वजूद की निशानियों की तलाश करेंगे। इसके लिए इस तरंह का अध्ययन करना होगा कि क्या सृष्टि का निर्माण, मानव और दूसरे प्राणियों की उत्पत्ति संयोगवश हुई है या किन्हीं खास प्रकार की घटनाओं के क्रम में? आज दूसरे प्राणियों के साथ अस्तित्व में आये मानव को जीवित रखने के लिए पृथ्वी का जो पर्यावरण है उसके अनुरूप मानव ने अपने को ढाला है या पर्यावरण स्वयं ऐसे रूप में ढला है जो मानव को जीवित रखने के लिए आवश्यक है। यह समस्त विवेचन अवश्य ही हमें अल्लाह के वजूद की सच्चायी की ओर मोड़ देगा।



मालिक का दरबार सजेगा तभी सबको इन्साफ़ मिलेगा

परमेश्वर कहता है-

1. मालिकि यौमिद्-दीन
अर्थात मालिक है इन्साफ़ के दिन का।
(अलफ़ातिहा, 3)

2. अलयौमा तुज्ज़ा कुल्लू नफ़्सिम बिमा कसबत
अर्थात आज के दिन हर जान को उसके किए का बदला दिया जाएगा। (मोमिन, 17)

3. यौमा ला युग़नी अन्हुम कैदुहुम शैअंव वला हुम युन्सरून
अर्थात वह दिन ऐसा होगा कि उनकी तदबीर से उनका कुछ काम न बन सकेगा और उनकी मदद भी कहीं से न की जाएगी। (तूर, 46)

4. हाज़ा यौमुल फ़स्ल जमअनाकुम वल अव्वलीन
अर्थात यह फ़ैसले का दिन आ गया है, हमने तुम्हें और तुमसे पहले लोगों को इकठ्ठा कर लिया है।                (मुर्सलात, 38)

5. वैलुयं-यौमैइज़िल्लिल मुकज़-ज़िबीन
अर्थात हमारी बात को झूठ मानने वाले उस दिन बड़ी ख़राबी (दुरावस्था) में होंगे। (मुर्सलात, 34)

6. लियौमिन उज्जिलत, लियौमिल फ़स्ल, वमा अदराका मा यौमुल फ़स्ल, वैलुयं यौमैइज़िल्लिल मुकज़-ज़िबीन
अर्थात किस दिन के लिए सबका मुक़द्दमा मुल्तवी था ?, फ़ैसले के दिन के लिए।
तुम्हें क्या मालूम कि फ़ैसले का दिन क्या होगा ?, झुठलाने वालों के लिए यह दिन सर्वनाश पूरी बर्बादी लाएगा। (मुर्सलात, 12-15)

अयोध्या विवाद पर अदालती फ़ैसला और जन प्रतिक्रियाएं:
अयोध्या विवाद अदालत में लम्बित था। उसकी सुनवाई इतने बरसों तक चली कि अपील करने वाले और उसका जवाब देने वाले दोनों ही पक्षों के लोग चल बसे और उनके वारिसों ने उसका फ़ैसला सुना। दोनों ही पक्ष मुतमइन नहीं हैं फ़ैसले पर। रामलला पक्ष मानता है कि ज़मीन पर मस्जिद वालों का क़ब्ज़ा नाजायज़ है उन्हें एक तिहाई भी क्यों दिया जा रहा है ?

दूसरी तरफ़ मस्जिद वालों का कहना है कि मस्जिद पूरी तरह जायज़ तरीक़े से बनी है, उसमें मूर्ति रखे जाने के दिन तक लगातार नमाज़ अदा हो रही थी। उसमें नाजायज़ तरीक़े से मूर्तियां रख दी गईं और फिर इबादतख़ाने को इबादत से महरूम कर दिया गया। अगर मस्जिद नाजायज़ तरीक़े से बनी थी तो फिर मस्जिद के लिए एक तिहाई जगह भी क्यों दी जा रही है ?

फ़ैसला या इन्साफ़?
दोनों पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं। दोनों पक्षों की ज़ोर आज़माई अदालत में भी चली और अदालत के बाहर भी। माल भी लुटा और इज़्ज़तें भी, जान भी गई और आपस का यक़ीन भी गया। सब कुछ हुआ और फिर लगभग 60 बरस बाद फ़ैसला भी आया। फ़ैसला तो आ गया लेकिन दोनों ही पक्ष कहते हैं कि हमें ‘इन्साफ़‘ नहीं मिला।

इन्साफ़ होगा ‘इन्साफ़ के दिन‘
दुनिया में फ़ैसला ही होता है, इन्साफ़ नहीं। इन्साफ़ तो सिर्फ़ ‘इन्साफ़ के दिन‘ होगा। जब फ़ैसला करने वाला खुद ‘मालिक‘ होगा और वह अगले-पिछले तमाम लोगों को इकठ्ठा करेगा। वहां रामचन्द्र जी भी होंगे और वे लोग भी जो उनके जन्म लेने के समय मौजूद थे, अगर उन्होंने वास्तव में जन्म लिया था तो। वहां बाबर भी होगा और मीर बाक़ी भी और मस्जिद बनाने वाले कारीगर भी। तभी सही फ़ैसला होगा कि रामजन्म भूमि वास्तव में कहां थी ? और क्या मस्जिद बनाने के लिए किसी मन्दिर को तोड़ा गया ? या फिर मन्दिर बनाने के लिए मस्जिद तोड़ी गई ?
किसी ने मन्दिर लूटे तो क्यों लूटे ? किसी ने मस्जिद तोड़ी तो क्यों तोड़ी ?
किसी ने किसी की इज़्ज़त लूटी तो क्यों लूटी ? किसी को मारा तो क्यों मारा ?
उस दिन सिर्फ़ फ़ैसला ही नहीं होगा बल्कि ‘इन्साफ़‘ भी होगा। जो कि यहां हो नहीं सकता। किसी भी बलवे में मारे गए लोगों के वारिसों को आज तक यहां इन्साफ़ नहीं मिला। इन्साफ़ तो छोड़िए मारने वालों की शिनाख्त तक नहीं हो पाई।

दुनिया का दस्तूर है ‘माइट इज़ राइट‘

मुसलमानों को शिकायत है कि उनसे भेदभाव किया गया लेकिन ऐसा नहीं है। सन् 1984 के दंगों में तो उन्होंने उन्हें मारा था जिन्हें वे अपना अंग, अपना खून मानते हैं। वे आज तक न्याय की आस में भटक रहे हैं। वे दलितों को मारते आए, औरतों को जलाते आए उन्हें कब इन्साफ़ मिला ?

दलितों और औरतों को बचाने के स्पेशल क़ानून बनाए गए तो उनकी चपेट में फिर बेक़सूर लोग फंसे और वे जेल गए। सवर्णों को ही कब इन्साफ़ मिलता है यहां ?

क़ाबिलियत के बावजूद एक सवर्ण बाहर कर दिया जाता है और उससे कम क़ाबिल आदमी को ‘पद‘ दे दिया जाता है।

हर तरफ़ ज़ुल्म हर जगह सितम
जुल्म और सितम को सिर्फ़ हिन्दुओं या हिन्दुस्तान से देखकर जोड़ना खुद एक जुल्म है। कितने ही वैज्ञानिकों को ईसाईयों ने जला डाला, लाखों प्रोटैस्टेंट ईसाईयों को क़त्ल कर दिया गया। जुल्म को रोकने के लिए मालिक ने हमेशा अपने पैग़म्बर भेजे। लेकिन लोगों ने खुद उन पर भी जुल्म किया। उन्हें या तो क़त्ल कर डाला या फिर देश से निकाल दिया। जिन लोगों ने उन्हें माना, उन्होंने भी उनकी बात को भुला दिया, उनकी बात को न माना, हां उनके गीत-भजन गाते गाते उन्हें ईश्वर का दर्जा ज़रूर दे दिया। यह भी एक जुल्म है कि उनकी शिक्षाओं को ही बदल दिया। यह जुल्म सिर्फ़ मालिक के दूतों के प्रति ही नहीं है बल्कि खुद मालिक का भी हक़ मारा, उसपर भी जुल्म किया।

दावा इस्लाम का और तरीक़ा ज़ुल्म का ?
दुनिया के अंत में मालिक ने फिर दुनिया वालों पर अपनी दया की और अंतिम पैग़म्बर स. को भेजा कि वे लोगों को याद दिलाएं कि एक दिन ऐसा आनेवाला है जिस दिन कोई किसी की मदद न कर सकेगा, हरेक वही काटेगा जो कि उसने बोया होगा। इसलिए कल जो काटना चाहते हो, आज वही बोओ। लेकिन लोगों ने उन पर भी जुल्म किया और उनकी आल-औलाद पर भी। उनके साथियों पर भी जुल्म किया और उनके नाम लेवाओं पर भी और फिर जुल्म की इन्तेहा तो तब हो गई जब उनके नाम लेवाओं ने भी जुल्म करना शुरू कर दिया और इससे भी बढ़कर जुल्म यह हुआ कि जुल्म को ‘जिहाद‘ का नाम दे दिया गया और कहा गया कि हम कुरआन का हुक्म पूरा कर रहे हैं।
आज पाकिस्तान में मस्जिदों और दरगाहों में बम बरस रहे हैं। कौन बरसा रहा है ये बम ?

इस्लाम के खि़लाफ़ है आतंकवाद
कुरआन तो कहता है कि ‘जिहाद‘ करते हुए हरे-भरे पेड़ भी मत काटिए, सन्यासियों को मत मारिए और दूसरी क़ौमों के पूजागृहों को मत तोड़िए फिर ये कौन लोग हैं जो कहते हैं कि हमारा अमल धर्म है ?
कम मुसलमान हैं जो दहशतगर्दी को इस्लाम से जोड़ते हैं लेकिन फ़िरक़ों में बंटे हुए तो लगभग सभी हैं।
दीन को बांटोगे, खुदा के हुक्म को टालोगे तो फिर उसकी तरफ़ से मदद उतरेगी या अज़ाब ?

हक़ मारने वाले हक़परस्त कैसे ?
हक़ मारने का रिवाज भी आम है।
कितने मुसलमान हैं जो हिसाब लगाकर ज़कात देते हैं ?
ज़कात देने वाले तो फिर भी बहुत हैं लेकिन कितने मुसलमान हैं जो अपनी लड़कियों को जायदाद में वह हिस्सा देते हैं जो मालिक ने कुरआन में निश्चित किया है ?
हक़ मारना जुल्म है। अपनी ही औलाद का हक़ मारकर मर रहे हैं मुसलमान।
ज़ाहिरी तौर पर नमाज़, रोज़ा और हज कर भी रहे हैं तो सिर्फ़ एक रस्म की तरह। खुदा के सामने पूरी तरह झुकने की और बन्दों के हक़ अदा करने की भावना का प्रायः लोप सा है।

इन्सान पर खुद अपना भी हक़ है
इन्सान पर खुद अपनी जान का भी हक़ है कि अपनी जान को जहन्नम की आग से बचाए और इसके लिए खुद को हिदायत पर चलाए। इन्सान पर उसके पड़ौसी का भी हक़ है कि जैसा वह खुद को आग और तबाही से बचाना चाहता है वैसा ही उन्हें भी बचाने की ताकीद करे।
कितने मुसलमान हैं जो अपने पड़ोसियों को जहन्नम की आग से बचाने के लिए तड़पते हों ?
कितने मुसलमान ऐसे हैं जो अपने पड़ोसियों की हिदायत और भलाई के लिए दुआ करते हों ?

‘मुहम्मद‘ स. के तरीक़ा रहमत का तरीक़ा है
हज़रत मुहम्मद स. को रसूल और आदर्श मानने का मतलब यही है कि हम उनके अमल के मुताबिक़ अमल करें। उनकी दुआओं को देखिए। वे उमर के लिए दुआ कर रहे हैं।
कौन उमर ?
वे उमर जो उनकी जान लेने के लिए घूम रहे हैं।
और एक उमर ही क्या वहां तो पूरी क़ौम ही उनकी जान लेने पर तुली हुई थी लेकिन उनकी हिदायत के लिए प्यारे नबी स. रात-रात भर खड़े होकर दुआ किया करते थे।
हज़रत मुहम्मद स. को इस दुनिया में कब इन्साफ़ मिला ?
लेकिन आपने हमेशा इन्साफ़ किया
इन्साफ़ ही नहीं बल्कि ‘अहसान‘ किया।

ज़ालिम दुश्मनों को माफ़ करने का बेमिसाल आदर्श
उनके प्यारे चाचा हम्ज़ा को क़त्ल करने वाले हब्शी और नफ़रत में उनका कलेजा चबाने वाली हिन्दा को क़त्ल करने से उन्हें किस चीज़ ने रोका ?
सिर्फ़ खुदा की उस रहमत ने जो कि खुद उनका मिज़ाज था।
उनके अलावा और कौन है जो अच्छे अमल का इतना ऊंचा और सच्चा नमूना पेश कर सके ?
इतिहास देखिए और मौजूदा दौर भी देख लीजिए। आपको ऐसा अमल कहीं न मिलेगा। इतिहास में न मिले तो शायरी में ही ढूंढ लीजिए। एक मुल्क की शायरी में नहीं सारी दुनिया के काव्यों-महाकाव्यों में देख लीजिए। कवियों की कल्पना भी ऐसे ऊंचे आदर्श की कल्पना से आपको कोरी मिलेगी जैसा कि पैग़म्बर मुहम्मद स. ने अपने अमल से समाज के सामने सचमुच साकार किया।

बेमिसाल माफ़ी, बेमिसाल बख्शिश का बेनज़ीर आदर्श
प्यार-मुहब्बत, रहमत-हमदर्दी, दुआ-माफ़ी, सब्र-शुक्र, इन्साफ़-अहसान, और खुदा की याद ग़र्ज़ यह कि कौन की खूबी ऐसी थी जो उनमें नहीं थी। उन्हें मक्का में क़त्ल करने के लिए हरेक क़बीले का एक नौजवान लिया गया। 360 जवान घर के बाहर क़त्ल के लिए जमा हो गए। उन्होंने मक्का छोड़ दिया लेकिन अपना मक़सद, मिज़ाज और तरीक़ा नहीं छोड़ा। बाद में जब मक्का फ़तह हुआ तब भी उन्होंने अपनी वे जायदादें तक न लीं जिन्हें उनसे सिर्फ़ इसलिए छीन लिया गया था कि वे उनकी मूर्तियों को पूजने के लिए तैयार न थे। सिर्फ़ उन्होंने ही नहीं बल्कि उनक साथियों ने भी नहीं लीं। इस धरती पर पहली बार ऐसा हुआ कि जब किसी विजेता ने अपने दुश्मनों की ज़मीन जायदाद पर क़ब्ज़ा नहीं जमाया बल्कि खुद अपनी जायदादें भी उन्हीं पर छोड़ दीं।

‘मार्ग‘ को ठुकराओगे तो मंज़िल कैसे पाओगे ?
इन्साफ़ का दिन आएगा तो उस दिन सिर्फ़ हिन्दुओं या सिर्फ़ ग़ैर-मुस्लिमों का ही इन्साफ़ न किया जाएगा बल्कि मुसलमानों के आमाल को भी देखा-परखा और जांचा जाएगा। मुसलमानों को चाहिए कि वे आज ही देख लें कि आज वे क्या बो रहे हैं ? क्योंकि उन्हें वही काटना है जो आज बो रहे हैं।
और हिन्दू भाई भी किसी ग़फ़लत में न रहें। मुसलमानों की बदअमली को मालिक के हुक्म से जोड़कर वे अपने हुनर का सुबूत तो दे सकते हैं लेकिन यह मालिक के संदेश के साथ सरासर अन्याय है, बुद्धि का दुरूपयोग है, ‘मार्ग‘ को ही ठुकरा दोगे तो फिर मार्ग कहां से पाओगे ?

मालिक का दरबार सजेगा तभी सबको इन्साफ़ मिलेगा
मुसलमानों से हिसाब ही चुकता करना है तो उसके लिए दूसरे बहुत तरीक़े हैं लेकिन उनकी नफ़रत में ‘सत्य‘ से मुंह मोड़ना तो हिन्दू धर्म में भी जायज़ नहीं है।
अयोध्या का फ़ैसला बता रहा है कि यह दुनिया मुकम्मल नहीं है और न ही यहां का फ़ैसला मुकम्मल है। दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाना चाहते हैं। जहां चाहे चले जाएं लेकिन वे दुनिया की प्रकृति को तो नहीं बदल सकते। मन्दिर-मस्जिद का फ़ैसला जो चाहे हो लेकिन उनके लपेटे आकर मरने वाले मासूमों को इन्साफ़ देना दुनिया की किसी भी अदालत के बस में नहीं है। लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें इन्साफ़ मिलेगा ही नहीं। उन्हें इन्साफ़ ज़रूर मिलेगा चाहे इसके लिए दुनिया की प्रकृति को ही क्यों न बदलना पड़े ?
चाहे इस धरती की गोद में सोने वालों को एक साथ ही क्यों न जगाया जाए ?
चाहे मालिक को खुद ही क्यों न आना पड़े ?
और उसे सामने आना ही पड़ेगा क्योंकि इतना बड़ा काम केवल वही कर सकता है।

इन्सान के काम में झलकता है मालिक का नाम
यही वह समय होगा जब आदमी वह पाएगा जिसके लायक़ उसने खुद को बनाया होगा।
जो थोड़े में ईमानदार रहा होगा उसे ज़्यादा दिया जाएगा और जिसने थोड़े को भी बर्बाद करके रख दिया होगा उसे और अवसर न दिया जाएगा।
आज ज़मीन पर उसका नाम लेने वाले, उसके नाम पर झूमने वाले बहुत हैं। बहुत लोग हैं जो खुद को नामधारी कहते हैं लेकिन सिर्फ़ ज़बान से उसका नाम लेना ही उसके नाम को धारण करना नहीं होता बल्कि उसके नाम को इस तरह अपने मिज़ाज में समा लेना कि अमल से छलकें उसके गुण, यह होता है ‘नाम‘ को धारण करना। फिर नाम ही नहीं उसके पैग़ाम को भी धारण करना होता है।

किसके पास है मालिक का पैग़ाम ?

जिसका दावा हो कि उसके पास है। उसकी ज़िम्मेदारी है कि बिना कुछ घटाए-बढ़ाए वह दुनिया को बताए कि यह है तुम्हारे मालिक का हुक्म, तुम्हारे लिए। मेरे पास है मालिक का हुक्म पवित्र कुरआन की शक्ल में। जो आज इसे लेने से हिचकेगा, कल वह मालिक को अपने इन्कार की वजह खुद बताएगा। अगर आपके पास इससे बेहतर कुछ और है तो लाइये उसे और पेश कीजिए मेरे सामने। दुनिया को बांटिए मत, इसे जोड़िए।

हर समस्या का एक ही समाधान
लोग परेशान हैं। दुनिया जुए, शराब, व्यभिचार और ब्याज से परेशान है। दुनिया भूख और ग़रीबी से परेशान है। छोड़ दी गईं औरतें और विधवाएं परेशान हैं। अमीर-ग़रीब सब परेशान हैं, वे अपनी समस्याओं का हल आज चाहते हैं।
जिसके पास मालिक की वाणी है उसके पास इन सबकी समस्याओं का हल भी है। मालिक की वाणी का यह एक मुख्य लक्षण है, जिस वाणी में यह पूरा हो, जिसमें कुछ घटा न हो, कुछ बढ़ा न हो, उसे मान लीजिए मालिक की वाणी और उसका हुक्म।
मिलकर चलना ही होगा
मिलकर सोचो, मिलकर मानो तो उद्धार होगा।
अदालत के फ़ैसले के बाद भी तो हिन्दू-मुस्लिम आज मिलकर ही सोच रहे हैं।
जनता चाहती है कि मिलकर सोचो।
मालिक भी चाहता है कि मिलकर सोचो।
मिलकर सोचो, मिलाकर सोचो।
अपने अपने ग्रंथ लाकर सोचो।
आज नहीं सोचोगे तो बाद में सोचना पड़ेगा।
दुनिया में नहीं सोचोगे तो परलोक में सोचना पड़ेगा।
बस अन्तर केवल यह है कि आज का सोचा हुआ काम आएगा और उस दिन का सोचना सिर्फ़ अफ़सोस करने के लिए होगा।

ईश्वर साक्षी है आपके कर्मों का
इन्साफ़ का दिन क़रीब है और मालिक तो आज भी क़रीब है।
वह साक्षी है आपके हरेक कर्म का, आपके हरेक विचार का।
उसे साक्षी मान लीजिए और निष्पक्ष होकर विचार करना सीख लीजिए।
जो ज्ञान आपके अन्तःकरण में है वह आप पर प्रकट हो जाएगा और जो ज्ञान दृश्यमान जगत में है वह भी आपको सुलभ हो जाएगा।
आपको वही मिलेगा जो आप ढूंढ रहे हैं।
क्या आपको क्लियर है कि आप क्या ढूंढ रहे हैं ?
क्या आप जानते हैं कि आप क्यों जी रहे हैं ?
क्या आप जानते हैं कि आप अपने हरेक कर्म के लिए उत्तरदायी हैं ?

परलोक में सफलता का लक्ष्य सामने रखते है सच्चे सत्कर्मी
क्या आप जानते हैं कि आपको परलोक में अपने कर्मों का फल भोगना ही होगा ?
यह दुनिया कर्म की दुनिया है और आने वाली दुनिया अंजाम की दुनिया है।
हमारा अंजाम क्या होने वाला है, यह हम जान सकते हैं अपने आज के कर्म देखकर।
लोग शिकायत करते हैं कि ‘आज नेक परेशान हैं और ज़ालिम मगन हैं।‘
इसे देखकर वे भी गुनाह पर दिलेर हो जाते हैं। हालांकि यही चीज़ बता रही है कि ज़रूर ऐसा होना चाहिए कि नेक लोगों को उनका वाजिब हक़ मिले। यहां नहीं मिल रहा है तो कहीं और ज़रूर मिलेगा।
नबियों और उनके नेक साथियों की ज़िन्दगियां देख लीजिए। उन्होंने कभी नेकी यह सोचकर नहीं की कि उनकी नेकियों का बदला उन्हें दुनिया में ही मिल जाए।
कर्मों का फल कब और कैसे मिलता है ?

परलोक के चिंतन मिटा देता है हरेक निराशा, हरेक पाप
इस बात का इन्सान के चरित्र-निर्माण में बहुत बड़ा दख़ल है। जो लोग इसे नज़रअन्दाज़ करके समाज से ईमानदारी और नैतिकता की उम्मीद करते हैं। वे मानवीय स्वभाव को नहीं जानते। ईश्वर ने मानव का स्वभाव ही ऐसा बनाया है कि वह पहले फल का विचार करता है तत्पश्चात उसे पाने के लिए वह मेहनत करता है। परलोक का सिद्धांत इन्सान के बहुत से सवालों को और समाज की सारी समस्याओं को हल करता है। इसीलिए परलोक का विश्वास हमेशा से धर्म का अंग रहा है। अब इसे अपने विचार और कर्म का अंग बनाने की भी ज़रूरत है।

‘सत्यमेव जयते‘ साकार होगा परलोक में
‘जो भी भले काम करके आया उसे उसकी नेकी का बेहतर से बेहतर बदला और अच्छे से अच्छा अज्र (बदला) मिलेगा और उस दिन की दहशत से उनको अमन में रखा जाएगा। और जो कोई भी अपने काले करतूत के साथ आएगा, ऐसों को औंधे मुंह आग में झोंक दिया जाएगा और कहा जाएगा कि तुम्हारे बुरे कामों की क्या ही भारी सज़ा से आज तुमको पाला पड़ गया है।
(कुरआन, 28, 89 व 90)

अनुवाद कुरआन मजीद- मौलाना अब्दुल करीम पारीख साहब रह.

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-17)

खुदा का वजूद जरूरी क्यों?


इस तरंह खुदा के गुणों के बारे में स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न मस्तिष्क को उद्वेलित कर सकता है। वह यह कि खुदा का वजूद वास्तव में है भी या नहीं? हो सकता है किसी अत्यन्त मेधावी दिमाग ने या कई दिमागों ने एक ऐसी महाशक्ति की कल्पना कर ली हो जिसकी विशेषताएं उपरोक्तानुसार हैं। इस कल्पना के पीछे कई कारण हो सकते हैं। मसलन ये कि कुछ इंसान जो बाकियों से अपने को सम्मान दिलाना चाहते थे, लोगों में एक अदद ईश्वर के बारे में कहानियां फैलाने लगे और अपने को ईश्वर का भेजा दूत कहलाने लगे ताकि लोग उनका सम्मान करने लगें और ईश्वर के साथ साथ उनसे भी डर कर उनकी आज्ञा मानें। लेकिन अगर ऐसी बात होती तो यह मान्यता कुछ स्थानों या ज्यादा से ज्यादा कुछ देशों में पहुंचकर समाप्त हो जाती। और अगर हर जगह होती तो भी ईश्वर की कल्पना हर जगह पर अलग अलग तरीके से की जाती। कहीं उसका कुछ और रूप बताया जाता तो कहीं किसी और रूप में उसके अस्तित्व के बारे में कहा जाता। लेकिन हम देखते हैं कि कुछ भ्रमों को अगर छोड़ दिया जाये तो अल्लाह के गुण हर जगंह समान मिलते हैं।



अज़मते ख़ान ए काबा

इस दुनिया में ख़ुदा का पहला घर ख़ान ए काबा है। तारीख़े अतीक़ भी इस बात की गवाह है कि इससे क़ब्ल कोई एक भी ऐसी इबादत गाह कायनात में मौजूद नही थी जिसे ख़ुदा का घर कहा गया हो। इस की तसदीक़ क़ुरआने मजीद भी इन अल्फ़ाज़ में करता है:

(सूर ए आले इमरान आयत 96)

तर्जुमा: बेशक पहला घर जो लोगों की इबादत के लिये मुक़र्रर किया गया था वह यही है बक्का में, जो बा बरकत और सारे जहानों के लिये मुजिबे हिदायत है।

एक तारीख़ी रिवायत के मुताबिक़ ख़ान ए काबा बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदुल अक़सा से एक हज़ार तीन सौ साल पहले तामीर हुआ है।

असरे जाहिलियत में भी तमाम अरब अपने जाहिली रस्म व रिवाज के मुताबिक़ ख़ान ए काबा का तवाफ़ और हज किया करते थे।

हज़रत इब्राहीम (अ) ने हज़रत मूसा (अ) से नौ सौ बरस पहले इस की ज़ाहिरी तामीर मुकम्मल की और बारगाहे हक़ में दुआ की। यह दुआ क़ुरआने करीम में इस तरह बयान हुई है:

(सूर ए इब्राहीम आयत 37) परवरदिगारा, मैंने इस बे आबो गयाह वादी में अपनी औलाद को तेरे मोहतरम घर के पास ला बसाया है......।

हिजरत के अठठारवें महीने माहे शाबान सन 2 हिजरी में जंगे बद्र से एक माह पहले मुसलमानों के क़िबला बैतुल मुक़द्दस से मुन्तक़िल हो कर काबे की सिम्त हो गया। जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद के सूर ए बकरह में किया गया है।

ख़ुदा वंदे आलम का मुसलमानों पर बड़ा अहसान है कि उसने हमारा क़िबला ख़ान ए काबा क़रार दिया। चूँ कि बैतुल मुक़द्दस ऐसा क़िबला था जिस के कई दावेदार होने की वजह से कई बार काफ़िर फ़ातेहों ने उसे वीरान और नजिस किया और वहाँ के बसने वालों को कई बार ग़ुलाम बनान पड़ा और कई बार वहाँ क़त्ले आम भी जारी रहा, जो आज भी शिद्दत से हो रहा है और तारीख़ मुसलमानों के सुकूत पर महवे हैरत है।

यह एक बड़ी ताज्जुब ख़ेज़ बात है और तारीख़े आलम भी इस बात की गवाह है कि पिछले पाच हज़ार सालों में किसी ने भी ख़ान ए काबा पर अपनी ज़ाती मिल्कियत होने का दावा नही किया। यह ऐसा अनमोल शरफ़ है जो दुनिया की किसी इबादत गाह या मअबद को हासिल नही हुआ।

अरब के बुत परस्त भी उसे बैतुल्लाह ही कहा करते थे। इस्लाम से पहले भी उसकी हुरमत, हिफ़ाज़त, सियानत ख़ुदा मुतआल ने शरीफ़ नस्ल अरबों के ज़रिये फ़रमाई और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ज़रिये से मुसलमानों को क़यामत तक के लिये उसका मुहाफ़िज़ व पासबान बना दिया।

नबी करीम (स) की विदालते बा बरकत से एक महीने बीस रोज़ पहले जब यमन का बादशाह अबरहा अपनी साठ हज़ार हाथियों की मुसल्लह फ़ौज लेकर ख़ान ए काबा को ढाने की ग़रज़ से मक्के की वादियों में आया तो परवर दिगार ने अपने घर के हरीम की हिफ़ाज़त की ख़ातिर किसी इंसानी फ़ौज का सहारा नही लिया बल्कि अबाबीलों जैसे नाज़ुक अंदाम परिन्दों के ज़रिये उन हाथियों पर कंकड़ियाँ बरसा कर उन अफ़वाजे फ़ील को तहस नहस कर दिया। क़ुरआने करीम के सूर ए फ़ील में इसी वाक़ेया का ज़िक्र है।

जन्नत से ख़ास कर उतारे गये दो अहम पत्थर हजरे असवद और मक़ामे इब्राहीम, अहले आदम (अ) और दौरे इब्राहीमी से अब तक मौजूद हैं और दुनिया के सब से ज़्यादा मुक़द्दस पानी का क़दीम चश्मा ज़मज़म इसी ख़ान ए काबा के क़रीब है। इसके पानी के नेकों की शराब कहा गया है, लाखों अक़ीदत मंद मुसलमान दुनिया के गोशा व किनार से इस पानी को तबर्रुक के तौर पर ले जाते हैं।

मक्क ए मुअज़्ज़मा और फ़ज़ाएले ख़ान ए काबा में क़ुरआने हकीम की कई आयात नाज़िल हुई हैं। अल्लाह तआला ने शहरे मक्का को (उम्मुल क़ुरा) यानी बस्तियों का माँ कहा है और सूर ए अत तीन और सूर ए अल बलद में अल्लाह तआला ने इस शहरे पुर अम्न में की क़सम खाई है। इस शहर में यहाँ के शहरियों के अलावा, दूसरे तमाम लोगों को एहराम बाँधे बग़ैर दाख़िल होने की इजाज़त नही है। यह ख़ुसूसियत दुनिया के किसी और शहर को नसीब नही है। मस्जिदुल हराम की इबादत और यहाँ की हर नेकी अक़ताए आलम में की गई नेकियों से एक लाख गुना ज़्यादा बेहतर है। यह मक़ाम इस क़दर मोहतरम और पुर अम्न है कि यहाँ न सिर्फ़ ख़ूनरेज़ी मना है बल्कि न किसी जानवर का शिकार किया जा सकता है व किसी पेड़ को काटा और सबज़े और पौधे को उखाडा़ जा सकता है।

क़ुरआने पाक में उसे बैतुल हराम यानी शौकत का घर कहा गया है। ख़ान ए काबा के महल्ले वुक़ू के बारे में लिखा गया है कि यह ऐन अरशे इलाही और बैतुल मामूर के नीचे है। इल्मे जुग़राफ़िया के माहिरीन का कहना है कि काबे के महल्ले वुक़ू को हम नाफ़े ज़मीन कह सकते हैं।

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-16)

खुदा को कोई चीज़ ईजाद करने के लिए किसी चिंतन या कल्पना की ज़रूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि कोई चीज़ वजूद में आये, उसे इसका ज्ञान रहता है। ये बात भी कुछ अक्ल से परे हो जाती है क्योंकि मनुष्य अगर किसी चीज़ का निर्माण करता है तो पहले उसके बारे में सोचता है उसकी आवश्यकता कहां पड़ सकती है इस बारे में छानबीन करता है। फिर मन ही मन उसकी रूपरेखा (Structure) तैयार करता है, तब जाकर एक वस्तु तैयार होती है। और इस वस्तु में भी अत्यन्त चिंतन के बाद भी कहीं न कहीं कमी रह जाती है। इस कमी को दूर करने के लिए फिर नये सिरे से रिसर्च की जाती है, उस में नयी खोजों और नये आविष्कारों का उपयोग करके सुधार किया जाता है और नया माडल तैयार हो जाता है।


उदाहरण के लिए जब एडीसन ने बल्ब का अविष्कार किया तो बल्ब में आक्सीजन गैस भरी होने के कारण वह बार बार फेल हो जाता था। फिर उसमें सुधार करके आक्सीजन गैस निकाली गयी और कार्बन का फिलामेंट लगाया गया। लेकिन इसमें कुछ खराबियां थीं। जैसे कि वह जल्दी काला पड़ जाता था और फिलामेन्ट बहुत जल्दी गल जाता था। बाद में फिलामेन्ट परिवर्तित करके टंग्स्टन का लगा दिया गया। इस प्रकार बल्ब का विकसित माडल मिला। परन्तु एडीसन को प्रथम बल्ब के आविष्कार के लिए भी वर्षों का परिश्रम करना पड़ा। पहले उसने कल्पना की, फिर चिंतन किया और अन्त में गणना करके उसे वास्तविक रूप में तैयार किया। जब छोटी से छोटी वस्तु का निर्माण बिना कल्पना और चिंतन के नहीं हो सकता तो अल्लाह ने पूरी सृष्टि बिना कल्पना और चिंतन के कैसे तैयार कर दी?


यहां एक बार फिर खुदा का असीमित ज्ञान अपना कार्य करता है। वास्तव में चिंतन की उस समय जरूरत पड़ती है जब ज्ञान की कमी हो। एडीसन ने जब बल्ब बनाने का प्रयास शुरू किया था तो उसे इस बारे में कोई ज्ञान नहीं था कि बल्ब की कार्यप्रणाली क्या होगी। जैसे जैसे उसने एक्सपेरीमेन्ट किये उसके ज्ञान में बढ़ोत्तरी हुई। अपने प्रयोगों के गुण दोषों के बारे में पता चला और एक दिन वह सफल हो गया। गाड़ी का कोई मैकेनिक प्रारम्भ में बहुत कठिनाई पूर्वक किसी गाड़ी की खराबी दूर कर पाता है। क्योंकि उसे इस बारे में ज्ञान कम रहता है लेकिन एक बार सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्चात जब वह एक्सपर्ट हो जाता है तो मात्र आवाज से खराबी पकड़ लेता है और बिना किसी विचार या चिंतन के मशीनी अंदाज में पुर्जे खोल खालकर ठीक कर देता है। इस तरंह कल्पना की आवश्यकता उस समय पड़ती है जब हमें किसी नयी वस्तु के बारे में कुछ नहीं मालूम रहता। प्रारम्भ में जब एटामिक स्ट्रक्चर वैज्ञानिको के लिए अज्ञात था और इलेक्ट्रान प्रोटान तथा न्यूट्रान की खोज हो चुकी थी उस समय परमाणु माडल के लिए अनेक कल्पनाएं की गयीं। फिर जैसे जैसे विज्ञान प्रगति करता गया और प्रयोगों के आधार पर जो कल्पना सही सिद्ध हुई उसे लागू कर दिया गया। बाकी को निरस्त कर दिया गया। इस तरंह हम देखते हैं कि ज्ञान की कमी कल्पनाओं और विचारों को जन्म देती है। चूंकि खुदा के पास ज्ञान सम्पूर्ण है, उसमें कहीं कोई कमी नहीं है इसलिए उसे कल्पना या चिंतन करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती।


वास्तव में उसका ज्ञान इतना सम्पूर्ण है कि सृष्टि रचने से पहले वह सृष्टि रचने के बारे में सब कुछ जानता था और सृष्टि में आगे क्या होने वाला है, कौन सी घटनाएं घटेंगी, कौन से प्राणी पैदा होंगे इन सब के बारे में उसे पूर्ण ज्ञान था। किस तरंह उसे भविष्य के बारे में पहले से मालूम हो जाता है, इसकी व्याख्या इससे पहले की जा चुकी है।


ये थी अल्लाह के कुछ ऐसे गुणों की व्याख्या जो सरसरी तौर पर विचार करने पर तर्कसंगत नहीं प्रतीत होते हैं। इनका चिंतन लोगों को भ्रम का शिकार बना देता है और वे अनेक प्रश्नों में उलझ कर गलत दिशा में कदम बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि अल्लाह, ईश्वर या गॉड के बारे में अनेक भ्रांतियां फैल गयी हैं। कुछ ये मानने लगे हैं कि ईश्वर सशरीर है। उसके हाथ, पैर, मुंह, आँख सब कुछ है। कहीं ये मान्यता फैल गयी कि सृष्टि की रचना ईश्वर के एक सूक्ष्म अंश से हुई तो कहीं देवताओं और पैगम्बरों को ईश्वर या अल्लाह के नूर से उत्पन्न बताया जाने लगा। जबकि हकीकत यह है कि अल्लाह ने अपना कोई हिस्सा अलग नहीं किया। बल्कि उसने इन सब की रचना की है।



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अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-15)

कुछ लोग यह एतराज़ कर सकते हैं कि दुनिया में बहुत जालिम लोग भी हुए हैं। चंगेज खान जैसे शासकों ने पूरा कत्लेआम मचा दिया था। आधुनिक युग में भी अमेरिका ने एटम बम की मदद से हिरोशिमा और नागासाकी जैसे शहर पूरी तरंह नष्ट कर दिये लेकिन इसके लिए प्रकृति ने उन्हें कोई सजा नहीं दी। और कभी कभी मामूली बातों पर भी सजा मिल जाती है।
इस एतराज का जवाब वही उत्तर हो सकता है जो इससे पहले एक अन्य प्रश्न का जवाब बन चुका है। कि अल्लाह महाशक्ति है और असलियत में उसने बन्दों को सज़ा या जज़ा देने का इरादा कयामत तक के लिए मुल्तवी कर रखा है। इस दुनिया में वह सिर्फ कुछ नमूने दिखाता है और यह नमूने अलग अलग बन्दों के लिए अलग अलग होते हैं। अगर वह सभी बन्दों को एक ही प्रकार की सज़ा या जज़ा देगा तो यह एक अत्यन्त सरल प्रक्रिया हो जायेगी और लोग यह मानने लगेंगे कि यह एक निश्चित प्रक्रिया है ठीक किसी मशीनी सिस्टम की तरंह जो कि वे लोग खुद भी बना सकते हैं। साथ ही वे भले और बुरे काम एक दायरे में रहकर करेंगे। यहां से वे यह सोचना शुरू कर देंगे कि अल्लाह भी उन्हीं जैसी अक्ल रखने वाला कोई प्राणी है जो कहीं अन्य स्थान पर निवास कर रहा है।



तुम हरगिज़ अपनी सख़्तियाँ और परेशानियाँ लोगों पर ज़ाहिर न करो

मुफ़ज़्ज़ल बिन क़ैस ज़िन्दगी की दुशवारी से दो चार थे और फ़क्र व तंगदस्ती कर्ज़ और ज़िन्दगी के अख़राजात से बहुत परेशान थ। एक दिन हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अपनी बेचारगी और परेशानी बयान की, कि इतना मुझ पर कर्ज़ है और मैं नहीं जानता की किस तरह अदा करूँ, ख़र्च है मगर आमदनी का कोई वसीला नहीं। मजबूर हो चुका हूँ क्या करूं कुछ समझ मे नहीं आता, मैं हर ख़ुले हुए दरवाज़े पर गया मगर मेरे जाते ही वो दरवाज़ा बन्द हो गया।

और आख़िर में उन्होने इमाम से दरख़ास्त की कि उसके लिए दुवा फ़रमाएं और ख़ुदा वन्दे आलम से चाहें कि उसकी मुश्किल आसान हो। इमाम ने एक कनीज़ को हुक्म दिया (जो कि वहाँ मौजूद थी) जाओ और वो अशरफ़ी की थैली ले आओ जो कि मंसूर ने मेरे लिए भेजी है। वो कनीज़ गई और फ़ौरन अशरफ़ियों की थैली लेकर हाज़िर हुई। इमाम ने मुफ़ज़्ज़ल से फ़रमाया कि इस थैली में चार सौ दीनार हैं जो कि तुम्हारी ज़िन्दगी के लिए कुछ दिन का सहारा बन सकते हैं। मुफ़ज़्ज़ल ने कहा, हुज़ूर मेरी ये ख़्वाहिश न थी, मैं तो सिर्फ़ दुआ का तलबगार था।

इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया, बहुत अच्छा मैं दुआ भी करूंगा, लेकिन मैं तुझ से एक बात कहूँ कि तुम हरगिज़ अपनी सख़्तियाँ और परेशानियाँ लोगों पर ज़ाहिर न करो क्योकि उसका पहला असर ये होगा कि तुम ज़मीन पर गिर चुके हो और ज़माने के मुकाबले में शिकस्त खा चुके हो और तुम लोगों की नज़रों से गिर जाओगे और तुम्हारी शख़्सियत व वक़ार लोगों के दरमियान से ख़त्म हो जाएगा।

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-14)

अल्लाह का कोई रूप या आकार नहीं है। वह निराकार है। वह किसी को दिखाई नहीं देता और न किसी को दिखाई देगा। यह बात गले से नहीं उतरती। क्योंकि कोई भी वस्तु जीवधारी या निर्जीव किसी न किसी रूप, आकार में हमें प्रभावित करता है। जो वस्तुएं नहीं भी दिखाई देतीं उन्हें वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से देखा जा सकता है। जैसे हवा नंगी आँखों से नहीं दिखाई देती लेकिन माइक्रोस्कोप की मदद से उसके अणु देखे जा सकते हैं। इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, न्यूट्रान वगैरा को कैथोड किरण कम्पनदर्शी, विल्सन क्लाउड चैम्बर और इस प्रकार के दूसरे उपकरणों की मदद से देखा जा सकता है। कुल मिलाकर हमारे आसपास जो भी चीजें हैं उन्हें विभिन्न उपकरणों की मदद से हम देख सकते हैं। फिर अल्लाह, जिसे हर जगह मौजूद माना जाता है क्यों नहीं दिखाई देता?



अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-13)

खुदा से सम्बंधित विवादास्पद गुण :


विरोधाभासों के स्पष्टीकरण के बाद हम खुदा से सम्बंधित उन गुणों का अध्ययन करते हैं जो विवादास्पद माने जाते हैं। ऐसे गुण जो किसी मनुष्य की अक्ल में नहीं समा पाते और इस वजह से वह यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ईश्वर वास्तव में है या नहीं? क्योंकि उसे वह गुण तर्कसंगत नहीं मालूम होते।


कुछ इस तरह के तर्कसंगत न प्रतीत होने वाले गुण इस प्रकार हैं :


अल्लाह का कोई आकार या रूप नहीं है। वह निराकार है और किसी को दिखाई नहीं देगा। हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार वह कयामत के रोज दिखाई देगा। लेकिन यह मान्यता बेबुनियाद है और कुछ धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी गयी गलतफहमी का परिणाम है। धर्मग्रंथों से इसका कोई सुबूत नहीं मिलता। कुछ मजहब खुदा को सशरीर मानते हैं। लेकिन यह भी एक गलत मान्यता है।  दरअसल अल्लाह का निराकार होना लोगों की अक्ल में नहीं समाता और उपरोक्त मान्यताएं इसी कन्फ्यूजन का परिणाम हैं।


अल्लाह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। यह बात भी अक्सर लोगों के गले नहीं उतरती और वे उस डोर का सिरा तलाश करने में जुट जाते हैं जहां से खुदा की पैदाइश हुई है। जब वे देखते हैं कि उनके आसपास प्रत्येक प्राणी और वस्तु नश्वर है, कभी न कभी मिट जाती है तो वे अल्लाह से सम्बंधित इस गुण के बारे में कन्फ्यूज हो जाते हैं। इसलिए उसकी उत्पत्ति और अंत के बारे में बहुत सी गलत मान्यताएं प्रचलित हो गयीं। कुछ लोग उसकी उत्पत्ति कमल नाल से मानने लगे तो कुछ ने उसका भी वंश चला दिया। जिसमें एक ईश्वर मिटता है तो दूसरा पैदा हो जाता है। कहीं पर ये मान्यता प्रचलित हो गयी कि मनुष्य जैसे प्राणियों को दूसरे प्राणियों ने बनाया और उन प्राणियों को पुन: दूसरे प्राणियों ने बनाया और इस तरह यह क्रम चलता रहता है।


अल्लाह छुपी हुई बातों को जानता है। किसी प्राणी के मस्तिष्क में कौन से विचार उमड़ रहे हैं और कौन से विचार पैदा होने वाले हैं सबसे वह भली भाँती वाकिफ है। ईश्वर का यह गुण भी कुछ समझ में नहीं आता कि इधर मनुष्य के मस्तिष्क में कोई बात आयी और उधर ईश्वर को मालूम हो गयी। यह कुछ तर्कसंगत नहीं मालूम होता।


अल्लाह हर तरह के जज्ब़ात से बेनियाज़ है। उसे न तो जोश आता है, न क्रोध । न वह खुश होता है न नाराज। न उसे किसी से ईर्ष्या होती है और न ही उसे कोई गम सताता है। न सृष्टि के निर्माण में उसने गर्व का अनुभव किया है और न कोई चीज नष्ट होने पर उसे अफसोस होता है। यानि कोई भी भावना उसे उत्तेजित नहीं कर सकती। अल्लाह का भावनाहीन होना भी तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि बहुत से धर्मग्रंथों में इस तरह की कहानियां मिलती हैं जब उसने किसी बन्दे से खुश होकर उसे बहुत कुछ प्रदान कर दिया और किसी जाति से अप्रसन्न होकर प्रलय मचा दी और वह पूरी की पूरी जाति नष्ट हो गयी। हज़रत नूह पैगम्बर के वक्त में आया तूफान इसका उदाहरण है। अगर अल्लाह में क्रोध या प्रसन्न होने की भावना नहीं होती तो क्यों वह इस तरह की घटनाओं को घटित करता है? सृष्टि की रचना के पीछे उसका उद्देश्य क्या है? इस प्रकार के बहुत से सवालों के कारण उसका भावनारहित होना अक्ल से परे हो जाता है।


अगला तर्कसंगत न प्रतीत होने वाला गुण ये है कि वह अनन्त गुणों का स्वामी है। अक्ल से परे लगने वाली बात इसमें ये है कि गुण हम चाहे जितना गिन लें, कहीं न कहीं ये गिनती खत्म हो जायेगी। न्यायप्रियता, ज्ञान, शक्ति इत्यादि शुमार करते चले जाईए। आखिर में हमारे पास शुमार करने के लिए कोई गुण नहीं बचेगा। फिर अल्लाह किसी तरह अनन्त गुणों का स्वामी हो सकता है?


खुदा को सृष्टि की रचना मेंं किसी भी तरह की हरकत की जरूरत नहीं पड़ी। और न ही वह सृष्टि को चलाने के लिए गति करता है। वह बस इरादा करता है और किसी भी तरह का काम अपने अंजाम को पहुंच जाता है। उसका यह गुण भी कुछ विषम प्रतीत होता है। क्योंकि हमें कोई भी कार्य करने के लिए हाथ पैर हिलाने पड़ते हैं, गति करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए बातचीत करने के लिए होंठ हिलाने पड़ेंगे। फोन पर बात करने के लिए नम्बर मिलाना पड़ेगा। कहीं जाने के लिए कदमों का इस्तेमाल करना पड़ता है। जबकि अल्लाह तो जिस्म भी नहीं रखता। बिना किसी हरकत के किस तरंह वह कार्यों को अंजाम दे देता है यह बात कुछ पल्ले नहीं पड़ती।


इसी तरह खुदा को कोई चीज ईजाद करने के लिए किसी चिंतन या कल्पना करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि कोई चीज वजूद में आये, उसे उसका ज्ञान रहता है। यह गुण भी अक्ल को कुछ विषम सा प्रतीत होता है। क्योंकि मानव अगर कोई आविष्कार करता है तो उसके पीछे बरसों की रिसर्च और पूर्व प्रयोगों का दखल रहता है। पहले वह आविष्कार की कल्पना करता है, उसकी जरूरत महसूस करता है। फिर यह कैसे हो सकता है कि खुदा बिना किसी चिंतन या कल्पना के कोई वस्तु निर्मित कर ले?


विवादास्पद गुणों के स्पष्टीकरण : इस तरह हम देखते हैं कि खुदा से सम्बंधित ये गुण ऐसे हैं जो प्रथम दृष्टि में तर्कसंगत नहीं प्रतीत होते हैं और इनका चिंतन करने वाला उलझनों के जाल में फंसकर सही रास्ते से भटक जाता है और कुछ का कुछ समझने लगता है। जिसमें काफी कुछ उसके अधूरे ज्ञान का भी दखल रहता है। अल्लाह के बारे में फैले अनगिनत भ्रम भी इसके जिम्मेदार होते हैं। और गैर साइंटिफिक चिंतन भी अक्सर गलत परिणाम दे देता है। मैं इस बात का दावा तो नहीं करता कि मेरे विचार शत प्रतिशत सही हैं। लेकिन मैं एक रास्ता जरूर सुझा रहा हूं। यह रास्ता है धर्मग्रंथों के बारे में और खुदा के बारे में साइंटिफिक तरीके से चिंतन। क्योंकि वैज्ञानिक अपना चिंतन इस दिशा में बहुत कम करता है और उसकी रिसर्च ईश्वर से अलग होती है। हालांकि इस कथन के अपवाद हैं। कई महान वैज्ञानिक और फिलास्फर अल्लाह के बारे में चिंतन मनन कर चुके हैं। लेकिन बहरहाल हर मनुष्य एक अलग तरीके से सोचता है। दूसरी बात ये है कि साइंस लगातार डेवलप होती रहती है। पुराने नियम खंडित होते हैं नये बनते हैं। किसी बात को सिद्ध करने के लिए नये नये उदाहरण सामने आते हैं। स्पष्ट है कि आज से पचास वर्ष पहले अगर वैज्ञानिक कोई निष्कर्ष निकाल चुके हैं तो आज वर्तमान में वे गलत सिद्ध हो सकते हैं।


तो अब एक एक कर अल्लाह से सम्बंधित उन गुणों को लेते हैं जो मानव मन में सैंकड़ों सवाल पैदा कर देते हैं।



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इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों का सम्मेलन

समस्त मनुष्यों के लिए आर्थिक गतिविधियां, स्फ़ूर्ति, रचनात्मकता और परिपूर्णता का कारण बनती है। समाज की आधी जनसंख्या के रूप में महिलाएं भी इसी प्रकार का अधिकार रखती हैं। महिलाएं आर्थिक गतिविधियों और प्रयासों द्वारा अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर समाज और पारिवारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए प्रभावी और सार्थक भूमिका निभाने में सक्षम हो जाती हैं। अलबत्ता इसी के साथ सरकारों को भी विभिन्न आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की क्षमताओं से लाभ उठाने के लिए कार्यक्रम बनाना चाहिए।


आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक क्षेत्रों और अन्य समस्त क्षेत्रों में महिलाओं को आगे बढ़ाना, महिलाओं की क्षमताओं से लाभ उठाने के लिए मुख्य क़दम है। इसीलिए इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन ओआईसी ने महिलाओं के स्थान को ऊंचा उठाने के उद्देश्य से इस्लामी देशों में महिलाओं की स्थिति की समीक्षा करने के लिए विभिन्न सम्मेलनों का आयोजन किया। इन सम्मेलनों में वर्ष 2005 में इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों के विदेशमंत्रियों ने यमन में निर्णय किया कि अर्थव्यवस्था और परिवार के क्षेत्रों में महिलाओं के स्थान को बढ़ाने के लिए इस संगठन की महिला मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित करेंगे। इसका पहला सम्मेलन तुर्की में और दूसरा क़ाहिरा में आयोजित हुआ था। दूसरे सम्मेलन में ईरान के प्रतिनिधियों की ओर से वर्ष 2010 में तेहरान में इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों के तीसरे सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मति से पारित हो गया।


19 दिसम्बर को इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों का तीसरा सम्मेलन तेहरान में आरंभ हुआ और तीन दिनों तक जारी रहा। इस तीन दिसवीय सम्मेलन में 20 महिला मंत्रियों सहित इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों के 43 प्रतिनिधि सम्मलित हुए। इस सम्मेलन का मुख्य विषय था महिला, परिवार और अर्थव्यवस्था। यह विषय, इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के दस वर्षीय क्रियाकलापों और इस्लामी मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं के विकास के आधार पर चुना गया था। इस सम्मेलन में समीक्षा किए जाने वाले बिन्दुओं में से एक मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि और उपभोग मानक में सुधार था। प्रस्तुत किए गये अन्य विषयों में से एक वैश्विक आर्थिक संकट से उत्पन्न होने वाली हानियों और इस्लामी देशों में महिलाओं के आर्थिक और राजनैतिक परिवर्तनों में होने वाली हानियों को कम करना है। इस परिधि में फ़िलिस्तीन, पाकिस्तान, इराक़ और दूसरे मुसलमान देशों की महिलाओं को होने वाली हानियों को कम करने के उपायों को बयान करना और समीक्षा करना है। इसी प्रकार इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों और प्रतिनिधियों ने इस्लामी देशों की एकता, आर्थिक क्षेत्रों और कारकों की समीक्षा करते हुए मुसलमान महिलाओं की भागीदारी और विकास के विषय पर भाषण दिए।


राष्ट्रपति डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद ने इस सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में महिला, परिवार और अर्थव्यवस्था को महत्त्वपूर्ण तत्व और समाज के कल्याण का कारण बताया और कहा कि महिला, परिवार के गठन का मुख्य बिन्दु और तत्व है। कृपाशील होना, सुख शांति प्रदान करना और प्रबंधक व प्रशिक्षण तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में महिलाओं की मुख्य भूमिका उल्लेखनीय है। राष्ट्रपति ने महिलाओं पर पश्चिम की भौतिक दृष्टि की ओर संकेत करते हुए कहा कि हालिया दशक में वर्चस्ववादियों और सम्राज्यवादियों ने महिलाओं का अपमान करने का प्रयास किया है और उन्होंने उनके विकास और परिपूर्णता तक पहुंचने के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न की है और परिवार को तोड़ने का प्रयास किया ताकि महिलाओं के प्रेम और स्नेह के स्रोत को समाप्त कर दें और महिलाओं के मुख्य मोर्चे को ध्वस्त कर दें। इसके विपरीत राष्ट्रपति ने इस्लामी देशों की महिलाओं की भूमिका को सामाजिक गतिविधियों और परिवार में महिलाओं के वास्तविक स्थान और हस्तियों को पुनर्जिवित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण बताया और कहा कि इस्लामी देशों और बहुत से देशों की महिलाएं, मानवीय और ईश्वरीय विचार धाराओं पर आधारित शक्तिशाली विचारधारा और वैचारिक आधारभूत संरचना से संपन्न हैं।


महिलाएं लक्ष्यों से भलिभांति अवगत हैं और हज़रत मरियम, हज़रत ख़दीजा और हज़रत फ़ात्मा सलामुल्लाह अलैहा जैसी महिलाओं के आदर्श को अपनाए हुए हैं।


इस समय महिलाओं को पहले से अधिक अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक भूमिकाओं के मध्य गम्भीर समन्वय की आवश्यकता है। राष्ट्रपति कार्यालय में परिवार और महिला मामलों के केन्द्र की प्रमुख डाक्टर मरियम मुजतहिद ज़ादे ने इस सम्मेलन में आर्थिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि का लक्ष्य आर्थिक प्रगति से बढ़कर बताया और इसका लक्ष्य को सक्रिय और लचकदार मानवीय संपत्ति को उत्पन्न करना बताया और कहा कि समाज में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक उपस्थिति को कभी भी ऐसा नहीं होना चाहिए कि वो व्यक्तिगत सुरक्षा और परिवार में महिलाओं की भूमिका को ख़तरे में डाल दे। मुसलमान महिलाओं को मातृत्व और पत्नी की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर बल देते हुए अपनी योग्यताओं और इस्लामी मूल्यों पर भरोसा करते हुए अर्थ व्यवस्था के ढांचे में गतिविधियां करनी चाहिए।


इस्लामी समाज में यौन भेदभाव से मुक़ाबला करना, महिलाओं में जागरूकता बढ़ाना, उनकी समस्याओं का समाधान करना, यह सब महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ करने की ओर बढ़ाए गये क़दमों में से है। इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के महासचिव अकमलुद्दीन एहसान ओग़लू ने महिला मंत्रियों के सम्मेलन में इस बात की ओर संकेत करते हुए कि इस्लामी जगत की लगभग आधी जनसंख्या मुसलमान महिलाओं की है, कहा कि बहुत सी संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील भूमिका के रूप में महिलाओं की भूमिका को ध्यान में रखना आवश्यक है। इस्लामी देशों की कार्यवाहियां, महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव को मिटाने और उसके विकास और प्रगति में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने के लिए होनी चाहिए।


उन्होंने यह बयान करते हुए कि अधिकतर महिलाएं जल्दबाज़ी में किए गये फ़ैसलों, भ्रांतियों और समाज पर छाए नकारात्मक संस्कारों की बलि चढ़ती हैं, स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति उत्पन्न की जानी चाहिए कि पर्याप्त शिक्षाओं और वर्तमान विज्ञान तक महिलाओं की पहुंच सरल बनाई जाए ताकि इस माध्यम से समस्याओं का समाधान किया जाए।


वैज्ञानिक स्तर पर महिलाओं की क्षमताओं को विकसित करना, उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए क़दमों में से एक क़दम है। आज़रबाईजान गणराज्य के प्रतिनिधि मण्डल की प्रमुख सदाक़त क़हरमानू ने इस सम्मेलन में महिलाओं के शिक्षण और वैज्ञानिक स्तर को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि प्रगति और विकास की परिधि में महिलाओं में पायी जाने वाली क्षमताओं को सक्रिय करने के लिए पहला क़दम, विज्ञान, उद्योग, अर्थव्यवस्था और राजनैतिक विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के वैज्ञानिक स्तर को ऊपर उठाना है।


क़हरमानुवा ने इस बात को बयान करते हुए कि महिलाएं, प्रेम, संवेदना और अन्य ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभ उठाते हुए श्रेष्ठ मनुष्यों के प्रशिक्षण में सफलता से कार्य कर सकती हैं, कहा कि शिक्षित महिलाएं और समाज की बुद्धजीवी महिलाएं, अपने ज्ञान से लाभ उठाते हुए समाज की अगली पीढ़ी को बहुत अच्छे ढंग से प्रशिक्षित कर सकती हैं।


इसी आधार पर महिलाओं की क्षमताओं को व्यवहारिक बनाने के लिए महिलाओं को शिक्षित करना अति आवश्यक है। खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आज़रबाईजान गणतंत्र सहित कुछ देशों ने महिलाओं की धार्मिक गतिविधियों को सीमित करके विशेषकर हेजाब पर प्रतिबंध लगाकर व्यवहारिक रूप से उनके ज्ञान संबंधी विकास में गम्भीर बाधाएं उत्पन्न कर दी हैं।


सर्वकालिक धर्म इस्लाम में महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों और उनके कार्य करने में किसी भी प्रकार की रोक टोक नहीं है। इस युक्ति के साथ कि मुसलमान महिलाओं का कार्य और उनकी गतिविधियां महिलाओं और उनके परिवार के अनुरूप होनी चाहिए। मिस्र की सर्वोच्च महिला परिषद की सचिव श्रीमति फ़रखुंदेह मुहम्मद हसन मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में इस्लामी मूल्यों की रक्षा और इस्लामी सिद्धांतों पर कटिबद्धता पर बल देते हुए कहती हैं कि इस्लामी मूल्यों की रक्षा के साथ महिलाओं के कार्य करने या उनके द्वारा आर्थिक गतिविधियों संलग्न होने में किसी भी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। इस्लाम के आरंभिक काल में आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति का स्पष्ट उदाहरण पैग़म्बरे इस्लाम (स) की प्रिय पत्नी हज़रत ख़दीजा हैं। ईरान उन सफल देशों में से है जिसने ईरानी महिलाओं के स्थान को पहचनवाने और उनको पहचान प्रदान करने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। यह सफलता इस्लाम धर्म की उच्च शिक्षाओं के पालन, स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई के मार्ग दर्शक बयानों की अनुकंपाओं की छत्रछाया में प्राप्त की गई है। इसीलिए प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विज्ञान, सांस्कृति और व्यायाम के विभिन्न क्षेत्रों में ईरानी महिलाएं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।


वर्तमान समय में ईरान में महिलाएं सरकार, संसद और प्रबंधन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से उपस्थित हैं। इसी प्रकार ईरान के विश्वविद्यालयों में छात्राओं की संख्या 60 प्रतिशत है। इसीलिए बहुत से पश्चिमी बुद्धिजीवियों ने यह स्वीकार किया है कि इस्लामी जगत में महिलाओं के लिए उचित आदर्श ईरानी महिलाएं हैं। तेहरान में इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन की महिला मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने वाली श्रीमति फ़रखुंदह मुहम्मद हसन सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में ईरानी महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहती हैं कि हमको खुलकर यह मान लेना चाहिए कि ईरानी महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका और उपस्थिति ने हमें आश्चर्य चकित कर दिया है। सामाज और इस्लामी मूल्यों की रक्षा सहित महिलाओं की जिस भूमिका पर भी हम आस्था रखते हैं उसका व्यवहारिक और स्पष्ट उदाहरण ईरानी महिलाएं हैं।


इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों की महिला मंत्रियों का तीसरा सम्मेलन 42 अनुच्छेदों पर आधारित घोषणापत्र पारित करके समाप्त हो गया। इस घोषणापत्र में परिवार और समाज में महिलाओं का विकास, इस्लामी देशों में विकास और प्रगति के महत्त्वपूर्ण तत्वों में बताया गया है। इसके अतिरिक्त घोषणापत्र का मुख्य विषय यह है कि परिवार और समाज दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका को पुनर्जिवित करने के लिए ऐसी अर्थव्यवस्था उत्पन्न की जाए जिसमें परिवार को मुख्य केन्द्र और ध्रुव माना गया हो। इसी प्रकार इस घोषणापत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक सम्मान रूप से पहुंच, हिंसा के मुक़ाबले में समर्थन और सहायता प्राप्त होना और फ़ैसले की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष रूप से बल दिया गया है।


घोषणा पत्र में इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों और उपस्थित लोगों ने समस्त सदस्य देशों में पीड़ित महिलाओं और बच्चों से सहृदयता व्यक्त करते हुए फ़िलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं के अधिकारों को स्वीकार करने और उनको उनके अधिकार दिलवाने पर बल दिया।


साभार: इस्लामी धर्म एकता परिषद


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