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मुसलमानो के दरमियान क़ुरआन की क्या अहमियत है? – 2

----- दूसरा अध्याय -----



क़ुरआने मजीद की तालीम के मुतअल्लिक़

1. क़ुरआने मजीद एक आलमी किताब है।

2. क़ुरआने मजीद एक कामिल और मुकम्मल किताब है।

3. क़ुरआने मजीद ता अबद और हमेशा बाक़ी रहने वाली किताब है।

4. क़ुरआने मजीद अपना आप सुबूत है।

5. क़ुरआने मजीद दो पहलू रखता है, यानी ज़ाहिरी और बातिनी।

6. क़ुरआने मजीद क्यों ज़ाहिरी और बातिनी दो तरीक़ों से बयान हुआ है?

7. क़ुरआने मजीद के अहकाम मोहकम और मुतशाबेह हैं।

8. इस्लामी मुफ़स्सेरीन और उलामा की नज़र में मोहकम व मुतशाबेह के क्या मअना हैं।?

9. क़ुरआने के मोहकम व मुतशाबेह में अहले बैत के तरीक़े।

10. क़ुरआने मजीद में तावील व तंज़ील मौजूद हैं।

11. मुफ़स्सेरीन और उलामा की नज़र में तावील के मअना।

12. क़ुरआने मजीद की रू से तावील के हक़ीक़ी मअना क्या हैं?

13. क़ुरआने मजीद में नासिख़ व मंसूख़ मौजूद हैं।

14. क़ुरआने मजीद में जरय व इंतेबाक़।

15. क़ुरआने मजीद की तफ़सीर, उस की पैदाईश और तरक़्क़ी।

16. इल्में तफ़सीर और मुफ़स्सेरीन के तबक़ात।

17. शिया मुफ़स्सेरीन के तरीक़े और उन के तबक़े।

18. ख़ुद क़ुरआने मजीद किस क़िस्म की तफ़सीर को कबूल करता है।

19. नतीज ए बहस

20. तफ़सीर का नमूना ख़ुद क़ुरआने मजीद की रू से ।

21. पैग़म्बर (स) के बयान और आईम्मा (अ) की नज़र में हुज्जीयत के मअना।

1. क़ुरआने मजीद एक आलमी किताब है।

क़ुरआने मजीद अपने मतालिब में उम्मतों में से एक ख़ास उम्मत जैसे उम्मते अरब या क़बीलों में एक ख़ास क़बीले या गिरोह यानी मुसलमानों से ही मुख़्तस नही है बल्कि क़ुरआने ग़ैर मुसलिम गिरोहों से भी इसी तरह बहस करता है जैसा कि मुसलमानों के हुक्म देता है। क़ुरआने मजीद अपने बहुत ज़्यादा ख़ुतबों में कुफ़्फ़ार, मुशरेकीन, अहले किताब, यहूदियों, ईसाईयों और बनी इसराईल के बारे में बहस करता है और इन गिरोहों में से हर के साथ ऐहतेजाज करते हुए उनको शिनाख़्ते हक़ीक़ी की तरफ़ दावत देता है। इस तरह क़ुरआने मजीद उन गिरोंहों में से हर गिरोह के साथ ऐहतेजाज करता है और उनको दावत देता है और अपने ख़िताब को उनके अरब होने पर मुख़्तस और महदूद नही करता। चुँनाचे मुश्रिकों और बुत परस्तो के बारे में फ़रमाता है:

पस अगर उन्होने तौबा कर ली और नमाज़ क़ायम की और ज़कात दी तो वह दीन में तुम्हारे भाई हैं।

(सूरह तौबा आयत 11)

और अहले किताब के बारे में यानी यहूदी, ईसाई और मजूसी जो अहले किताब में शुमार होते हैं। ऐ नबी कह दो कि अहले किताब ख़ुदा के कलाम की तरफ़ लौट आएँ कि हमारे और तुम्हारे दरमियान मसावी तौर पर क़बूल हो जाये। (मसावी तौर पर ख़ुदा के कलाम को क़बूल कर लें) और यह वह है कि ख़ुदा वंदे तआला के सिवा किसी और की परस्तिश न करें और न ही उसका शरीक़ क़रार दें और हम में से बाज़ लोग दूसरी चीज़ों को अपना ख़ुदा न बताएँ।

(सूरह आले इमरान आयत 64)

हम देखते हैं कि हरगिज़ यह नही फ़रमाया कि मुशरेकीने अरब तौबा कर लें और न ही फ़रमाया कि जो अहले किताब अरबी नस्ल से ताअल्लुक़ रखते हों।

हाँ तुलूए इस्लाम के आग़ाज़ में जब कि यह दावत ज़ज़ीरतुल अरब से बाहर नही फ़ैली थी तो फ़ितरी तौर पर क़ुरआनी ख़ुतबात उम्मते अरब ही से मंसूब किये जाते थे लेकिन हिजरत के छ: साल बाद जब यह दावत बर्रे अज़ीम अरब में फैल गई तो उस वक़्त यह ख़्याल बातिल हो गया।

उन आयात के अलावा दूसरी आयात भी हैं जो अवाम को दावते इस्लाम देती हैं जैसे आयते करीमा:

मुझ पर वही नाज़िल हुई है इसलिये कि तुम को नसीहत करुँ और डराऊँ उन लोगों को इस नसीहत और क़ुरआन पर ईमान रखते हैं।

(सूरह अनआम आयत 19)

यह क़ुरआन दुनिया वालों के लिये नसीहत और याद दहानी के अलावा और कोई चीज़ नही है।

(सूरह क़लम आयत 52) (सूरह साद आयत 87)

और आयते करीमा:

बेशक यह आयत बुज़ुर्ग तरीन आयात में से एक है जब कि इंसान को ख़ुदा से डराती है।

(सूरह मुदस्सिर आयत 35, 36)

तारीख़ी लिहाज़ से भी इस्लाम मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब मसलन बुत परस्तों, यहूदियों, ईसाईयों और ऐसे ही बाज़ दूसरी उम्मतों के अफ़राद मसलन सलमाने फ़ारसी, सुहैबे रूमी और बेलाले हबशी जैसी शख़्सीयतों के ज़रिये भी साबित हो चुका है।

2. क़ुरआने मजीद एक कामिल व मुकम्मल किताब है।

क़ुरआने मजीद मुकम्मल और कामिल किताब है जो इंसानी मक़ासिद पर मुश्तमिल है और इस मक़सद को कामिल तरीन सूरत में बयान करता है क्योकि इंसानी मक़ासिद जो हक़ीक़त पसंदी से लबरेज़ हैं। मुकम्मल जहान बीनी और अख़लाक़ी उसूल और अमली क़वानीन को ब रुए कार लाने पर मुश्तमिल है जो जहान बीनी के लिये ज़रुरी और लाज़िमी है। अल्लाह तबारक व तआला इस की तारीफ़ में फ़रमाता है:

ऐतेक़ाद और ईमान की हक़ की तरफ़ रहनुमाई करता है और अमल में सिराते मुसतक़ीम की तरफ़।

(सूरह अहक़ाफ़ आयत 30)

फिर एक जगह तौरात और इंजील के ज़िक्र में फ़रमाता है:

हमने तुम पर बरहक़ किताब नाज़िल की कि जो (इससे पहले) इसके वक़्त में मौजूद है उसकी तसद़ीक़ करती है और उसकी निगहबान भी है और फिर क़ुरआने मजीद ने गुज़िश्ता पैग़म्बरों और अंबिया की शरीयतों से मुक़ाबला करते हुए फ़रमाया:

उस (मुहम्मद) ने तुम्हारे लिये दीन का वही तरीक़ा और रास्ता मुक़र्रर किया है जिस (पर चलने) का नूह को हुक्म दिया गया था और (ऐ रसूल) उसकी हमने तुम्हारे पास वही भेजी है और उसी का इब्राहीम और मूसा और ईसा को भी हुक्म दिया गया।

(सूरह शूरा आयत 13)

और फिर जामे तौर पर फ़रमाता है:

हमने यह किताब आहिस्ता आहिस्ता और ब तदरीज तुम पर नाज़िल की और यह किताब हर चीज़ को बयान करती है।

(सूरह नहल आयत 89)

मुनदरजा बाला आयात की नतीजा यह है कि क़ुरआने मजीद दर अस्ल तमाम इलहामी और आसमानी किताबों के मक़ासिद पर मुश्तमल है बल्कि उन से ज़्यादा (मौज़ूआत इसमें आयें हैं।) और हक़ीक़त में हर वह चीज़ कि इंसान अपनी सआदत और ख़ुश क़िस्मती की राह तय करने में इस पर ईमान, ऐतेक़ाद और अमल करता है और इस चीज़ का मोहताज है। इस किताब में मुकम्मल और कामिल तौर पर बयान किया गया है।

3. क़ुरआने मजीद ता अबद और हमेशा बाक़ी रहने वाली किताब है।

गुज़िश्ता बाब में इस मौज़ू पर जो हमने बहस की है वह इस दावे को साबित करने के लिये काफ़ी है क्योकि वह बयान जो एक मक़सद और मतलब के बारे में मुकम्मल और मुतलक़ है। ऐतेबार और दुरुस्ती के लिहाज़ से एक ख़ास ज़माने में महदूद नही हो सकता और क़ुरआने मजीद अपने बयान को मुकम्मल और मुतलक़ जानता है और कमाल से बढ़ कर कोई और चीज़ नही हो सकती। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

क़ुरआन एक क़ाते बयान है जो हक़ और बातिल को आपस में जुदा करता है और इसमें बेहूदा बात और यावा गोई हरगिज़ नही है।

(सूरह तारिक़ आयत 13, 14)

इसी तरह ईमानी और ऐतेक़ादी उलूम भी पाक हक़ीक़त और मुकम्मल वाक़ेईयत होते हैं और अख़लाक़ी उसूल और अमली क़वानीन जो ऊपर बयान किये गये हैं, उन ही मुस्तक़ित हक़ायक़ के नतीजे की पैदावार हैं और ऐसी चीज़ ज़माने गुज़रने के साथ साथ ना तो मिट सकती है और न ही मंसूख़ की जा सकती है।

अल्लाह तआला फ़रमाता हैं:

हमने क़ुरआने मजीद को हक़ (ठीक) नाज़िल किया और यह भी बिल्कुल हक़ (ठीक) नाज़िल हुआ है (अपने हुदूस व बक़ा में हक़ से अलग नही हुआ है।)

(सूरह बनी इसराईल आयत 105)

और फिर फ़रमाता है:

आया हक़ के अलावा (बग़ैर गुमराही और ज़लालत के सिवा कोई और चीज़ मौजूद है?( यानी हक़ को छोड़ने के बाद सिवाए गुमराही के और कुछ नही रहता।

(सूरह युनुस आयत 32)

एक और जगह अपने कलामे पाक में तफ़सील से फ़रमाता है:

हक़ीक़त में क़ुरआन बहुत ही अज़ीज़ किताब है जो तमाम अतराफ़ से महफ़ूज़ रखने वाली किताब है यानी हर ज़ुल्म और हमले को अपनी ताक़त से देफ़ा करती है बातिल न ही सामने और न ही पीछे से इस पर हमला कर सकता है यानी न इस वक़्त और न ही आईन्दा मंसूख़ होने वाली किताब नही है।

(सूरह सजदा आयत 42)

अलबत्ता अहकामे क़ुरआनी की हिदायत के बारे में बहुत सी बहसे की जा चुकी हैं और हो सकती हैं लेकिन इस मौज़ू से ख़ारिज हैं क्योकि यहाँ हमारा मक़सद सिर्फ़ मुसलमानों के सामने क़ुरआने मजीद की अहमियत और वक़अत को पहचनवाना है जैसा कि ख़ुद क़ुरआन (अपने बारे में) बयान फ़रमाता है।

4. क़ुरआने मजीद ख़ुद ही अपना सुबूत है।

क़ुरआने मजीद जो कि पुख़्ता कलाम है तमाम मामूली बातों का तरह अपने मअना से मुराद दरयाफ़्त करता है और हरगिज़ अपने बयान और सुबूत में मुबहम नही है ज़ाहिरी दलील की रू से भी क़ुरआने मजीद के तहतुल लफ़्ज़ी मअना उसके अरबी अल्फ़ाज़ से मुताबेक़त रखते हैं और क़ाबिले फ़हमाईश हैं लेकिन यह दावा कि ख़ुद क़ुरआन अपने सुबूत और बयान में मुबहम नही है इसका सुबूत यह है कि जो शख़्स भी लुग़ात से वाक़ेफ़ीयत रखता हो वह आयते करीमा के मअना और फ़िक़रात को आसानी से समझ सकता है। इसी तरह जैसा कि अरबी ज़बान और कलाम के मअना समझ लेता है इस के अलावा क़ुरआन में बहुत सी आयात देखने में आती हैं कि उन में एक ख़ास गिरोह और जमाअत मसलन बनी ईसराईल मोमिनीन, कुफ़्फ़ार और कभी आम इंसानों के ख़िताब करते हुए अपने बयानात और मक़ासिद को उनके सांमने रखता है (उन से मुख़ातिब होता है।[3]) या उन से अहतिजाज करता है और फ़ैसला कुन अँदाज़ में उन से कहता है कि अगर उन्हे किसी क़िस्म का शक व शुबहा की क़ुरआने मजीद ख़ुदा का कलाम नही है तो उस की मानिन्द (आयात) बना कर या लिख कर लायें। ज़ाहिर है कि वह अल्फ़ाज़ या कलाम जो आम इंसानों के लिये क़ाबिले फ़हम न होगा वह बे मअना है। इसी तरह इंसान ऐसी चीज़ या कलाम लाएँ जिसके मअना क़ाबिले फ़हमाईश न हो तो वह हरगिज़ क़ाबिले क़बूल नही हो सकता। इस के अलावा ख़ुदा वंदे तआला फ़रमाता हैं:

आया क़ुरआन में गौर नही करते और उसकी आयतों पर ग़ौर व ख़ौज़ नही करते या उनके दिलों पर ताले पड़े हुए हैं।

(सूरह मुहम्मद आयत 24)

और फिर फ़रमाया है:

भला यह क़ुरआन में ग़ौर क्यों नही करते। अगर यह ख़ुदा के सिवा और का (कलाम) होता तो इसमें (बहुत सा) इख़्तिलाफ़ पाते।

इन आयात की रू से तदब्बुर को जो कि फ़हम की ख़ासियत रखता है, कबूल करता है और इसी तरह यही तदब्बुर आयात में इख़्तिलाफ़ात जो इब्तेदाई और सतही तौर पर सामने आते हैं वज़ाहत से हल कर देता है और ज़ाहिर है कि उन आयात के मअना वाज़ेह न होते तो उनमें तदब्बुर और ग़ौर और इसी तरह ज़ाहिरी इख़्तिलाफ़ात ग़ौर व फिक्र के ज़रिये हल करने का सवाल ही पैदा न होता।

लेकिन क़ुरआन की ज़ाहिरी हुज्जत की नफ़ी के बारे में दलील बे मअना है क्योकि इस क़िस्म का कोई सुबूत फ़राहम नही होता। सिर्फ़ यह कि बाज़ लोगों ने कहा है कि क़ुरआने मजीद के मअना समझने के लिये फ़कत पैग़म्बरे अकरम (स) की अहादीस और बयानात या अहले बैत (अ) के बयानात की तरफ़ रुजू करना चाहे।

लेकिन यह बात भी क़ाबिल क़बूल नही क्योकि पैग़म्बर अकरम (स) और आईम्म ए अहले बैत (अ) के बयानात का सबूत तो क़ुरआन से हासिल करना चाहिये। बेना बर ईन कैसे ख़्याल किया जा सकता है कि क़ुरआने मजीद के सुबूत में उन अफ़राद के बयानात काफ़ी हों बल्कि रिसालत और इमामत को साबित करने के लिये क़ुरआने मजीद की तरफ़ रुजू करना चाहिये जो नबूवत की सनद है।

अलबत्ता जो कुछ और बयान किया गया है उसका मतलब यह नही पैग़म्बरे अकरम (स) और आईम्म ए अहले बैत (अ) अहकामे शरीयत की तफ़सीलात और इस्लामी क़वानीन की जुज़ईयात बयान करने के ओहदा दार नही जो ज़ाहिरी तौर पर क़ुरआने मजीद से साबित नही होते। (जिन उमूर की वज़ाहत की ज़रुरत है।)

और इसी तरह यही अफ़राद क़ुरआन की तालीम देने वाले मुअल्लिम हैं जैसा कि मुनदरजा ज़ैल आयात से साबित होता है:

और हम ने तुझ पर ज़िक्र (क़ुरआन) नाज़िल किया है ता कि यह चीज़ जो तुझ पर नाज़िल की है (अहकाम) उसको लोगों के सामने बयान और वज़ाहत करो।

(सूरह नहल आयत 44)

जो चीज़ पैग़म्बरे अकरम (स) तुम्हारे लिये लाये हैं यानी जिस चीज़ का उन्होने हुक्म दिया है उसको मानो और कबूल करो और जिस चीज़ से उन्होने मना किया है उस से बाज़ रहो।

(सूरह हश्र आयत 7)

हम ने किसी भी पैग़म्बर को नही भेजा मगर इस लिये कि ख़ुदा के हुक्म की इताअत करें।

(सूरह निसा आयत 64)

ख़ुदा वह है जिस ने अनपढ़ (उम्मी) जमाअत में से एक पैग़म्बर को पैदा किया जो ख़ुदा की आयतों को उन के लिये तिलावत करता है और उन को पाक करता है और उनको किताब (क़ुरआन) और हिकमत (इल्म व दानिश) की तालीम देता है।

(सूरह जुमा आयत 2)

इन आयात के ब मुजिब पैग़म्बरे अकरम (स) शरीयत की तफ़सीलात और जुज़ईयात की वज़ाहत करते हैं और क़ुरआने मजीद के ख़ुदाई मुअल्लिम हैं और हदीसे मुतावातिरे सक़लैन के मुताबिक़ प़ैग़म्बरे अकरम (स) और आईम्म ए अहले बैत (अ) को ख़ुदा वंदे आलम ने मुख़्तलिफ़ ओहदों पर अपना नायब और जानशीन बनाया है। इस का मतलब यह भी नही कि दूसरे अफ़राद जिन्होने हक़ीक़ी मुअल्लिमों और उस्तादों से क़ुरआने मजीद के मआनी को सिखा है। क़ुरआने मजीद की आयतों के ज़ाहिरी मआनी को नही समझ सकते।

5. क़ुरआन ज़ाहिरी और बातिनी पहलू रखता है।

अल्लाह तआला अपने कलाम में फ़रमाता है:

सिर्फ़ ख़ुदा की इबादत व परस्तिश करो और उसके अलावा किसी चीज़ को इबादत में उसका शरीक न क़रार दो।

(सूरह निसा आयत 36)

ज़ाहिरी तौर पर इस आयत का मतलब मामूली बुतों की परस्तिश से मना करना है। चुनाचे फ़रमाता है:

नापाकियों से परहेज़ करो, जो बुत हैं। (बुत पलीद हैं और उनकी इबादत से परहेज़ करो।)

(सूरह हज आयत 30)

लेकिन ब ग़ौर मुतालआ और तजज़ीया व तहलील करने से मालूम होता है कि बुतों की पूजा इस लिये मना है कि उस का इंतेहाई मक़सद मा सिवलल्लाह के सामने अपनी सर झुकाना और ख़ुज़ू व ख़ुशू करना है और माबूद का बुत होना कोई ख़ुसुसियत नही रखता। जैसा कि अल्लाह तआला शैतान को उसकी इबादत कहते हुए फ़रमाता है:

आया मैने तुम्हे हुक्म नही दिया कि शैतान की परस्तिश न करो ऐ बनी आदम।

(सूरह यासीन आयत 60)

एक और तजज़ीया से मालूम होता है कि इताअत और फ़रमा बरदारी में ख़ुद इंसान और दूसरों (ग़ैरों) के दरमियान कोई फ़र्क़ नही है। जैसा कि मा सिवलल्लाह की इबादत और इताअत नही करनी चाहिये। ऐसे ही ख़ुदा ए तआला के मुक़ाबले में ख़्वाहिशाते नफ़्सानी की पैरवी भी नही करनी चाहिये जैसा कि खुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

आया तुम ने ऐसे शख़्स को देखा है कि (उसने) अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात को अपना ख़ुदा बनाया हुआ है।

(सूरह जासिया आयत 23)

एक और ब ग़ौर तजज़ीए और मुतालए से मालूम होता है कि अल्लाह तआला के बग़ैर हरगिज़ किसी और चीज़ की तरफ़ तवज्जो ही नही करनी चाहिये ताकि ऐसा न हो कि ख़ुदा ए तआला से इंसान ग़ाफ़िल हो जाये क्योकि मा सिवलल्लाह की तरफ़ तवज्जो का मतलब उस चीज़ को मुस्तक़िल (ख़ुदा से अलग) जानना है और उसके सामने एक क़िस्म की नर्मी और ख़ुज़ू व ख़ुशू ज़ाहिर करना है और यही अम्र इबादत और परस्तिश की रुह या बुनियाद है। अल्लाह तबारक व तआला फ़रमाता है:

क़सम खाता हूँ हमने बहुत ज़्यादा जिनों और इंसानो को जहन्नम के लिये पैदा किया है। यहाँ तक फ़रमाता है। वह हमेशा ख़ुदा से ग़ाफ़िल है।

जैसा कि इस आयते करीमा से ज़ाहिर होता है व ला तुशरेकू बिहि शैय्या। सबसे पहले तो यह बात ज़हन में आती है कि बुतों की पूजा नही करना चाहिये लेकिन अगर ग़ौर करें तो मालूम होगा कि इसका मतलब यह है कि इंसान ख़ुदा के फ़रमान के बग़ैर किसी और की परस्तिश और इबादत न करे और फिर अगर ज़्यादा ग़ौर व ख़ौज़ करें तो इस का मतलब यह होगा कि इंसान हत्ता कि अपनी मर्ज़ी से भी किसी की इताअत और पैरवी न करे। इससे और आगे बढ़े तो यह हासिल होगा कि ख़ुदा वंदे तआला से ग़फ़लत और मा सिवलल्लाह की तरफ़ तवज्जो हरगिज़ नही करनी चाहिये।

इसी तरह अव्वल तो एक आयत के सादा और इब्तेदाई मअना ज़ाहिर होते हैं फिर (उन पर ग़ौर करने से) वसी मअना नज़र आते हैं और उन वसी मअनो के अंदर दूसरे वसी मअना पोशीदा होते हैं जो पूरे क़ुरआन में जारी है और उन्ही मअनों में गौर व फिक्र के बाद पैग़म्बरे अकरम (स) की मशहूर व मारुफ़ हदीस, जो बहुत ज़्यादा अहादीस व तफ़सीर की किताबों में नक़्ल हुई है, के मअना वाज़ेह हो जाते हैं। यानी बेशक क़ुरआन के लिये ज़ाहिर भी हैं और बातिन भी और उसके बातिन के भी बातिन हैं जिन की तादाद सात तक हैं।

(तफ़सीरे साफ़ी मुक़द्दमा 8 और सफ़ीनतुल बिहार माद्दा ए ब त न)

लिहाज़ा जो कुछ ऊपर बयान किया गया है उससे मालूम होता है कि क़ुरआने मजीद का एक ज़ाहिरी पहलू है और एक बातिनी पहलू। यह दोनो पहलू कलाम (क़ुरआने मजीद) के मुताबिक़ और उससे मिलते हैं, सिवा ए इसके कि यह दोनो मअना तूल के लिहाज़ से हम मअना और हम मुराद हैं न ग़रज़ के लिहाज़, न तो लफ़्ज़ का ज़ाहिरी इरादा (पहलू) बातिन की नफ़ी करता है और न ही बातिन इरादा (पहलू) ज़ाहिरी पहलू का मानेअ होता है।

1. इस आयत का शाने नुज़ूल यह है कि सबीलिल्लाह क़ुरआन की मारेफ़त में दीन है और यह आयते शरीफ़ा वाज़ेह करती है कि सितमगर और ज़ालिम लोग बल्कि जो ख़ुदा पर ईमान नही रखते वह दीने ख़ुदा (फ़ितरी दीन) तो तोड़ मोड़ कर नाफ़िज़ करते हैं। इस लिये ज़िन्दगी के प्रोग्राम और तरीक़े को जो वह लोग नाफ़िज़ करते हैं वही उनका दीन शुमार होता है।

[2] . देखिये अबक़ात जिल्दे हदीसे सक़लैन, इस किताब में मज़कूरा हदीस को सैकड़ों बार ख़ास व आम तरीक़ों से नक़्ल किया गया है।

[3] . मिसाल के तौर पर बहुत सी आयते पेश की जा सकती
जारी...


अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें (पार्ट-11)

यहां एक प्रश्न और उठता है कि कब कोई आत्मा या रूह मनुष्य के रूप में जन्म लेती है और कब किसी अन्य प्राणी के रूप में? तो इसका जवाब ये है कि यह उस आत्मा की क्षमता पर निर्भर करता है कि वह मनुष्य रूप में जन्म लेने के काबिल है या मछली या अन्य किसी कमतर प्राणी के रूप में। लेकिन क्षमता की जाँच तो जन्म के बाद होती है फिर जन्म से पहले कैसे इसका निर्धारण कर लिया गया? यहां एक बार फिर हमें अल्लाह के बारे में अन्य प्राणियों से अलग करके सोचना पड़ेगा। हर प्रकार का ज्ञान अल्लाह से जुड़ा हुआ है। उसका ज्ञान समय पर निर्भर नहीं है। क्योंकि समय को भी उसी ने बनाया है। जो घटनाएं हो चुकी हैं, उसका भी ज्ञान उसे है और जो घटनाएं घट रही हैं या घटने वाली हैं वह भी उसके ज्ञान में हैं। हों सकता है यह कथन कुछ लोगों को विरोधाभासी प्रतीत हो कि घटना घटने से पहले ही उसके बारे में जानकारी हो जाये। लेकिन इसे बहुत आसानी से समझा जा सकता है।


उदाहरण के लिए मान लिया कि कोई पुच्छल तारा हमारे सौरमंडल से कुछ दूरी पर गतिमान होकर तेजी से हमारी पृथ्वी पर आ रहा है। पृथ्वी के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित उपकरण उसे देखेंगे, उसका अध्ययन करेंगे और आंकड़ों के विश्लेषण के बाद उसे बता देंगे कि यह पुच्छल तारा ठीक छह महीने बाद ज्यूपिटर ग्रह से टकरा जायेगा। यह किस प्रकार हुआ? कैसे हमने भविष्य में घटी घटना का पूर्व ज्ञान प्राप्त कर लिया, स्पष्ट है कि अपने ज्ञान के आधार पर और उन उपकरणों के आधार पर जो हमने अपने ज्ञान का प्रयोग करके बनाये।


मनुष्य के पास बहुत ही सीमित ज्ञान है। यह सीमा इसी से अनुमानित है कि हर वर्ष हजारों की संख्या में रिसर्च पेपर विभिन्न देशों में प्रकाशित होते हैं और मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि करते हैं। इस प्रकार ज्ञान की कोई सीमा नहीं। उस असीमित ज्ञान भंडार के समुन्द्र से कुछ बूंदें लेकर मनुष्य ने ऐसे उपकरण बना लिये जो छह महीने बाद या एक वर्ष बाद घटने वाली घटना को पहले से बता देते हैं। तो अब उस महाशक्ति जिसके पास असीमित ज्ञान है, के लिये ये सोचना कि जब घटना हो जाये तब उसे ज्ञान हो, बिल्कुल अक्ल से परे है।


मनुष्य तो कई बार उस घटना से भी अंजान रहता है जो बहुत पहले घट चुकी होती है। और इसमें समय और दूरी बहुत बड़ा रोल अदा करते हैं। मान लिया कि इस यूनिवर्स में पृथ्वी से दस हजार प्रकाश वर्ष दूर किसी तारे में विस्फोट होता है। उस विस्फोट की रौशनी जब तक पृथ्वी पर पहुंचेगी, पृथ्वी पर मानव की कई पीढ़ियां गुजर चुकी होंगी।


जबकि खुदा टाइम और दूरी के बंधनों से आजाद है। किसी घटना की खबर उस तक पहुंचने के लिए कोई रुकावट नहीं। भले ही वह घटना ‘फ्यूचर टाइम’ में हो। यहां मैंने पास्ट टाइम का इस्तेमाल नहीं किया। क्योंकि खुदा हमेशा से है इसलिए उससे पहले घटना होने का सवाल ही नहीं उठता।


तो इस तरह अल्लाह और उसके बन्दों से सम्बंधित विरोधाभासों को दूर किया जा सकता है। उपरोक्त जिक्र को यहीं समाप्त करते हुए अगले कन्टराडिक्शन पर आते हैं। जो नास्तिकों की अन्य मजबूत दलील हैं। इसमें अल्लाह को गुणों से भरपूर बताया गया है। तो फिर अवगुण कहां गये सारे? क्या उन्होंने दूसरे खुदा की शरण ले ली? यानि बुराईयों का खुदा?


उपरोक्त एतराज में भी मनुष्य की सीमित सोच का पता चलता है। क्योंकि हम आदी हो गये हैं अपनी बनायी कसौटी पर हर चीज को परखकर देखने के। हमने अपने आसपास देखा और पाया कि हर चीज का एक निगेटिव है। आग है तो साथ में पानी भी है। प्रेम के दर्शन होते हैं तो कहीं घृणा के। इलेक्ट्रिक करेंट के चालक मौजूद हैं तो सुचालक भी। अगर और गहराई में जायें तो इलेक्ट्रान का एण्टी कण पाजिट्रान मौजूद है। प्रोटान का एण्टी कण एण्टी प्रोटान भी पाया जाता है। ये दोनों जब एक दूसरे से टकराते हें तो नष्ट हो जाते हैं। यह कल्पना भी की गयी है कि जिस प्रकार पदार्थ इस यूनिवर्स में अस्तित्व रखता है उसी तरह उसका एण्टी मैटर (विपरीत पदार्थ) भी इसी यूनिवर्स में मौजूद है।


पदार्थ और विपरीत पदार्थ जब एक दूसरे से टकराते हैं तो नष्ट हो जाते हैं। और अपार ऊर्जा की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार देखा जाये तो हर वस्तु और हर गुण अपना एक एण्टी जरूर रखता है। क्रोध का ख़ुशी है तो उत्साह का हताशा । स्पष्ट है कि फिर खुदा का भी एक एण्टी खुदा होना चाहिए। इस प्रकार अगर खुदा न्यायप्रिय है तो वह अन्याय प्रिय। अगर खुदा ज्ञानी है तो वह अज्ञानी होना चाहिए। अगर खुदा रहम करने वाला है तो वह अत्याचार करने वाला होना चाहिए।


लेकिन इस अवलोकन में हम ये भूल जाते हैं कि खुदा एक है और सृष्टि की रचना शून्य से हुई है। दूसरी बात ये कथन कि ‘अल्लाह गुणों का मजमुआ है’ गलत है। वास्तव में अल्लाह से पूरी तरह मिले हुए हैं गुण। जिस तरह चमकना तारों का गुण है लेकिन चमक को तारा नहीं कहा जा सकता। इसलिए गुणों के विपरीत अवगुण तो हो सकते हैं लेकिन खुदा के विपरीत एण्टी खुदा नहीं हो सकता।


सवाल उठता है कि फिर सृष्टि में क्यों हर वस्तु का एण्टी पाया जाता है? तो इसके लिए जैसा कि ऊपर कहा गया है कि सृष्टि की रचना शून्य से हुई है। अगर शून्य को विभाजित करें तो निगेटिव और पाजिटिव मिलते हैं। इसी तरह बराबर संख्या में निगेटिव और पाजिटिव मिलने से शून्य मिलता है। जैसे माइनस फोर और प्लस फोर का योग जीरो होता है। एक इलेक्ट्रान और पाजिट्रान के टकराने पर जीरो मैटर बन जाता है। इसी तरह जीरो मैटर यानि दो गामा फोटॉनों के मिलने पर इलेक्ट्रान और पाजिट्रान की पैदाइश होती  हैं।


ठीक इसी नियम पर सृष्टि का निर्माण हुआ। निर्माण का यह सिद्धान्त कुछ कुछ बिग बैंग से मिलता है। प्रारम्भ में केवल एक बिन्दु था विमाहीन। न तो द्रव्यमान था, न ऊर्जा और न समय। फिर एक विस्फोट हुआ यानि बिग बैंग। इस विस्फोट से पदार्थ ऊर्जा और समय की रचना हुई। यानि ये सब कुछ शून्य से उत्पन्न हुआ। स्पष्ट है कि इनमें से हर चीज अपना निगेटिव रखेगी तभी शून्य का उपरोक्त नियम लागू हो सकता है।


अल्लाह के लिए इस तरह का कोई नियम लागू नहीं होगा। क्योंकि वह शून्य से पैदा नहीं हुआ है। वह सदैव से एक रहा है और सदैव रहेगा। यहां इस बात की भी दलील मिल गयी कि वह सदैव से एक रहा है और सदैव रहेगा। क्योंकि वक्त के साथ वही बदलता है जो वक्त पर निर्भर होता है। वक्त बीतने के साथ प्राणी के साँसों की डोर नाजुक होती जाती है और एक वक्त आता है जब यह डोर टूट जाती है। चट्‌टानें वक्त के साथ टूटती रहती हैं और फिर पूरी तरह बिखर जाती हैं। लेकिन हम अगर उस महाशक्ति के बारे में विचार करें जिसने स्वयं वक्त की रचना की है, स्पष्ट है कि उसका अस्तित्व टाइम का मोहताज नहीं रह गया। और जब वह टाइम का मोहताज नहीं रह गया तो न तो उसके जन्म का कोई टाइम होगा और न उसके समाप्त होने का कोई टाइम। वह हमेशा से है और हमेशा मौजूद रहेगा।



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मुसलमानो के दरमियान क़ुरआन की क्या अहमियत है?


क़ुरआने मजीद ज़िन्दगी के मजमूई प्रोग्राम की ज़मानत देता है।


आ. क़ुरआने मजीद नबुव्वत की सनद है।
अ. क़ुरआने मजीद इंसानी ज़िन्दगी के मजमूई प्रोग्राम की ज़मानत देता है।


चुँकि दीने इस्लाम जो हर दूसरे दीन व मज़हब से बढ़ कर इंसानी ज़िन्दगी की सआदत और ख़ुशहाली की ज़मानत देता है, क़ुरआने मजीद के ज़रिये ही मुसलमानों तक पहुचा है। इसी तरह इस्लाम के दीनी उसूल जो ईमानी, ऐतेक़ादी, अख़लाक़ी और अमली क़वानीन की कड़ियाँ है, उन सब की बुनियाद क़ुरआने मजीद है। अल्लाह तआला फ़रमाता है: इसमें शक नही कि यह किताब क़ुरआने मजीद उस राह की हिदायत करता है जो सबसे ज़्यादा सीधी है। (सूरह बनी इसराईल आयत 9) और फिर फ़रमाता है: और हमने तुम पर किताब (क़ुरआने मजीद) नाज़िल की हर चीज़ को वाजे़ह तौर पर बयान करती है और उस पर रौशनी डालती है। (सूरह नहल आयत 89)


पस वाज़ेह है कि क़ुरआने मजीद में दीनी अक़ाइद के उसूल, अख़लाक़ी फ़ज़ाइल और अमली क़वानीन का मजमूआ बहुत ज़्यादा आयात में बयान किया गया है कि उन आयतों को यहाँ दर्ज करने की ज़रुरत नही है।


दूसरा मुफ़स्सल बयान


मुनदरजा बाला चंद तफ़सीलात में ग़ौर करने के बाद इंसानी ज़िन्दगी के प्रोग्रामों पर मबनी जो क़ुरआने मजीद में लिखे हुए है, उनके हक़ीक़ी मअना को अच्छी तरह समझा जा सकता है।


1. इंसान अपनी ज़िन्दगी में कामयाबी, ख़ुशहाली और सआदत के अलावा और कोई मक़सद नही रखता। (ख़ुशहाली और सआदत ज़िन्दगी की एक ऐसी सूरत है कि इंसान हमेशा उस की ख़्वाहिश और आरज़ू रखता है जैसे आज़ादी, फ़लाह व बहबूद और ज़रिया ए मआश में ज़ियादती वग़ैरह)


और कभी कभी ऐसे अशख़ास नज़र आते हैं जो अपनी सआदत और ख़ुशहाली को नज़र अंदाज़ कर देते हैं जैसे बाज़ औक़ात एक शख़्स ख़ुदकुशी करके अपनी ज़िन्दगी को ख़त्म कर लेता है या ज़िन्दगी की दूसरी लज़्ज़तों को चश्मपोशी कर लेता है, अगर ऐसे लोगों की रूही हालत पर ग़ौर करें तो देखेगें कि यह लोग अपनी फिक्र और नज़रिये के मुताबिक़ ख़ास वुजूहात में ज़िन्दगी की सआदत को परखते और जाँचते हैं और उनही वुजूहात और अनासिर में सआदत समझते हैं। जैसे जो शख़्स ख़ुदकुशी करता है वह ज़िन्दगी की सख़्तियों और मुसीबतों की वजह से अपने आप को मौत के मुँह में तसव्वुर करते हैं और जो कोई ज़ोहद व रियाज़त में मशग़ूल हो कर ज़िन्दगी की लज़्ज़तों को अपने लिये हराम कर लेता है वह अपने नज़िरये और तरीक़े में ही ज़िन्दगी की सआदत को महसूस करता है।


पस हर इंसान अपनी ज़िन्दगी में सआदत और कामयाबी को हासिल करने के लिये जिद्दो जहद करता है ख़्वाह वह अपनी हक़ीक़ी सआदत की तशख़ीस में ठीक हो या ग़लत।


2. इंसानी ज़िन्दगी की जिद्दो जहद हरगिज़ प्रोग्राम के बग़ैर अमल में नही आती, यह बिल्कुल वाज़ेह और साफ़ मसला है और अगर किसी वक़्त यह मसला इंसान की नज़रों से छिपा रहता है तो वह बार बार की तकरार की वजह से है, क्योकि एक तरफ़ तो इंसान अपनी ख़्वाहिश और अपने इरादे के मुताबिक़ काम करता है और जब तक मौजूदा वुजूहात के मुताबिक़ किसी काम को ज़रुरी नही समझते उसको अंजाम नही देता यानी किसी काम को अपने अक़्ल व शुऊर के हुक्म से ही करता है और जब तक उसकी अक़्ल और उसका ज़मीर इस काम की इजाज़त नही देते, उस काम को शुरु नही करता, लेकिन दूसरी तरफ़ जिन कामों को अपने लिये अंजाम देता है उनसे मक़सद अपनी ज़रुरियात को पूरा करना होता है लिहाज़ा उसके किरदार व अफ़आल में ब राहे रास्त एक ताअल्लुक़ होता है।


खाना, पीना, सोना, जागना, उठना, बैठना, जाना, आना वग़ैरह सब काम एक ख़ास अंदाज़े और मौक़ा महल के मुताबिक़ अंजाम पाते हैं। कहीं यह काम ज़रुरी होते हैं और कहीं ग़ैर ज़रुरी। एक वक़्त में मुफ़ीद और दूसरे वक़्त में ज़रर रसाँ या ग़ैर मुफ़ीद। लिहाज़ा हर काम उस अक़्ल व फिक्र और इंसानी शुऊर के ज़रिये अंजाम पाते हैं जो आदमी में मौजूद है। इसी तरह हर छोटा और बड़ा काम उसी कुल्ली प्रोग्राम के मुताबिक़ करता है।


हर इंसान अपने इनफ़ेरादी कामों में एक मुल्क की मानिन्द है जिसके बाशिन्दे मख़्सूस क़वानीन, रस्मो रिवाज में ज़िन्दगी गुज़ारते हैं और उस मुल्क की मुख़्तार और हाकिम ताक़तों का फ़र्ज़ है कि सबसे पहले अपने किरदार को उस मुल्क के बाशिन्दों के मुताबिक़ बनायें और फिर उनको नाफ़िज़ करें।


एक मुआशरे की समाजी सर गरमियाँ भी इनफ़ेरादी सर गरमियों की तरह होती हैं लिहाज़ा हमेशा की तरह एक तरह के क़वानीन, आदाब व रुसूम और उसूल जो अकसरियत के लिये क़ाबिले क़बूल हों, उस समाज में हाकिम होने चाहिये। वर्ना समाज के अजज़ा अफ़रा तफ़री और हरज व मरज के ज़रिये बहुत थोड़ी मुद्दत में दरहम बरहम हो जायेगें।


बहरहाल अगर समाज मज़हबी हो तो हुकूमत भी अहकामे मज़हब के मुताबिक़ होगी और अगर समाज ग़ैर मज़हबी और मुतमद्दिन होगा तो उस समाज की सारी सर गरमियाँ क़ानून के तहत होगीं। अगर समाज ग़ैर मज़हबी और ग़ैर मुतमद्दिन होगा तो उसके लिये मुतलक़ुल एनान और आमेराना हुकूमत ने जो क़ानून बना कर उस पर ठूँसा होगा या समाज में पैदा होने वाली रस्म व रिवाज और क़िस्म क़िस्म के अक़ाइद के मुताबिक़ ज़िन्दगी बसर करेगा।


पस हर हाल में इंसान अपनी इनफ़ेरादी और समाजी सर गरमियों में एक ख़ास मक़सद रखने के लिये नागुज़ीर है लिहाज़ा अपने मक़सद को पाने के लिये मुनासिब तरीक़ा ए कार इख़्तियार करने और प्रोग्राम के मुताबिक़ काम करने से हरगिज़ बेनियाज़ नही हो सकता।


क़ुरआने मजीद भी इस नज़रिये की ताईद व तसदीक़ फ़रमाता है: तुम में से हर शख़्स के लिये एक ख़ास मक़सद है जिसके पेशे नज़र काम करते हो पस हमेशा अच्छे कामों में एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर कोशिश करो ता कि अपने आला मक़सद को हासिल कर सको। (सूरह बक़रा आयत 148)


बुनियादी तौर पर क़ुरआने मजीद में दीन का मतलब तरीक़ा ए ज़िन्दगी है और मोमिन व काफ़िर हत्ता कि वह लोग जो ख़ालिक़ (ख़ुदावंद) के मुकम्मल तौर पर मुन्किर हैं वह भी दीन के बग़ैर नही रह सकते हैं क्योकि इंसानी ज़िन्दगी एक ख़ास तरीक़े के बग़ैर नही रह सकती ख़्वाह वह तरीक़ा नबुव्वत और वही की तरफ़ से हो या बनावटी और मसनुई क़ानून के मुताबिक़, अल्लाह तआला उन सितमगारों के बारे में जो ख़ुदाई दीन से दुश्मनी रखते हैं और किसी भी तबक़े से ताअल्लुक़ रखते हों फ़रमाता हैं:


जो ख़ुदा की राह से लोगों को हटाते और रोकते हैं और उसमें जो फ़ितरी ज़िन्दगी की राह है (ख़्वाह मख़ाह) उसको तोड़ मोड़ कर अपने लिये अपनाते हैं। (सूरह आराफ़ आयत 45)[1]


3. ज़िन्दगी का बेहतरीन और हमेशगी तरीक़ वह है जिसकी तरफ़ इंसानी फ़ितरत रहनुमाई करे, न वह कि जो एक फ़र्द या समाज के अहसासात से पैदा हुआ हो। अगर फ़ितरत के हर एक ज़ुज़ का गहरा और बग़ौर मुतालआ करें तो मालूम होगा कि हर ज़ुज़ ज़िन्दगी का एक मक़सद और ग़रज़ व ग़ायत लिये हुए है जो अपनी पैदाईश से लेकर उस ख़ास मक़सद की तरफ़ मुतवज्जे है और अपने मक़सद को पाने के लिये नज़दीक तरीन और मुनासिब तरीन राह की तलाश में है, यह ज़ुज़ अपने अंदरुनी और बेरुनी ढाँचें में एक ख़ास साज़ व सामान से आरास्ता है जो उसके हक़ीक़ी मक़सूद और गुनागूँ सर गरमियों का सर चश्मा शुमार होता है। हर जानदार और बेजान चीज़ फ़ितरत की यही रवय्या और तरीक़ा कार फ़रमा है।


जैसे गेंहू का पौधा अपनी पैदाईश के पहले दिन से ही जब वह मिट्टी से अपनी सर सब्ज़ और हरी भरी पत्ती के साथ दाने से बाहर निकलता है तो वह (शुरु से ही) अपनी फ़ितरत की तरफ़ मुतवज्जे होता है यानी यह कि वह एक ऐसे पौधा है जिसके कई ख़ोशे हैं और अपनी फ़ितरी ताक़त के साथ उनसुरी अजज़ा को ज़मीन और हवा से ख़ास निस्बत से हासिल करता है और अपने वुजूद की हिस्सा बनाते हुए दिन ब दिन बढ़ता और फैलता रहता है और हर रोज़ अपनी हालत को बदलता रहता है। यहाँ तक कि एक कामिल पौधा बन जाता है जिसकी बहुत सी शाख़ें और ख़ोशे होते हैं फिर उस हालत को पहुच कर अपनी रफ़तार और तरक़्क़ी को रोक लेता है।


एक अख़रोट के पेड़ का भी ब ग़ौर मुतालआ करें तो मालूम होगा कि वह भी अपनी पैदाईश के दिन से लेकर एक ख़ास मक़सद और हदफ़ की तरफ़ मुतवज्जे है यानी यह कि वह एक अखरोट का पेड़ है जो तनू मंद और बड़ा है लिहाज़ा अपने मक़सद तक पहुचने के लिये अपने ख़ास और मुनासिब तरीक़े से ज़िन्दगी की राह को तय करता है और उसी तरह अपनी ज़रुरियाते ज़िन्दगी को पूरा करता हुआ अपने इंतेहाई मक़सद की तरफ़ बढ़ता रहता है। यह पेड़ गेंहू के पौधे का रास्ता इख़्तियार नही करता जैसा कि गेंहू का पौधा भी अपने मक़सद को हासिल करने में अख़रोट के पेड़ का रास्ता इख़्तियार नही करता।


तमाम कायनात और मख़लूक़ात जो इस ज़ाहिरी दुनिया को बनाती है। उसी क़ानून के तहत अमल करती हैं और कोई वजह नही है कि इँसान इस क़ानून और क़ायदे से मुसतसना हो। (इंसान अपनी ज़िन्दगी में जो मक़सद और ग़रज़ व ग़ायत रखता हो उसकी सआदत उसी मक़सद को पाने के लिये है और वह अपने मुनासिब साज़ व सामान के साथ अपने हदफ़ तक पहुचने की तगो दौ में मसरुफ़ है।) बल्कि इंसानी ज़िन्दगी के साज़ व सामान की बेहतरीन दलील यह है कि वह भी दूसरी सारी कायनात की तरह एक ख़ास मक़सद रखता है जो उसकी ख़ुश बख़्ती और सआजत की ज़ामिन है और अपने पूरे वसायल और कोशिश के साथ इस राहे सआदत तक पहुचने की जिद्दो जहद करता है।


लिहाज़ा जो कुछ ऊपर अर्ज़ किया गया है वह ख़ास इंसानी फ़ितरत और आफ़रिनिशे जहान के बारे में है कि इंसान भी सी कायनात का एक अटूट अंग है। यही चीज़ इँसान को उसकी हक़ीक़ी सआदत की तरफ़ रहनुमाई करती है। इसी तरह सबसे अहम पायदार और मज़बूत क़वानीन जिन पर चलना ही इंसानी सआदत की ज़मानत है, इँसान की रहनुमाई करते हैं।


गुज़श्ता बहस की तसदीक़ में अल्लाह तआला फ़रमाता है:


हमारा परवरदिगार वह है जिसने हर चीज़ और हर मख़्लूक़ को एक ख़ास सूरत (फ़ितरत) अता फ़रमाई, फिर हर चीज़ को सआदत और ख़ास मक़सद की तरफ़ रहनुमाई की। (सूरह ताहा आयत 50)


फिर फ़रमाता है: वह ख़ुदा जिसने मख़्लूक़ के अजज़ा के जमा करके (दुनिया को) बनाया और वह ख़ुदा जिसने हर चीज़ का ख़ास अंदाज़ मुक़र्रर किया, फिर उसको हिदायत फ़रमाई। (सूरह आला आयत 2,3)


फिर फ़रमाता है: क़सम अपने नफ़्स की और जिसने उसको पैदा किया और फिर उसने नफ़्स को बदकारी और परहेज़गारी का रास्ता बताया। जिस शख़्स ने अपने नफ़्स की अच्छी तरह परवरिश की, उसने निजात हासिल की और जिस शख़्स ने अपने नफ़्स को आलूदा किया वह तबाह व बर्बाद हो गया। (सूरह शम्स आयत 7,10)


फ़िर ख़ुदा ए तआला फ़रमाता है: अपने (रुख़) आपको दीन पर उसतुवार कर, पूरी तवज्जो और तहे दिल से दीन को क़बूल कर, लेकिन ऐतेदाल पसंदी को अपनी पेशा बना और इफ़रात व तफ़रीत से परहेज़ कर, यही ख़ुदा की फ़ितरत है और ख़ुदा की फ़ितरत में तब्दीली पैदा नही होती। यही वह दीन है जो इंसानी ज़िन्दगी का इंतेज़ाम करने की ताक़त रखता है। (मज़बूत और बिल्कुल सीधा दीन है।) (सूरह रुम आयत 30)


फिर फ़रमाता है: दीन और ज़िन्दगी का तरीक़ा ख़ुदा के सामने झुकने में ही है। उसके इरादे के सामने सरे तसलीम को ख़म करने है यानी उसकी कुदरत और फ़ितरत के सामने जो इंसान को एक ख़ास क़ानून की तरफ़ दावत देता है। (सूरह आले इमरान आयत 19)


और दूसरी जगह फ़रमाता है: जो कोई दीने इस्लाम के बग़ैर यानी ख़ुदा के इरादे के बग़ैर किसी और दीन की तरफ़ रुजू करे तो उसका वह दीन या तरीक़ा हरगिज़ क़ाबिले क़बूल नही होगा। (सूरह आले इमरान आयत 85)


मुनदरेजा बाला आयत और ऐसी ही दूसरी आयात जो इस मज़मून की मुनासेबत में नाज़िल हुई है उनका नतीजा यह है कि ख़ुदा ए तआला अपनी हर मख़लूक़ और मिन जुमला इंसान को एक ख़ास सआदत और फ़ितरी मक़सद की तरफ़ यानी अपनी फ़ितरत की तरफ़ रहनुमाई करता है और इंसानी ज़िन्दगी के लिये हक़ीक़ी और वाक़ई रास्ता वही है जिसकी तरफ़ उस (इंसान) की ख़ास फ़ितरत दावत करती है लिहाज़ा इंसान अपनी फ़रदी और समाजी ज़िन्दगी में क़वानीन पर कारबंद है क्यो कि एक हक़ीक़ी और फ़ितरी इंसान की तबीयत उसी की तरफ़ रहनुमाई करती है न कि ऐसे इंसानो को जो हवा व हवस और नफ़्से अम्मारा से आलूदा हों और अहसासात के सामने दस्त बस्ता असीर हों।


फ़ितरी दीन का तक़ाज़ा यह है कि इंसानी वुजूद का निज़ाम दरहम बरहम न होने पाए और हर एक (जुज़) को हक़ बखूबी अदा हो लिहाज़ा इंसानी वुज़ूद में जो मुख़्तलिफ़ और मुताज़ाद निज़ाम जैसे मुख़्तलिफ़ अहसासाती ताक़तें अल्लाह तआला ने बख़्शी हैं वह मुनज़्ज़म सूरत में मौजूद हैं, यह सब क़ुव्वतें एक हद तक दूसरे के लिये मुज़ाहिमत पैदा न करें, उनको अमल का इख़्तियार दिया गया है।


और आख़िर कार इंसान के अंदर अक़्ल की हुकूमत होनी चाहिये न कि ख़्वाहिशाते नफ़्सानी और अहसासात व जज़्बात का ग़लबा और समाज में इंसानों के हक़ व सलाग पर मबनी हुकूमत क़ायम हो न कि एक आमिर और ताक़तवर इंसान की ख़्वाहिशात और हवा व हवस के मुताबिक़ और नही अकसरियत अफ़राद की ख़्वाहिशात के मुताबिक़, अगरचे वह हुकूमत एक जमाअत या गिरोह की सलाह और हक़ीक़ी मसलहत के ख़िलाफ़ ही क्यो न हो।


मुनजरेजा बाला बहस से एक और नतीजा अख़्ज़ किया जा सकता है और वह यह है कि तशरीई (शरअन व क़ानूनन) लिहाज़ से हुकूमत सिर्फ़ अल्लाह की है और उसके बग़ैर हुकूमत किसी और की हक़ नही है।


सरवरी ज़ेबा फ़क़त उस ज़ाते बे हमता को है
हुक्म राँ है एक वही बाक़ी बुताने आज़री
(इक़बाल)


कि फ़रायज़, क़वानीन, शरई क़वानीन बनाए या तअय्युन करे, क्योकि जैसा कि पहले बयान किया जा चुका है सिर्फ़ नही क़वानीन और क़वाइद इंसानी ज़िन्दगी के लिये मुफ़ीद हैं जो उसके लिये फ़ितरी तौर पर मुअय्यन किये गये हों यानी अंदरुनी या बेरुनी अनासिर व अवामिल और इलल इंसान को उन फ़रायज़ की अंजाम दही की दावत करें और उसको मजबूर करें जैसे उनके अंजाम देने में ख़ुदा का हुक्म शामिल हो क्यो कि जब हम कहते हैं कि ख़ुदा वंदे आलम इस काम को चाहता है तो इसका मतलब यह है कि अल्लाह तआला ने इस काम को अंजाम देने का तमाम शरायत और वुजूहात को पहले से पैदा किया हुआ है लेकिन कभी कभी यह वुजूहात और शरायत ऐसी होती हैं कि किसी चीज़ की जबरी पैदाईश की मुजिब और सबब बन जाती है जैसे रोज़ाना क़ुदरती हवादिस का वुजूद में आना और इस सूरत में ख़ुदाई इरादे को तकवीनी इरादा कहते हैं और कभी यह वुजुहात व शरायत इस क़िस्म की हैं कि इंसान अपने अमल को इख़्तियार और आज़ादी के साथ अंजाम देता है जैसे खाना, पीना वग़ैरह और इस सूरत में उस अमल को तशरीई इरादा कहते हैं। अल्लाह तआला अपने कलाम में कई जगह पर इरशाद फ़रमाता है:


ख़ुदा के सिवा कोई और हाकिम नही है और हुकूमत सिर्फ़ अल्लाह के वास्ते हैं।


(सूरह युसुफ़ आयत 40, 67)


इस तमहीद के वाज़ेह हो जाने के बाद जान लेना चाहिये कि क़ुरआने मजीद इन तीन तमहीदों के पेशे नज़र कि इंसान अपनी ज़िन्दगी में एक ख़ास मक़सद और ग़रज़ व ग़ायत रखता है। (यानी ज़िन्दगी की सआदत) जिसको अपनी पूरी ज़िन्दगी में हासिल करने के लिये जिद्दो जेहद और कोशिश करता है और यह कोशिश बग़ैर किसी प्रोग्राम के नतीजे में नही होगी। लिहाज़ा उस प्रोग्राम को भी ख़ुदा की किताबे फ़ितरत और आफ़रिनिश में ही पढ़ना चाहिये। दूसरे लफ़्ज़ों में उसको ख़ुदाई तालीम के ज़रिये ही सीखा जा सकता है।


क़ुरआने मजीद ने उन तमहीदों के पेशे नज़र इंसानी ज़िन्दगी के प्रोग्राम की बुनियाद इस तरह रखी है:


क़ुरआने मजीद ने अपने प्रोग्राम की बुनियाद ख़ुदा शिनासी पर रखी है और इसी तरह मा सिवलल्लाह से बेगानगी को शिनाख़्ते दीन की अव्वलीन बुनियाद क़रार दिया है।


इस तरह ख़ुदा को पहचनवाने के बाद मआद शिनासी (रोज़े क़यामत पर ऐतेक़ाद जिस दिन इंसान के अच्छे बुरे कामों का बदला और एवज़ दिया जायेगा।) का नतीजा हासिल होता है और उसको एक दूसरा उसूल बनाया। उसके बाद मआद शिनासी से पैयम्बर शिनासी का नतीजा हासिल किया, क्योकि अच्छे और बुरे कामों का बदला, वही और नबूवत के ज़रिये इताअत, गुनाह, नेक व बद कामों के बारे में पहले से बयान शुदा इत्तेला के बग़ैर नही दिया जा सकता, जिसके बारे में आईन्दा सफ़हात में रौशनी डालेगें।


इस मसले को भी एक अलग उसूल के ज़रिये बयान फ़रमाया, मुनजरजा बाला तीन उसूलों यानी मा सिवलल्लाहा की नफ़ी पर ईमान, नबूवत पर ऐतेक़ाद और मआद पर ईमान को दीने इस्लाम के उसूल में कहा है।


उसेक बाद दूसरे दर्जे पर अख़लाक़े पसंदीदा और नेक सिफ़ात जो पहले तीन उसूलों के मुनासिब हों और एक हक़ीक़त पसंद और बा ईमान इंसान को उन सिफ़ाते हमीदा से मुत्तसिफ़ और आरास्ता होना चाहिये, बयान फ़रमाया। फिर अमली क़वानीन जो दर अस्ल हक़ीक़ी सआदत के ज़ामिन और अख़लाक़े पसंदीदा को जन्म दे कर परवरिश देते हैं बल्कि उस से बढ़ कर हक़ व हक़ीक़त पर मबनी ऐतेकादात और बुनियादी उसूलों को तरक़्क़ी व नश व नुमा देते हैं, उनकी बुनियाद डाली और उसके बारे में वज़ाहत फ़रमाई।


क्योकि शख़्स जिन्सी मसायल या चोरी, ख़यानत, ख़ुर्द बुर्द और धोखे बाज़ी में हर चीज़ को जायज़ समझता है उससे किसी क़िस्म की पाकीज़गी ए नफ़्स जैसी सिफ़ात की हरगिज़ तवक़्क़ो नही रखी जा सकती या जो शख़्स माल व दौलत जमा करने का शायक़ और शेफ़ता है और लोगों के माली हुक़ूक़ और क़र्ज़ों की अदायगी की तरफ़ हरगिज़ तवज्जो नही करता। वह कभी सख़ावत की सिफ़त से मुत्तसिफ़ नही हो सकता या जो शख्स ख़ुदा तआला की इबादत नही करता और हफ़्तो बल्कि महीनों तक ख़ुदा की याद से ग़ाफ़िल रहता है वह कभी ख़ुदा और रोज़े क़यामत पर ईमान और ऐसे ही एक आबिद की सिफ़ात रखने से क़ासिर है।


पस पसंदीदा अख़लाक़, मुनासिब आमाल व अफ़आल के सिलसिले से ही ज़िन्दा रहते हैं। चुनाँचे पसंदीदा अख़लाक़, बुनियादी ऐतेक़ादात की निस्बत यही हालत रखते हैं जैसे जो शक़्स किब्र व गुरुर, ख़ुद ग़रज़ी और ख़ुद पसंदी के सिवा कुछ नही जानता तो उससे ख़ुदा पर ऐतेक़ाद और मक़ामे रुबूबियत के सामने ख़ुज़ू व ख़ुशू की तवक़्क़ो नही रखी जा सकती। जो शख़्स तमाम उम्र इंसाफ़ व मुरव्वत और रहम व शफ़क़त व मेहरबानी के मअना से बेखबर रहा है वह हरगिज़ रोज़े क़यामत सवाल व जवाब पर ईमान नही रख सकता।


ख़ुदा वंदे आलम, हक़्क़ानी ऐतेक़ादात और पसंदीदा अख़लाक़ के सिलसिले में ख़ुद ईमान और ऐतेक़ाद से वाबस्ता है, इस तरह फ़रमाता है:


ख़ुदा वंदे तआला पर पुख़्ता और पाक ईमान बढ़ता ही रहता है और अच्छे कामों को वह ख़ुद बुलंद फ़रमाता है यानी ऐतेकादात को ज़्यादा करने में मदद करता है।


(सूरह फ़ातिर आयत 10)


और ख़ुसूसन अमल पर ऐतेक़ाद के सिलसिले में अल्लाह तआला यूँ फ़रमाता है:


उसके बाद आख़िर कार जो लोग बुरे काम करते थे उनका काम यहाँ तक आ पहुचा कि ख़ुदा की आयतों को झुटलाते थे और उनके साथ मसख़रा पन करते थे।


(सूरह रुम आयत 10)


मुख़तसर यह कि क़ुरआने मजीद हक़ीक़ी इस्लाम की बुनियादों को कुल्ली तौर पर मुनजरता ज़ैल तीन हिस्सों में तक़सीम करता है:


इस्लामी उसूल व अक़ायद जिन में दीन के तीन उसूल शामिल हैं: यानी तौहीद, नबूवत और क़यामत और इस क़िस्म के दूसरे फ़रई अक़ायद जैसे लौह, कज़ा, क़दर, मलायका, अर्श, कुर्सी, आसमान व ज़मीन की पैदाईश वग़ैरह।



पसंदीदा अख़लाक़
शरई अहकाम और अमली क़वानीन जिनके मुतअल्लिक़ क़ुरआने मजीद ने कुल्ली तौर पर बयान फ़रमाया है और उनकी तफ़सीलात और ज़ुज़ईयात को पैग़म्बरे अकरम (स) ने बयानात या तौज़ीहात पर छोड़ दिया है और पैग़म्बरे अकरम (स) ने भी हदीसे सक़लैन के मुताबिक़ जिस पर तमाम इस्लामी फ़िरक़े मुत्तफ़िक़ हैं और मुसलसल उन अदाहीस को नक़्ल करते रहे हैं, अहले बैत (अ) को अपना जानशीन बनाया है।[2]


ब. क़ुरआने मजीद नबूवत की सनद है।


क़ुरआने मजीद चंद जगह वज़ाहत से बयान फ़रमाता है कि यह (क़ुरआन) ख़दा का कलाम है यानी यह किताब उनही मौजूदा अल्फ़ाज़ के साथ अल्लाह तआला की तरफ़ से नाज़िल हुई है और पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने भी इनही अल्फ़ाज़ में इसको बयान फ़रमाया है।


इस मअना को साबित करने के लिये कि क़ुरआने मजीद ख़ुदा का कलाम है और किसी इंसान का कलाम नही, बार बार बहुत ज़्यादा आयाते शरीफ़ा में इस मौज़ू पर ज़ोर दिया गया है और क़ुरआने मजीद को हर लिहाज़ से एक मोजिज़ा कहा गया है जो इंसानी ताक़त और तवानाई से बहुत बरतर है।


जैसा कि ख़ुदा ए तआला इरशाद फ़रमाता है:


या कहते हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने ख़ुद क़ुरआन को बना (घड़) कर उसे ख़ुदा से मंसूब कर दिया है, यही वजह है कि वह उस पर ईमान नही लाते। पस अगर वह ठीक कहते हैं तो उस (क़ुरआन) की तरह इबादत का नमूना लायें (बनायें)।


(सूरह तूर आयत 33, 34)


और फिर फ़रमाता है:


ऐ रसूल कह दो कि अगर (सारे जहान के) आदमी और जिन इस बात पर इकठ्ठे और मुत्तफ़िक़ हों कि क़ुरआन की मिस्ल ले आयें तो (नामुम्किन) उसके बराबर नही ला सकते अगरचे (उस कोशिश में) वह एक दूसरे की मदद भी करें।


(सूरह बनी इसराईल आयत 88)


और फिर फ़रमाता है:


क्या यह लोग कहते हैं कि उस शख़्स (तुम) ने उस (क़ुरआन) को अपनी तरफ़ से घड़ लिया है तो तुम उन से साफ़ साफ़ कह दो कि अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो (ज़्यादा नही) ऐसी ही दस सूरतें अपनी तरफ़ से घड़ के ले आओ।


(सूरह हूद आयत 13)


और फिर फ़रमाता है:


आया यह लोग कहते हैं कि इस क़ुरआन को रसूल ने झूट मूठ बना कर ख़ुदा से मंसूब कर दिया है, पस ऐ रसूल उन से कह दो कि उसकी मानिन्द सिर्फ़ एक ही सूरह लिख कर ले आएँ।


(सूरह युनुस आयत 38)


और फिर (उन लोगों का) पैग़म्बरे अकरम (स) से मुक़ाबला करते हुए फ़रमाता है:


और जो चीज़ (क़ुरआन) हम ने अपने बंदे पर नाज़िल की है अगर तुम्हे उसमें शक व शुब्हा है तो ऐसे इंसान की तरह जो लिखा पढ़ा नही और जाहिलियत के माहौल में उस की नश व नुमा हुई है, इस तरह का एक क़ुरआनी सूरह लिख कर ले आओ।


(सूरह बक़रा आयत 23)


और फिर इख़्तिलाफ़ और तज़ाद न रखने के मुतअल्लिक़ बराबरी और मुक़ाबला करते हुए फ़रमाया है:


आया यह लोग कुरआन पर ग़ौर नही करते और अगर यह क़ुरआन ख़ुदा के अलावा किसी और की तरफ़ से नाज़िल हुआ होता तो उसमे बहुत ज़्यादा इख़्तिलाफ़ पाये जाते क्योकि इस दुनिया में हर चीज़ में तग़य्युर और तरक़्क़ी पज़ीरी के क़ानून में शामिल है और वह इख़्तिलाफ़ अजज़ा और अहवाल से मुबर्रा नही होती और अगर क़ुरआन इंसान का बनाया हुआ होता तो जैसा कि तेईस साल के अरसे में थोड़ा थोड़ा नाज़िल होता रहा तो यह क़ुरआन) इख़्तिलाफ़ात और तज़ादात से मुबर्रा नही हो सकता था और इस तरह हरगिज़ यकसाँ न होता।


(सूरह निसा आयत 82)


क़ुरआने मजीद जो इन फ़ैसला कुन और पुख़्ता अंदाज़ से ख़ुदा का कलाम होने का ऐलान और उसका सबूत फ़राहम करता है। अव्वल से लेकर आख़िर तक साफ़ तौर पर हज़रत मुहम्मद (स) का अपने रसूल और पैग़म्बर के तौर पर तआरुफ़ कराता है और इस तरह आँ हज़रत (स) के नबूवत की सनद लिखता है। इसी बेना पर कई बार ख़ुदा के कलाम में पैग़म्बरे अकरम को हुक्म दिया जाता है कि अपनी नबूवत व पैग़म्बरी के सबूत में ख़ुदा की शहादत यानी क़ुरआने मजीद की रौ से अपनी नबूवत का ऐलान करें:


ऐ नबी कह दें कि मेरे और तुम्हारे दरमियान, मेरी नबूवत और पैग़म्बरी के मुतअल्लिक़ ख़ुद ख़ुदा की शहादत काफ़ी है।


(सूरह रअद आयत 43)


एक और जगह (क़ुरआने मजीद) में ख़ुदा वंदे करीम की शहादत के अलावा फ़रिश्तों की शहादत भी है:


लेकिन ख़ुदा वंदे तआला ने जो चीज़ तुझ पर नाज़िल की है उसके मुतअल्लिक़ ख़ुद भी शहादत देता है और फ़रिश्ते भी शहादत देते हैं और सिर्फ़ ख़ुदा वंदे तआला की शहादत काफ़ी है।


(सूरह निसा आयत 166)



जारी...



साभार: इस्लामी धर्म एकता परिषद


संसार के बुद्धिजीवियों की कर्बला और इमाम हुसैन के बारे में राय


क्या कहते हैं संसार के बुद्धीजीवी, दार्शनिक, लेखक और अधिनायक, कर्बला और इमाम हुसैन के बारे में ?

महात्मा गांधी : मैंने हुसैन से सीखा की मज़लूमियत में किस तरह जीत हासिल की जा सकती है! इस्लाम की बढ़ोतरी तलवार पर निर्भर नहीं करती बल्कि हुसैन के बलिदान का एक नतीजा है जो एक महान संत थे!

रबिन्द्र नाथ टैगौर : इन्साफ और सच्चाई को ज़िंदा रखने के लिए, फौजों या हथियारों की ज़रुरत नहीं होती है! कुर्बानियां देकर भी फ़तह (जीत) हासिल की जा सकती है, जैसे की इमाम हुसैन ने कर्बला में किया!

पंडित जवाहरलाल नेहरु : इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की क़ुर्बानी तमाम गिरोहों और सारे समाज के लिए है, और यह क़ुर्बानी इंसानियत की भलाई की एक अनमोल मिसाल है!

डॉ राजेंद्र प्रसाद : इमाम हुसैन की कुर्बानी किसी एक मुल्क या कौम तक सिमित नहीं है, बल्कि यह लोगों में भाईचारे का एक असीमित राज्य है!

डॉ. राधाकृष्णन : अगरचे इमाम हुसैन ने सदियों पहले अपनी शहादत दी, लेकिन इनकी इनकी पाक रूह आज भी लोगों के दिलों पर राज करती है!

स्वामी शंकराचार्य : यह इमाम हुसैन की कुर्बानियों का नतीजा है की आज इस्लाम का नाम बक़ी है नहीं तो आज इस्लाम का नाम लेने वाला पुरी दुन्या में कोई भी नहीं होता

श्रीमती सरोजिनी नायडू : मै मुसलमानों को इसलिए मुबारकबाद पेश करना चाहती हूँ की यह उनकी खुशकिस्मती है की उनके बीच दुन्या की सब से बड़ी हस्ती इमाम हुसैन (अ:स) पैदा हुए जो संपूर्ण रूप से दुन्या भर के तमाम जाती और समूह के दिलों पर राज किया और करता है!

एडवर्ड ब्राउन : कर्बला में खूनी सहरा की याद जहां अल्लाह के रसूल का नवासा प्यास के मारे ज़मीन पर गिरा और जिसके चारों तरफ सगे सम्बन्धियों के लाशें थीं यह इस बात को समझने के लिए काफी है की दुश्मनों की दीवानगी अपने चरम सीमा पर थी, और यह सब से बड़ा ग़म (शोक) है जहाँ भावनाओं और आत्मा पर इस तरह नियंत्रण था की इमाम हुसैन को किसी भी प्रकार का दर्द, ख़तरा और किसी भी प्रिये की मौत ने उन के क़दम को नहीं डगमगाया!

इग्नाज़ गोल्ज़ेहर : बुराइयों और हज़रत अली के खानदान पर हुए ज़ुल्म और प्रकोप पर उनके शहीदों पर रोना और आंसू बहाना इस बात का प्रमाण है की संसार की कोई भी ताक़त ईनके अनुयायों को रोने या ग़म मनाने से नहीं रोक सकती है और अक्षर "शिया" अरबी भाषा में कर्बला की निशानी बन गए हैं!

डॉ के शेल्ड्रेक : इस बहादुर और निडर लोगों में सभी औरतें और बच्चे इस बात को अची तरह से जानते और समझते थे की दुश्मन की फौजों ने इनका घेरा किया हुआ है, और दुश्मन सिर्फ लड़ने के लिए नहीं बल्कि इनको क़त्ल करने के लिए तैयार हैं! जलती रेत, तपता सूरज और बच्चों की प्यास ने भी इन्हें एक पल के, ईन में से किसी एक व्यक्ति को भी अपना क़दम डगमगाने नहीं दिया! हुसैन अपनी एक छोटी टुकड़ी के साथ आगे बढ़े, न किसी शान के लिए, न धन के लिए, न ही किसी अधिकार और सत्ता के लिए, बल्कि वो बढ़े एक बहुत बड़ी क़ुर्बानी देने के लिए जिस में उन्होंने हर क़दम परसारी मुश्किलों का सामना करते हुए भी अपनी अपनी सत्यता का कारनामा दिखा दिया!

चार्ल्स डिकेन्स : अगर हुसैन अपनी संसारिक इच्छाओं के लिए लड़े थे तो मुझे यह समझ नहीं आता की उन्हों ने अपनी बहन, पत्नी और बच्चों को साथ क्यों लिया! इसी कारण मै यह सोचने और कहने पर विवश हूँ के उन्हों ने पूरी तरह से सिर्फ इस्लाम के लिए अपने पुरे परिवार का बलिदान दिया ताकि इस्लाम बच जाए!

अंटोनी बारा : मानवता के वर्तमान और अतीत के इतिहास में कोई भी युद्ध ऐसा नहीं है जिसने इतनी मात्रा में सहानूभूती और प्रशंसा हासिल की है और सारी मानवजाती को इतना अधिक उपदेश व उदाहरण दिया है जितनी इमाम हुसैन की शहादत ने कर्बला के युद्ध से दी है!

थॉमस कार्लाईल : कर्बला की दुखद घटना से जो हमें सब से बड़ी सीख मिलती है वो यह है की इमाम हुसैन और इनके साथियों का भगवान् पर अटूट विश्वास था और वोह सब मोमिन (भगवान् से डरने वाले) थे! इमाम हुसैन ने यह दिखा दिया की सैन्य विशालता ताक़त नहीं बन सकती!

रेनौल्ड निकोल्सन : हुसैन गिरे, तीरों से छिदे हुए, इनके बहादुर सदस्य आखरी हद तक मारे-काटे जा चुके थे, मुहम्मदी परम्परा अपने अंत पर पहुँच जाती, अगर इस असाधारण शहादत और क़ुर्बानी को पेश न किया जाता! इस घटना ने पुरी बनी उमय्या को हुसैन के परिवार का दुश्मन, यज़ीद को हत्यारा और इमाम हुसैन को "शहीद" घोषित कर दिया

नोट : यह लिस्ट बहुत लम्बी है, और ऊपर इस लिस्ट के कुछ उदाहरण ही दर्शित  हैं.

‘ईशनिंदा कानून’ इस्लाम के खिलाफ़ है – मौलाना वहीदुद्दीन खान

मौलाना वहीदुद्दीन खान को लाइव सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें.


Maulana Wahiduddin Khan

पैगम्बर मुहम्मद साहब के बारे में या इसलाम के बारे में कोई किसी भी तरह की टिप्पणी करता है, तो यह उसकी निजी सोच का मामला है. इसके लिए उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. ऐसे घृणित काम के लिए उसे सजा या माफ़ी सिर्फ़ अल्लाह ही दे सकता है, इंसान नहीं.


पाकिस्तान एक लोकतांत्रिक मुल्क जरूर है, लेकिन उसकी कुछ राजनैतिक नीतियां धर्म आधारित हैं. आज तक वहां जितनी भी हत्याएं हुई हैं, उनके पीछे राजनीतिक कारण कम और धार्मिक कारण ज्यादा रहे हैं. धार्मिक कानून को मानने वाले मुल्कों में तरक्कीपसंद लोगों के लिए अपनी बात कह पाना बहुत मुश्किल होता है.


उनके प्रोग्रेसिव सोच को या तो दबा दिया जाता है या लोगों के बीच पहुंचने से पहले ही उनकी हत्या कर दी जाती है. ऐसी हत्याएं पाकिस्तान में ही नहीं होतीं. दुनिया के और भी कई मुल्क हैं, जहां प्रोग्रेसिव सोच के लोगों की हत्याएं होती रहती हैं.


पाकिस्तान के इतिहास पर एक नजर डालें, तो पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या से पहले जुल्फ़िकार अली भुट्टो, बेनजीर भुट्टो और लियाकत खान जैसे नेताओं की हत्या में कहीं न कहीं धार्मिक कट्टरता शामिल थी. हाल में पाकिस्तान के ईशनिंदा कानून की खिलाफ़त करने वाली पाकिस्तानी ईसाई महिला ओसया बीबी के पक्ष में बोलने के कारण पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या कर दी गयी. पाकिस्तान में ओसया बीबी को ईशनिंदा कानून के तहत मौत की सजा सुनायी जा चुकी है और वे जेल में हैं.


ऐसा कहना कि ईशनिंदा (पैगम्बर मुहम्मद या इसलाम के बारे में अपमानजनक टिप्पणी) करने पर इसलाम में मौत की सजा का फ़रमान दिया गया है, गलत है और यह कानून भी इसलाम के खिलाफ़ है.


इसलामी तारीख के मुताबिक ईशनिंदा कानून पहली बार अब्बासी काल में आया. 750 ई. में दुनिया के कई मुल्कों, जैसे उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण यूरोप, सिंध और मध्य ऐशया, में अब्बासी वंश का कब्जा था. अब्बासियों के ही राज में इसलाम का स्वर्ण युग शुरू हुआ. अब्बासी खलीफ़ा ज्ञान को बहुत महत्व देते थे.


मुसलिम दुनिया बहुत तेजी से विश्व का बौद्धिक केंद्र बनने लगी और उस दौरान मुसलमान और मुसलिम शासक राजनीतिक उच्चता के शिखर पर थे. उनके सत्ता के इस गुरूर ने ईशनिंदा जैसे कानून को जन्म दिया. यह एक नयी कानूनी इजाद थी, जिसे कुर्आन और हदीस दोनों इनकार करते हैं.


मतलब यह कि कुर्आन या हदीस में कही गयी बात को तोड़-मरोड़ कर या गलत व्याख्या कर कोई नया कानून बनाने की इजाजत इसलाम में नहीं है. इसलिए पाकिस्तान को भी चाहिए कि इस कानून को फ़ौरन खत्म करे, क्योंकि यह वही ईशनिंदा कानून है जिसे अब्बासियों ने इजाद की थी.ईशनिंदा लोगों को मिली अभिव्यक्ति की आजादी का गलत इस्तेमाल है और इसके लिए कोई कानूनी सजा मुकर्रर नहीं है.


अगर कोई शख्स किसी को चोट पहुंचाता है या शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाता है, तो उस पर सजा का मामला बनता है, लेकिन वह भी मौत की सजा का नहीं. अगर कोई ईशनिंदा करता है, तो उस पर तो कोई कानूनी सजा का मामला ही नहीं बनता, क्योंकि वह उसके मानसिक सोच का मामला है. इस ऐतबार से हम किसी को ऐसा करने पर सजा कैसे दे सकते हैं? इस तरह का कानून इसलाम में कहीं नहीं है.


पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून जनरल जियाउल हक के शासनकाल में लागू किया गया था. हदीस के जमाने के बाद, यानी पैगम्बर मुहम्मद के बाद के जमाने में, अरब में कुछ ऐसे शासक हुए, जिन्होंने इसलामीकरण के नाम पर कुर्आन और हदीस की गलत व्याख्या की. उन्होंने मनमाने ढंग से तरह-तरह के कई कानून बनाये, जिन्हें ‘फ़ोकहा’ कहा गया.


आज इसको मानने वालों की पूरी दुनिया में एक लंबी फ़ेहरिस्त है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों की हत्याएं होती रही हैं.इसलाम के मुताबिक अगर कोई पैगम्बर मुहम्मद साहब या इसलाम के बारे में अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता है, तो यह उसकी नासमझी है. मुसलमान विद्वानों को चाहिए कि उस शख्स को समझाएं और इसलाम की अच्छी बातों को उसके जेहन में उतारने की कोशिश करें.


बजाय इसके कि उसकी मौत का फ़रमान जारी कर दें. पैगम्बर मुहम्मद के बारे में या इसलाम के बारे में कोई किसी भी तरह की टिप्पणी करता है, तो यह उसके निजी सोच का मामला है. इसके लिए उस पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. ऐसे घृणित काम के लिए उसे सजा या माफ़ी सिर्फ़ अल्लाह ही दे सकता है, इंसान नहीं.इस पूरे मसले के मद्देनजर इसलामी तारीख का एक वाकया बयान करना मुनासिब होगा.


पैगम्बर मुहम्मद जब रास्ते से गुजरते थे, तो उनके दुश्मन उनके और इसलाम के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करते थे. सहाबा किराम (मुहम्मद साहब के साथी) गुस्सा होकर कहते थे कि हुजूर, अगर आप इजाजत दें तो हम उनको सबक सिखाएं. लेकिन पैगम्बर मुहम्मद ने उन्हें मना करते हुए अपने सहाबी साबित अल अंसारी से कहा था कि उनके अंदर समझ की कमी है.


मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि अल्लाह उन्हें अच्छी हिदायत दे. पैगम्बर मुहम्मद ने उनके खिलाफ़ किसी भी तरह की सजा से इनकार कर दिया था. इसलाम हमेशा किसी मसले की जड़ तक जाकर कोई फ़ैसला देने की बात करता है. कुर्आन में आया है- ‘किसी भी मसले के पीछे के कारणों को ढूंढ़कर लोगों को समझाने की कोशिश करनी चाहिए. फ़ौरन उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए, जो अल्लाह के अलावा किसी और की प्रार्थना करते हैं..(6:108)’इसलाम सिर्फ़ हत्या के मामले में ही सजा की इजाजत देता है.


इसके अलावा किसी भी तरह के अपराध के लिए इसलाम में कहीं भी मौत या मौत जैसी सजा मुकर्रर नहीं है. अगर कहीं ऐसा होता है तो ऐसे मुल्क की सरकार को चाहिए कि पहले वो इसलाम को समझने की कोशिश करे, फ़िर कोई सजा का प्रावधान बनाये और वो सजा भी मौत की नहीं होनी चाहिए. इसलाम तो साफ़-साफ़ कहता है कि अगर किसी ने कोई अपराध किया है तो उसे सजा संवैधानिक कोर्ट से ही दी जानी चाहिए और वह भी जुर्म साबित हो जाने के बाद.


कोई भी आम नागरिक ऐसा नहीं कर सकता, जैसा कि सलमान तासीर की हत्या कर मुमताज कादरी ने किया.कुर्आन में अल्लाह ने अपने रसूल, पैगम्बर मुहम्मद को हुक्म देते हुए कहा है- ‘ऐ मुहम्मद! लोगों को आप दीन (इसलाम धर्म) के बारे में बताइये. आपका काम सिर्फ़ लोगों को बताना है, क्योंकि आप निगहबान (संरक्षक) नहीं हैं..(88:21:22)’ इससे यह साबित होता है कि ईशनिंदा जैसे जुर्म में भी किसी को मौत की सजा नहीं दी जा सकती.


इसलाम का दायरा बहुत बड़ा है. इसलाम सजा से पहले किसी शख्स को दीनी बातों के तहत समझाकर उसे दीन की तरफ़ आने की दावत देने की बात करता है, न कि फ़ौरन सजा की. लोगों के दिमाग में एक धारणा बन गयी है कि कुर्आन एक फ़रमान जारी करने वाली किताब है.


यह बहुत ही गलत धारणा है. कुर्आन कोई क्रिमिनल कोड (अपराध संहिता) नहीं है, बल्कि यह तो एक आस्था (राजी होने या करने) वाली किताब है. इसलाम के सारे तर्क और उपदेश स्थितिजन्य कारणों पर आधारित होते हैं, कि कोई मसला क्यों और कैसे हल किया जाना चाहिए.


(लेखक इसलामी विद्वान हैं और सेंटर फ़ॉर पीस एंड स्पीरिचुअलिटी इंटरनेशनल के संस्थापक हैं.)


अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें (पार्ट-10)

खुदा के बारे में कांट्राडिक्शन के स्पष्टीकरण : साफ है कि खुदा के बारे में अध्ययन के समय जो कांट्राडिक्शन हमें दृष्टव्य होते हैं, उसमें भी उपरोक्त घटक जिम्मेदार हैं। यानि सीमित सोच, वैज्ञानिक नियमों की सीमा और वैज्ञानिक उपकरणों की सीमा। और ऐसा होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि खुदा ने सृष्टि की रचना की। प्रत्येक प्राणी सृष्टि का अंग है। स्पष्ट है कि मनुष्य द्वारा जिन नियमों की खोज की गयी या रचना की गयी उनकी कसौटी पर खुदा को नहीं परखा जा सकता।


लेकिन चूंकि इस पुस्तक में खुदा तक साइंटिफिक दृष्टि से पहुंचने की कोशिश की जा रही है इसलिए सबसे पहले पीछे इंगित किये गये कांट्राडिक्शन पर विचार करना जरूरी है।



इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के फ़तवे का स्वागत

पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नियों और सुन्नी समुदाय के प्रतीकों के अनादर के हराम होने पर आधारित इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुललाहिल उज़्मा ख़ामेनई के फ़तवे....का धार्मिक तथा राजनैतिक गलियारों तथा इस्लामी जगत के संचार माध्यमों में व्यापक रूप से स्वागत किया गया है।


इस फ़तवे की, जो सऊदी अरब के एहसा नामक क्षेत्र में रहने वाले शीया धर्मगुरूओं की ओर से पूछे गए प्रश्न के उत्तर में दिया गया है, विश्व में सुन्नी और शीया समुदायों की सराहना की गई है।


इस्लामी जगत के धर्मगुरुओं और राजनैतिक गलियारों ने इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की दूरदर्शिता की प्रशंसा करते हुए इस फ़तवे को दूरदर्शितापूर्ण, इस्लामी शत्रुओं के षडयंत्रों को विफल बनाने वाला तथा मुसलमानों के बीच एकता उत्पन्न करने वाला पुल बताया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का यह फ़तवा वर्तमान स्थिति में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुस्लिम एकता की शत्रु शक्तियां, एक कुवैती नागरिक द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नी के बारे में अपशब्द प्रयोग किए जाने बहुत प्रसन्न थीं। इन शक्तियों का प्रयास था कि बिना सोचे समझे दिये जाने वाले इस वक्तव्य को वे एक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करके सुन्नी और शीया मुसलमानों के बीच मतभेद उत्पन्न कर सकेंगी किंतु इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की दूरदर्शिता ने शत्रु की इस योजना को विफल बना दिया।


कुवैत के एक नागरिक यासिर अलहबीब द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नी हज़रत आयशा को बुरा-भला कहने पर इस्लामी जगत में व्यापक प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। इस घटना के पश्चात सऊदी अरब, लेबनान, ईरान तथा फ़ार्स की खाड़ी के देशों के कई वरिष्ठ शीया धर्मगुरूओं ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की किसी भी पत्नी के अनादर की कड़े शब्दों में भर्त्सना की। इसी विषय के दृष्टिगत कुवैत की सरकार ने कुवैती नागरिक यासिर अलहबीब की नागरिकता समाप्त कर दी है जो इस समय लंदन में हैं। एसी परिस्थिति में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई का फ़तवा मुस्लिम जगत में आम जनमत की प्रसन्नता का कारण बना और मुस्लिम जगत के संचार माध्यमों ने इसका स्वागत करते हुए इस फ़त्वे को इस्लामी पंथों के बीच एकता का आधार बताया है.


डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट में ज़ीशान ज़ैदी

हमें बताते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है कि इस्लामहिंदी.कॉम के नायाब लेखों को बुद्धिजीवी वर्ग ने गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है. इस कड़ी में लेखक ज़ीशान ज़ैदी का लेख "अल्लाह और विज्ञान" नामक शीर्षक से आज (18, जनवरी 2011) को दैनिक समाचार पात्र "डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट" में प्रकाशित हुआ है.


अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें (पार्ट-9)

किसी वृत्त के अन्तर्गत अनन्त बिन्दु आते हैं क्योंकि बिन्दु की कोई विमा नहीं होती। यह ठीक उसी तरह की बात है मानो कोई व्यक्ति किसी बर्तन को पानी से भरने के लिए खाली गिलास उसमें डाले स्पष्ट है कि बर्तन कभी नहीं भरेगा। अब यदि यह कहा जाये कि दो असमान साइज के बर्तनों को भरने में समान समय लगेगा तो इस बात का कोई आधार नहीं। परन्तु यहां एक बात और है। कुछ ऐसे कण वास्तविक रूप में भी होते हैं जो किसी बिन्दु के समान विमाहीन होते हैं। जैसे फोटॉन, न्यूट्रिनो, एण्टी न्यूट्रिनो इत्यादि। इस प्रकार के कणों को यदि दो असमान वृत्तों या किसी अन्य रूप में रखा जाये तो सभी में से समान संख्या में आयेंगे। प्रायोगिक रूप में हम टार्च का उदाहरण ले सकते हैं। टार्च के छोटे द्वारक से निकलने वाला प्रकाश आगे बढ़कर एक बड़े वृत्त का रूप ले लेता है। इस प्रकार गणित के इस नियम को उपरोक्त उदाहरण द्वारा आधारहीन नहीं कहा जा सकता। चूंकि हम इस नियम का अध्ययन करते वक्त सिर्फ पदार्थिक कणों को अपने जहन में रखते हैं इसलिए कांट्राडिक्शन महसूस होता है।



सामाजिक समरसता इस्लाम का पैग़ाम – मौलाना वहीदुद्दीन खान

Maulana Wahiduddin Khan

सामाजिक समरसता इस्लाम का विशेष आग्रह है। इसमें कोई शक नहीं कि इस्लाम बहुदेववाद को नहीं मानता लेकिन मनुष्य के धार्मिक व्यवहार सहित दैनिक आचार में वह निश्चित रूप से सहिष्णुता का हिमायती रहा है। इसके लिए वह आस्था बदलना जरूरी नहीं समझता।

समाज में जिस तरह सांप्रदायिक विद्वेष बढ़ता जा रहा है, उसे देखकर सामाजिक जीवन के एक अंतर्निहित गुण के रूप में आज धार्मिक सद्भाव की आवश्यकता ज्यादा महसूस की जा रही है। आम धारणा के विपरीत इस्लाम धर्म सामाजिक सौहार्द की जबर्दस्त वकालत करता है। क़ुरान के इस कथन को जो इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म का अनुयायी होगा, उसे अल्लाह स्वीकार नहीं करेंगे और वह इस दुनिया में आकर खो जाएगा, की बहुधा गलत व्याख्या की गई है।

क़ुरान में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है। क़ुरान में साफ-साफ कहा गया है - यहूदी, ईसाई, सैबियन्स (प्राचीन साबा राजशाही के मूल निवासियों का धर्म) सभी आस्तिक, जो खुदा और क़यामत में विश्वास रखते हैं और जो सही काम करते हैं, अल्लाह उन्हें इनाम देगा। उन्हें न तो डरने की जरूरत है और न पश्चाताप करने की।

इस्लाम किसी भी समूह के उच्चतर धार्मिक अवधारणा का निषेध करता है। जाहिर है कि इस्लाम के पैमाने से मोक्ष व्यक्ति के अपने आचरण पर निर्भर करता है न कि किसी खास धार्मिक समूह से संबंधित होने पर। यह समझदारी धार्मिक समरसता के लिए निहायत जरूरी है। इस्लाम सच्चाई की अनेकता में नहीं बल्कि सच्चाई की एकता में विश्वास करता है।

इसका मतलब यह है कि इस्लाम की नजर में सच्चाई सिर्फ एक है, अनेक नहीं। इसीलिए वह महज अवधारणा के स्तर पर भी बहुदेववाद को स्वीकार नहीं करता। लेकिन सच्चाई तो यही है कि दुनिया में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।

ऐसे में सवाल यह है कि उनके बीच समरसता कैसे स्थापित हो। जहाँ तक इस्लाम की बात है तो वह इस बात में यकीन नहीं रखता कि सभी धर्म मूल रूप से एक हैं और सिर्फ रास्ते अलग-अलग हैं। इस समस्या के बारे में इस्लाम की अवधारणा इसलिए ज्यादा वास्तविक है कि वह विचारधारात्मक मतभेदों को स्वीकार करता है। मतभेदों को स्वीकार कर वह लोगों के दैनिक जीवन में सहिष्णुता और एक-दूसरे के धर्म को आदर देने की वकालत करता है। क़ुरान घोषणा करता है कि धार्मिक मामलों में जोर-जबर्दस्ती के लिए कोई जगह नहीं है। क़ुरान किसी भी दूसरे धर्म की निंदा करने को गैरवाजिब बताता है।

इस्लाम धार्मिक समरसता के बदले धार्मिक लोगों की समरसता पर ज्यादा जोर देता है। इतिहास गवाह है कि आज तक जहां भी सामाजिक समरसता कायम रही है, मतभिन्नता के बावजू्‌द एकता पर आधारित रही है न कि बिना मतभेद की एकता पर। मालूम हो कि मुहम्मद साहेब के जीवन काल में ही यहूदी, ईसाई और इस्लाम के धर्मगुरुओं ने उच्च विचार और धार्मिक समरसता के महान उद्देश्यों के लिए याथ्रिब शहर में बहस की थी।

धार्मिक मामलों में सहिष्णुता से काम लेना ही काफी नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के रोज-रोज के आचार-व्यवहार का हिस्सा होनी चाहिए। इस्लाम की आज्ञा है कि अगर प्रार्थना के समय मुसलमान के अलावा कोई अन्य धर्म का अनुयायी भी मस्जिद में आ जाए तो उसे अपने धर्म के अनुसार पूजा करने में स्वतंत्र महसूस करना चाहिए औऱ वह मस्जिद में ही ऐसा कर सकता है। इतिहास के हर दौर में सहिष्णुता इस्लाम का नियम रहा है। यही कारण है कि दुनिया का सबसे नया धर्म होने के बावजूद इसका इतने बड़े पैमाने पर प्रसार हुआ। इस्लाम ने किसी धर्म को मिटाया नहीं।

आज धार्मिक सहिष्णुता की बड़ी जरूरत आन पड़ी है। किंतु यह लोगों की आस्था को बदलकर नहीं किया जा सकता। इसका एकमात्र रास्ता यही है कि लोगों को दूसरे धर्म के मानने वालों के प्रति आदर भाव रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और व्यवहार में हमेशा लागू किया जाए। अगर लंबे समय तक इस सिद्धांत का पालन किया जाए तो वह दिन दूर नहीं जब एक विश्व धर्म की नींव पड़ जाएँ।

- मौलाना वहीदुद्दीन खान

अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें (पार्ट-8)

बहुत से ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे जिससे उपरोक्त बातें सत्य सिद्ध हो जाती हैं। पृथ्वी तल से कुछ ऊंचाई पर कोई वस्तु गिराने पर वह नीचे की तरफ आती है। लेकिन यह नियम केवल पृथ्वी पर लागू होता है। बाहरी अंतरिक्ष में कोई वस्तु नीचे फेंकने पर वह कभी नीचे नहीं आयेगी। हाईस्कूल का एक आम साइंस का स्टूडेन्ट गति के समीकरण पढ़ता है। लेकिन वह गति के समीकरण तभी लागू होते हैं जब कोई वस्तु समान त्वरण (Acceleration) से गति कर रही हो। अगर त्वरण समान नहीं है तो यह समीकरण लागू नहीं होते। न्यूटन के गति के नियम सिर्फ उसी वक्त लागू होते हैं जब वस्तु कम वेग से गति कर रही हो। अगर वस्तु का वेग बहुत ज्यादा है (जैसे इलेक्ट्रान या गैलेक्सी का वेग) तो उपरोक्त नियम लागू नहीं होते। इस तरह के केसेज में आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी लगने लगती है।



आतंकवाद और इस्लाम!

आज सारे विश्व को आतंकवाद नामक दानव ने घेरा हुआ है। आमतौर पर आतंकवाद किसी वर्ग अथवा सरकार से उपजी प्रतिशोध की भावना से शुरू होता है। इसके मुख्यतः दो कारण होते है, पहला यह कि किसी वर्ग से जो अपेक्षित कार्य होते हैं उसके द्वारा उनको ना करना तथा दूसरा कारण ऐसे कार्यों को होना जिनकी अपेक्षा नहीं की गई है। मगर आमतौर पर ऐसे प्रतिशोधिक आंदोलन अधिक समय तक नहीं चलते हैं। हाँ शासक वर्ग द्वारा हल की जगह दमनकारी नीतियां अपनाने के कारणवश अवश्य ही यह लम्बे समय तक चल सकते है। ऐसे आंदोलनों में अक्सर अर्थिक हितों की वजह से बाहरी हस्तक्षेप और मदद जुड़ जाती है और यही वजह बनती है प्रतिशोध के आतंकवाद के स्तर तक व्यापक बनने की। कोई भी हिंसक आंदोलन धन एवं हथियारों की मदद मिले बिना फल-फूल नहीं सकता है। इन हितों में राजनैतिक, जातीय, क्षेत्रिए तथा धार्मिक हित शामिल होते हैं। बाहरी शक्तियों के सर्मथन और धन की बदौलत यह आंदोलन आंतकवाद की राह पर चल निकलते हैं और सरकार के लिए भस्मासुर बन जाते हैं। तब ऐसे आंदोलन क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं रह जाते, बल्कि संगठित होकर सशक्त व्यापार की तरह सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ाए जाते हैं।

जब बात धार्मिक हितों की होती है तो ऐसे संगठन धार्मिक ग्रन्थों का अपने हिसाब से विश्लेषण करके धर्म की सही समझ नहीं रखने वाले लोगों को अपने जाल में फांस लेते हैं। जैसा कि अक्सर सुनने में आता है कि आतंकवादी ट्रेनिंग सेंटरों में यह समझाया जाता है कि ईश्वर (अल्लाह) ने काफिरों को कत्ल करने का हुक्म दिया है। ज़रा सी समझ रखने वाला यह समझ सकता है कि अगर ईश्वर काफिरों को कत्ल करने का हुक्म देता तो वह उनको पैदा ही क्यों करता? बल्कि ईश्वर कुरआन में फरमाता है कि वह अपने बन्दों से एक माँ से भी कई गुणा अधिक प्रेम करता है, चाहे वह उसे ईश्वर माने अथवा ना माने और अपने गुमराह बन्दे का भी अंतिम सांस तक वापिस सही राह पर लौट कर आने का इंतज़ार करता है।



कारून नामक खलनायाक इतिहास में एक बहुत बड़े धर्म विरोधी के रूप में जाना जाता है। एक बार उसने लोगों को इकटठा किया और मुसा (अ.) से सबके सामने मालूम किया कि ज़िना (बलात्कार) के गुनाह पर आपका कानून क्या कहता है? उनके जवाब पर उसने एक औरत के द्वारा मुसा (अ.) पर अस्मिता लूटने का इल्ज़ाम लगावाया, इस इल्ज़ाम पर मुसा (अ.) को बहुत गुस्सा आया। मुसा (अ.) का गुस्सा देख कर उस महिला ने सारा सच साफ-साफ उगल दिया। जब उन्होंने ईश्वर से प्रार्थना की तो ईश्वर ने कहा कि (अर्थ की व्याख्या) "हमने धरती को तुम्हारे अधीन कर दिया है, तुम उसे जैसा चाहे हुक्म दे सकते हो।" मुसा (अ.) ने धरती को हुक्म दिया की वह कारून को अपने अन्दर समा ले, इस पर धरती ने उसके बदन का कुछ हिस्सा अपने अंदर समा लिया। यह देख कर कारून ने मुसा (अ.) से अपना जूर्म कुबूल करते हुए माफी मांगी। लेकिन वह बहुत अधिक गुस्से में थे, वह धरती को हुक्म देते गए और कारून माफी मांगता गया। आखिर में कारून पूरा का पूरा धरती में समा गया, इस पर स्वंय ईश्वर ने मुसा (अ.) से कहा कि (अर्थ की व्याख्या) "मेंरा बन्दा तुझ से माफी मांगता रहा और तुने उसे माफ नही किया? मेरे जलाल की कसम अगर वह एक बार भी मुझसे माफी मांगता तो मैं अवश्य ही उसे माफ कर देता।" उपरोक्त बात से पता चलता है कि मेरा अल्लाह (ईश्वर) अपने बन्दों को कैसा प्यार करने वाला और कैसा माफ करने वाला है कि कारून को भी अपना बन्दा कह रहा है और उस जैसे गुनाहगार को भी माफ करने के लिए फौरन तैयार है जिसने स्वयं को ईश्वर घोषित किया हुआ था।

आतंकवादी संगठन अक्सर ही उन आयतों (श्लोक) का गलत विश्लेषण करते हैं जिनमें ईश्वर युद्ध के समय ईमान रखने वालों को उनके विरूद्ध युद्ध का ऐलान करने वालों से डर कर भागने की जगह जम कर युद्ध करने का आह्वान करता है। यह बिलकुल ऐसा ही है, जैसे अपने देश के वीर जवानों को युद्ध के लिए तैयार करने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है तथा कमांडर उनमें जोश भरते हैं. अक्सर इस्लाम विरोधी भी आतंकवादियों की ही तरह  इन आयतों को सही संदर्भ में समझने की कोशिश नहीं करते हैं और इस्लाम के विरोध में उतर आते हैं। अगर ध्यान से देखा जाए तो इस सतह पर दोनो एक ही तरह का कार्य रहें हैं।

इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि एक मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार नहीं करता) के साथ बुरा व्यवहार करे. इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर-मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की, डराने की, आतंकित करने, उसकी संपत्ति गबन करने की, उसके सामान के अधिकार से उसे वंचित करने की, उसके ऊपर अविश्वास करने की, उसकी मजदूरी देने से इनकार करने की, उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की (जबकि उनका माल खरीदा जाए) या (अगर साझेदारी में व्यापार है तो) उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है.

अगर ध्यान से देखा जाए तो पता चलता है कि इस्लाम केवल उन ग़ैर मुस्लिमों से युद्ध करने की अनुमति देता है जो कि मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का ऐलान करें तथा उनको उनके घरों से बेदखल कर दें अथवा इस तरह के कार्य करने वालों का साथ दें। ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है ऐसा करने वालो के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें.

[60:8] अल्लाह तुम्हे इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हे तुम्हारे अपने घर से निकाला. निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है.

[60:9] अल्लाह तो तुम्हे केवल उन लोगो से मित्रता करने से रोकता है जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया और तुम्हे तुम्हारे अपने घरों से निकला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की. जो लोग उनसे मित्रता करें वही ज़ालिम हैं.

[2:190] और अल्लाह के मार्ग मं उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज़्यादती ना करो। निसन्देःह अल्लाह ज़्यादती करने वालों को पसंद नहीं करता।

किसी भी बेगुनाह को कत्ल करने के खिलाफ ईश्वर स्वयं कुरआन में फरमाता हैः

इसी कारण हमने इसराईल की सन्तान के लिए लिख दिया था, कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया। उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्ट प्रमाण ला चुके हैं, फिर भी उनमें बहुत-से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करनेवाले ही हैं [5:32]

इस बारे में अल्लाह (ईष्वर) के अंतिम संदेषवाहक मुहम्मद (स.) का हुक्म है किः


"जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है, उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए, अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुंचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए." (Bukhari, Muslim)


"जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, उसने मुझे ठेस पहुंचाई." (Bukhari)

"जिसने एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई, मैं उसका विरोधी हूँ और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होउंगा." (Bukhari)


"न्याय के दिन से डरो; मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायतकर्ता रहूँगा जो एक मुस्लिम राज्य के गैर-मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उसपर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा." (Al-Mawardi)


"अगर कोई किसी गैर-मुस्लिम की हत्या करता है, जो कि मुसलमानों का सहयोगी था, तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा." (Bukhari).

आंदोलनों चाहे छोटे स्तर पर हों अथवा आतंकवादी रूप ले चुके हों, इनको केवल शक्ति बल के द्वारा नहीं दबाया जा सकता है, बल्कि जितना अधिक शक्ति बल का प्रयोग किया जाता है उतने ही अधिक ताकत से ऐसे आंदालन फल-फूलते हैं। क्योंकि आतंकवादी संगठन बल प्रयोग को लोगो के सामने अपने उपर ज़ुल्म के रूप में आसानी से प्रस्तुत करते हैं। तथा और भी अधिक आसानी से बेवकूफ लेते हैं। ऐसे में आतंकवादी आंदोलन से संबधित पूरे के पूरे वर्ग को ही घृणा और संदेह की निगाह से देखा जाना मुश्किल को और भी बढ़ा देता है। बल्कि ऐसे आंदोलनों के मुकाबले के लिए सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा बल प्रयोग जैसे सभी विकल्पों को एक साथ लेकर चलना चाहिए। वहीं हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि पूरे समाज में आतंकवाद के खिलाफ जागरूकता फैलाई जाए।

आज ऐसी आतंकवादी सोच के खिलाफ पूरे समाज को एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है। इसके लिए सबसे पहला और बुनियादी कार्य आपसी भाईचारे को बढ़ाना तथा भ्रष्टाचार को समाप्त करना है।

आईये मिलकर इस मुहिम को आगे बढ़ाएं।

-शाहनवाज़ सिद्दीकी

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