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इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता के फ़तवे का स्वागत

पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नियों और सुन्नी समुदाय के प्रतीकों के अनादर के हराम होने पर आधारित इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुललाहिल उज़्मा ख़ामेनई के फ़तवे....का धार्मिक तथा राजनैतिक गलियारों तथा इस्लामी जगत के संचार माध्यमों में व्यापक रूप से स्वागत किया गया है।


इस फ़तवे की, जो सऊदी अरब के एहसा नामक क्षेत्र में रहने वाले शीया धर्मगुरूओं की ओर से पूछे गए प्रश्न के उत्तर में दिया गया है, विश्व में सुन्नी और शीया समुदायों की सराहना की गई है।


इस्लामी जगत के धर्मगुरुओं और राजनैतिक गलियारों ने इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की दूरदर्शिता की प्रशंसा करते हुए इस फ़तवे को दूरदर्शितापूर्ण, इस्लामी शत्रुओं के षडयंत्रों को विफल बनाने वाला तथा मुसलमानों के बीच एकता उत्पन्न करने वाला पुल बताया। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का यह फ़तवा वर्तमान स्थिति में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुस्लिम एकता की शत्रु शक्तियां, एक कुवैती नागरिक द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नी के बारे में अपशब्द प्रयोग किए जाने बहुत प्रसन्न थीं। इन शक्तियों का प्रयास था कि बिना सोचे समझे दिये जाने वाले इस वक्तव्य को वे एक प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करके सुन्नी और शीया मुसलमानों के बीच मतभेद उत्पन्न कर सकेंगी किंतु इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की दूरदर्शिता ने शत्रु की इस योजना को विफल बना दिया।


कुवैत के एक नागरिक यासिर अलहबीब द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम (स) की पत्नी हज़रत आयशा को बुरा-भला कहने पर इस्लामी जगत में व्यापक प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं। इस घटना के पश्चात सऊदी अरब, लेबनान, ईरान तथा फ़ार्स की खाड़ी के देशों के कई वरिष्ठ शीया धर्मगुरूओं ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) की किसी भी पत्नी के अनादर की कड़े शब्दों में भर्त्सना की। इसी विषय के दृष्टिगत कुवैत की सरकार ने कुवैती नागरिक यासिर अलहबीब की नागरिकता समाप्त कर दी है जो इस समय लंदन में हैं। एसी परिस्थिति में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई का फ़तवा मुस्लिम जगत में आम जनमत की प्रसन्नता का कारण बना और मुस्लिम जगत के संचार माध्यमों ने इसका स्वागत करते हुए इस फ़त्वे को इस्लामी पंथों के बीच एकता का आधार बताया है.


5 comments: Leave Your Comments

  1. डॉ.अयाज़ अहमदJanuary 19, 2011 at 4:12 PM

    जब स्वामी असीमानंद हैदराबाद जेल मे थे तो वहाँ पर उनकी मुलाकात अपने किए गए गुनाह (मक्का मस्जिद बम विस्फोट ) के आरोप मे बंद मासूम युवक से हुई जिसका नाम अब्दुल कलीम है । कलीम ने स्वामी जी की बहुत सेवा की तो स्वामी जी की आँखे खुली की खुली रह गई क्योंकि उन्हे तो मुसलमानों का कुछ और ही रूप दिखाया गया था और उन्हे वह रूप दिखा कर "बम का जवाब बम " देने के लिए तैयार किया गया था और स्वामी उन देशद्रोही गतिविधियों मे संघ परिवार का साथ देने के लिए तैयार हो गए मगर अब उन्हे अपनी गलती का एहसास होने लगा और उन्होने अपने किए गए तमाम बम धमाकों का इकरार कर लिया । हालाँकि अभी तक उन्ही बम धमाकों के आरोप मे जेल में बंद मुस्लिम युवक छूटे नही लेकिन अब लगता है कि वह सब छूट जाएँगे । लेकिन अभी साध्वी प्रज्ञा का साधुवाद जगाने वाला ऐसा कोई नही मिला पर हमें पूरी उम्मीद है एक दिन वह भी होगा कि जब साध्वी भी सही रास्ते पर आ जाएगी । क्योकि ईश्वर के यहाँ देर है अँधेर नही ।

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  2. बहुत ज़बरदस्त जानकारी दी आपने मासूम भाई... बहुत-बहुत शुक्रिया!!!

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  3. मनुष्य का कर्म धर्मानुकूल ही होना चाहिये और धर्म ईश्वर द्वारा निर्धारित होता है। ज्ञानी और श्रेष्ठ सदाचारी लोगों के अन्तःकरण में ईश्वर अपनी वाणी का अवतरण करता है , वे उस पर अमल करते हैं और लोगों के सामने एक आदर्श और मिसाल पेश करते हैं।
    मुस्लिम जगत के संचार माध्यमों ने इसका स्वागत करते हुए इस फ़त्वे को इस्लामी पंथों के बीच एकता का आधार बताया है.
    बिलकुल सही कहा है .

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