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सामाजिक समरसता इस्लाम का पैग़ाम – मौलाना वहीदुद्दीन खान

Maulana Wahiduddin Khan

सामाजिक समरसता इस्लाम का विशेष आग्रह है। इसमें कोई शक नहीं कि इस्लाम बहुदेववाद को नहीं मानता लेकिन मनुष्य के धार्मिक व्यवहार सहित दैनिक आचार में वह निश्चित रूप से सहिष्णुता का हिमायती रहा है। इसके लिए वह आस्था बदलना जरूरी नहीं समझता।

समाज में जिस तरह सांप्रदायिक विद्वेष बढ़ता जा रहा है, उसे देखकर सामाजिक जीवन के एक अंतर्निहित गुण के रूप में आज धार्मिक सद्भाव की आवश्यकता ज्यादा महसूस की जा रही है। आम धारणा के विपरीत इस्लाम धर्म सामाजिक सौहार्द की जबर्दस्त वकालत करता है। क़ुरान के इस कथन को जो इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म का अनुयायी होगा, उसे अल्लाह स्वीकार नहीं करेंगे और वह इस दुनिया में आकर खो जाएगा, की बहुधा गलत व्याख्या की गई है।

क़ुरान में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है। क़ुरान में साफ-साफ कहा गया है - यहूदी, ईसाई, सैबियन्स (प्राचीन साबा राजशाही के मूल निवासियों का धर्म) सभी आस्तिक, जो खुदा और क़यामत में विश्वास रखते हैं और जो सही काम करते हैं, अल्लाह उन्हें इनाम देगा। उन्हें न तो डरने की जरूरत है और न पश्चाताप करने की।

इस्लाम किसी भी समूह के उच्चतर धार्मिक अवधारणा का निषेध करता है। जाहिर है कि इस्लाम के पैमाने से मोक्ष व्यक्ति के अपने आचरण पर निर्भर करता है न कि किसी खास धार्मिक समूह से संबंधित होने पर। यह समझदारी धार्मिक समरसता के लिए निहायत जरूरी है। इस्लाम सच्चाई की अनेकता में नहीं बल्कि सच्चाई की एकता में विश्वास करता है।

इसका मतलब यह है कि इस्लाम की नजर में सच्चाई सिर्फ एक है, अनेक नहीं। इसीलिए वह महज अवधारणा के स्तर पर भी बहुदेववाद को स्वीकार नहीं करता। लेकिन सच्चाई तो यही है कि दुनिया में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है।

ऐसे में सवाल यह है कि उनके बीच समरसता कैसे स्थापित हो। जहाँ तक इस्लाम की बात है तो वह इस बात में यकीन नहीं रखता कि सभी धर्म मूल रूप से एक हैं और सिर्फ रास्ते अलग-अलग हैं। इस समस्या के बारे में इस्लाम की अवधारणा इसलिए ज्यादा वास्तविक है कि वह विचारधारात्मक मतभेदों को स्वीकार करता है। मतभेदों को स्वीकार कर वह लोगों के दैनिक जीवन में सहिष्णुता और एक-दूसरे के धर्म को आदर देने की वकालत करता है। क़ुरान घोषणा करता है कि धार्मिक मामलों में जोर-जबर्दस्ती के लिए कोई जगह नहीं है। क़ुरान किसी भी दूसरे धर्म की निंदा करने को गैरवाजिब बताता है।

इस्लाम धार्मिक समरसता के बदले धार्मिक लोगों की समरसता पर ज्यादा जोर देता है। इतिहास गवाह है कि आज तक जहां भी सामाजिक समरसता कायम रही है, मतभिन्नता के बावजू्‌द एकता पर आधारित रही है न कि बिना मतभेद की एकता पर। मालूम हो कि मुहम्मद साहेब के जीवन काल में ही यहूदी, ईसाई और इस्लाम के धर्मगुरुओं ने उच्च विचार और धार्मिक समरसता के महान उद्देश्यों के लिए याथ्रिब शहर में बहस की थी।

धार्मिक मामलों में सहिष्णुता से काम लेना ही काफी नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन के रोज-रोज के आचार-व्यवहार का हिस्सा होनी चाहिए। इस्लाम की आज्ञा है कि अगर प्रार्थना के समय मुसलमान के अलावा कोई अन्य धर्म का अनुयायी भी मस्जिद में आ जाए तो उसे अपने धर्म के अनुसार पूजा करने में स्वतंत्र महसूस करना चाहिए औऱ वह मस्जिद में ही ऐसा कर सकता है। इतिहास के हर दौर में सहिष्णुता इस्लाम का नियम रहा है। यही कारण है कि दुनिया का सबसे नया धर्म होने के बावजूद इसका इतने बड़े पैमाने पर प्रसार हुआ। इस्लाम ने किसी धर्म को मिटाया नहीं।

आज धार्मिक सहिष्णुता की बड़ी जरूरत आन पड़ी है। किंतु यह लोगों की आस्था को बदलकर नहीं किया जा सकता। इसका एकमात्र रास्ता यही है कि लोगों को दूसरे धर्म के मानने वालों के प्रति आदर भाव रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और व्यवहार में हमेशा लागू किया जाए। अगर लंबे समय तक इस सिद्धांत का पालन किया जाए तो वह दिन दूर नहीं जब एक विश्व धर्म की नींव पड़ जाएँ।

- मौलाना वहीदुद्दीन खान

4 comments: Leave Your Comments

  1. 1- भारत को ऊपर उठाया जाना हैं ! गरीबों की भूख मिटाई जानी हैं ! शिक्षा का प्रसार किया जाना है ! पंडे पुरोहितो और धर्म के ठेकेदारों को हटाया जाना है ! हमने पंडे पुरोहित और धर्म के ठेकेदार नहीं चाहिए ! हमें सामाजिक आतंक नहीं चाहिए !
    2- जनता के आध्यात्मिक उत्थान की एक ही शर्त हैए आर्थिक और राजनीतिक पुनर्निर्माण !
    3- ‘किसी के कह देने मात्र से अंधों की तरह करोड़ों देवी-देवताओं पर विश्वास न करो।‘
    -स्वामी विवेकानंद
    http://ahsaskiparten.blogspot.com/2011/01/hungers-cry.html

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  2. एक अच्छी पेशकश . बस एक बात समझ मैं नहींआयी शायद इसलिए कि तफसील से नहीं कही गयी है, "इस्लाम की आज्ञा है कि अगर प्रार्थना के समय मुसलमान के अलावा कोई अन्य धर्म का अनुयायी भी मस्जिद में आ जाए तो उसे अपने धर्म के अनुसार पूजा करने में स्वतंत्र महसूस करना चाहिए औऱ वह मस्जिद में ही ऐसा कर सकता है।"

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  3. Bahut achha likha hai Maulana ne, kaash sabhi log ise maane

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