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अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-15)

कुछ लोग यह एतराज़ कर सकते हैं कि दुनिया में बहुत जालिम लोग भी हुए हैं। चंगेज खान जैसे शासकों ने पूरा कत्लेआम मचा दिया था। आधुनिक युग में भी अमेरिका ने एटम बम की मदद से हिरोशिमा और नागासाकी जैसे शहर पूरी तरंह नष्ट कर दिये लेकिन इसके लिए प्रकृति ने उन्हें कोई सजा नहीं दी। और कभी कभी मामूली बातों पर भी सजा मिल जाती है।
इस एतराज का जवाब वही उत्तर हो सकता है जो इससे पहले एक अन्य प्रश्न का जवाब बन चुका है। कि अल्लाह महाशक्ति है और असलियत में उसने बन्दों को सज़ा या जज़ा देने का इरादा कयामत तक के लिए मुल्तवी कर रखा है। इस दुनिया में वह सिर्फ कुछ नमूने दिखाता है और यह नमूने अलग अलग बन्दों के लिए अलग अलग होते हैं। अगर वह सभी बन्दों को एक ही प्रकार की सज़ा या जज़ा देगा तो यह एक अत्यन्त सरल प्रक्रिया हो जायेगी और लोग यह मानने लगेंगे कि यह एक निश्चित प्रक्रिया है ठीक किसी मशीनी सिस्टम की तरंह जो कि वे लोग खुद भी बना सकते हैं। साथ ही वे भले और बुरे काम एक दायरे में रहकर करेंगे। यहां से वे यह सोचना शुरू कर देंगे कि अल्लाह भी उन्हीं जैसी अक्ल रखने वाला कोई प्राणी है जो कहीं अन्य स्थान पर निवास कर रहा है।



तुम हरगिज़ अपनी सख़्तियाँ और परेशानियाँ लोगों पर ज़ाहिर न करो

मुफ़ज़्ज़ल बिन क़ैस ज़िन्दगी की दुशवारी से दो चार थे और फ़क्र व तंगदस्ती कर्ज़ और ज़िन्दगी के अख़राजात से बहुत परेशान थ। एक दिन हज़रत इमाम जाफ़रे सादिक अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अपनी बेचारगी और परेशानी बयान की, कि इतना मुझ पर कर्ज़ है और मैं नहीं जानता की किस तरह अदा करूँ, ख़र्च है मगर आमदनी का कोई वसीला नहीं। मजबूर हो चुका हूँ क्या करूं कुछ समझ मे नहीं आता, मैं हर ख़ुले हुए दरवाज़े पर गया मगर मेरे जाते ही वो दरवाज़ा बन्द हो गया।

और आख़िर में उन्होने इमाम से दरख़ास्त की कि उसके लिए दुवा फ़रमाएं और ख़ुदा वन्दे आलम से चाहें कि उसकी मुश्किल आसान हो। इमाम ने एक कनीज़ को हुक्म दिया (जो कि वहाँ मौजूद थी) जाओ और वो अशरफ़ी की थैली ले आओ जो कि मंसूर ने मेरे लिए भेजी है। वो कनीज़ गई और फ़ौरन अशरफ़ियों की थैली लेकर हाज़िर हुई। इमाम ने मुफ़ज़्ज़ल से फ़रमाया कि इस थैली में चार सौ दीनार हैं जो कि तुम्हारी ज़िन्दगी के लिए कुछ दिन का सहारा बन सकते हैं। मुफ़ज़्ज़ल ने कहा, हुज़ूर मेरी ये ख़्वाहिश न थी, मैं तो सिर्फ़ दुआ का तलबगार था।

इमाम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया, बहुत अच्छा मैं दुआ भी करूंगा, लेकिन मैं तुझ से एक बात कहूँ कि तुम हरगिज़ अपनी सख़्तियाँ और परेशानियाँ लोगों पर ज़ाहिर न करो क्योकि उसका पहला असर ये होगा कि तुम ज़मीन पर गिर चुके हो और ज़माने के मुकाबले में शिकस्त खा चुके हो और तुम लोगों की नज़रों से गिर जाओगे और तुम्हारी शख़्सियत व वक़ार लोगों के दरमियान से ख़त्म हो जाएगा।

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-14)

अल्लाह का कोई रूप या आकार नहीं है। वह निराकार है। वह किसी को दिखाई नहीं देता और न किसी को दिखाई देगा। यह बात गले से नहीं उतरती। क्योंकि कोई भी वस्तु जीवधारी या निर्जीव किसी न किसी रूप, आकार में हमें प्रभावित करता है। जो वस्तुएं नहीं भी दिखाई देतीं उन्हें वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से देखा जा सकता है। जैसे हवा नंगी आँखों से नहीं दिखाई देती लेकिन माइक्रोस्कोप की मदद से उसके अणु देखे जा सकते हैं। इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, न्यूट्रान वगैरा को कैथोड किरण कम्पनदर्शी, विल्सन क्लाउड चैम्बर और इस प्रकार के दूसरे उपकरणों की मदद से देखा जा सकता है। कुल मिलाकर हमारे आसपास जो भी चीजें हैं उन्हें विभिन्न उपकरणों की मदद से हम देख सकते हैं। फिर अल्लाह, जिसे हर जगह मौजूद माना जाता है क्यों नहीं दिखाई देता?



अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-13)

खुदा से सम्बंधित विवादास्पद गुण :


विरोधाभासों के स्पष्टीकरण के बाद हम खुदा से सम्बंधित उन गुणों का अध्ययन करते हैं जो विवादास्पद माने जाते हैं। ऐसे गुण जो किसी मनुष्य की अक्ल में नहीं समा पाते और इस वजह से वह यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ईश्वर वास्तव में है या नहीं? क्योंकि उसे वह गुण तर्कसंगत नहीं मालूम होते।


कुछ इस तरह के तर्कसंगत न प्रतीत होने वाले गुण इस प्रकार हैं :


अल्लाह का कोई आकार या रूप नहीं है। वह निराकार है और किसी को दिखाई नहीं देगा। हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार वह कयामत के रोज दिखाई देगा। लेकिन यह मान्यता बेबुनियाद है और कुछ धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी गयी गलतफहमी का परिणाम है। धर्मग्रंथों से इसका कोई सुबूत नहीं मिलता। कुछ मजहब खुदा को सशरीर मानते हैं। लेकिन यह भी एक गलत मान्यता है।  दरअसल अल्लाह का निराकार होना लोगों की अक्ल में नहीं समाता और उपरोक्त मान्यताएं इसी कन्फ्यूजन का परिणाम हैं।


अल्लाह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। यह बात भी अक्सर लोगों के गले नहीं उतरती और वे उस डोर का सिरा तलाश करने में जुट जाते हैं जहां से खुदा की पैदाइश हुई है। जब वे देखते हैं कि उनके आसपास प्रत्येक प्राणी और वस्तु नश्वर है, कभी न कभी मिट जाती है तो वे अल्लाह से सम्बंधित इस गुण के बारे में कन्फ्यूज हो जाते हैं। इसलिए उसकी उत्पत्ति और अंत के बारे में बहुत सी गलत मान्यताएं प्रचलित हो गयीं। कुछ लोग उसकी उत्पत्ति कमल नाल से मानने लगे तो कुछ ने उसका भी वंश चला दिया। जिसमें एक ईश्वर मिटता है तो दूसरा पैदा हो जाता है। कहीं पर ये मान्यता प्रचलित हो गयी कि मनुष्य जैसे प्राणियों को दूसरे प्राणियों ने बनाया और उन प्राणियों को पुन: दूसरे प्राणियों ने बनाया और इस तरह यह क्रम चलता रहता है।


अल्लाह छुपी हुई बातों को जानता है। किसी प्राणी के मस्तिष्क में कौन से विचार उमड़ रहे हैं और कौन से विचार पैदा होने वाले हैं सबसे वह भली भाँती वाकिफ है। ईश्वर का यह गुण भी कुछ समझ में नहीं आता कि इधर मनुष्य के मस्तिष्क में कोई बात आयी और उधर ईश्वर को मालूम हो गयी। यह कुछ तर्कसंगत नहीं मालूम होता।


अल्लाह हर तरह के जज्ब़ात से बेनियाज़ है। उसे न तो जोश आता है, न क्रोध । न वह खुश होता है न नाराज। न उसे किसी से ईर्ष्या होती है और न ही उसे कोई गम सताता है। न सृष्टि के निर्माण में उसने गर्व का अनुभव किया है और न कोई चीज नष्ट होने पर उसे अफसोस होता है। यानि कोई भी भावना उसे उत्तेजित नहीं कर सकती। अल्लाह का भावनाहीन होना भी तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि बहुत से धर्मग्रंथों में इस तरह की कहानियां मिलती हैं जब उसने किसी बन्दे से खुश होकर उसे बहुत कुछ प्रदान कर दिया और किसी जाति से अप्रसन्न होकर प्रलय मचा दी और वह पूरी की पूरी जाति नष्ट हो गयी। हज़रत नूह पैगम्बर के वक्त में आया तूफान इसका उदाहरण है। अगर अल्लाह में क्रोध या प्रसन्न होने की भावना नहीं होती तो क्यों वह इस तरह की घटनाओं को घटित करता है? सृष्टि की रचना के पीछे उसका उद्देश्य क्या है? इस प्रकार के बहुत से सवालों के कारण उसका भावनारहित होना अक्ल से परे हो जाता है।


अगला तर्कसंगत न प्रतीत होने वाला गुण ये है कि वह अनन्त गुणों का स्वामी है। अक्ल से परे लगने वाली बात इसमें ये है कि गुण हम चाहे जितना गिन लें, कहीं न कहीं ये गिनती खत्म हो जायेगी। न्यायप्रियता, ज्ञान, शक्ति इत्यादि शुमार करते चले जाईए। आखिर में हमारे पास शुमार करने के लिए कोई गुण नहीं बचेगा। फिर अल्लाह किसी तरह अनन्त गुणों का स्वामी हो सकता है?


खुदा को सृष्टि की रचना मेंं किसी भी तरह की हरकत की जरूरत नहीं पड़ी। और न ही वह सृष्टि को चलाने के लिए गति करता है। वह बस इरादा करता है और किसी भी तरह का काम अपने अंजाम को पहुंच जाता है। उसका यह गुण भी कुछ विषम प्रतीत होता है। क्योंकि हमें कोई भी कार्य करने के लिए हाथ पैर हिलाने पड़ते हैं, गति करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए बातचीत करने के लिए होंठ हिलाने पड़ेंगे। फोन पर बात करने के लिए नम्बर मिलाना पड़ेगा। कहीं जाने के लिए कदमों का इस्तेमाल करना पड़ता है। जबकि अल्लाह तो जिस्म भी नहीं रखता। बिना किसी हरकत के किस तरंह वह कार्यों को अंजाम दे देता है यह बात कुछ पल्ले नहीं पड़ती।


इसी तरह खुदा को कोई चीज ईजाद करने के लिए किसी चिंतन या कल्पना करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि कोई चीज वजूद में आये, उसे उसका ज्ञान रहता है। यह गुण भी अक्ल को कुछ विषम सा प्रतीत होता है। क्योंकि मानव अगर कोई आविष्कार करता है तो उसके पीछे बरसों की रिसर्च और पूर्व प्रयोगों का दखल रहता है। पहले वह आविष्कार की कल्पना करता है, उसकी जरूरत महसूस करता है। फिर यह कैसे हो सकता है कि खुदा बिना किसी चिंतन या कल्पना के कोई वस्तु निर्मित कर ले?


विवादास्पद गुणों के स्पष्टीकरण : इस तरह हम देखते हैं कि खुदा से सम्बंधित ये गुण ऐसे हैं जो प्रथम दृष्टि में तर्कसंगत नहीं प्रतीत होते हैं और इनका चिंतन करने वाला उलझनों के जाल में फंसकर सही रास्ते से भटक जाता है और कुछ का कुछ समझने लगता है। जिसमें काफी कुछ उसके अधूरे ज्ञान का भी दखल रहता है। अल्लाह के बारे में फैले अनगिनत भ्रम भी इसके जिम्मेदार होते हैं। और गैर साइंटिफिक चिंतन भी अक्सर गलत परिणाम दे देता है। मैं इस बात का दावा तो नहीं करता कि मेरे विचार शत प्रतिशत सही हैं। लेकिन मैं एक रास्ता जरूर सुझा रहा हूं। यह रास्ता है धर्मग्रंथों के बारे में और खुदा के बारे में साइंटिफिक तरीके से चिंतन। क्योंकि वैज्ञानिक अपना चिंतन इस दिशा में बहुत कम करता है और उसकी रिसर्च ईश्वर से अलग होती है। हालांकि इस कथन के अपवाद हैं। कई महान वैज्ञानिक और फिलास्फर अल्लाह के बारे में चिंतन मनन कर चुके हैं। लेकिन बहरहाल हर मनुष्य एक अलग तरीके से सोचता है। दूसरी बात ये है कि साइंस लगातार डेवलप होती रहती है। पुराने नियम खंडित होते हैं नये बनते हैं। किसी बात को सिद्ध करने के लिए नये नये उदाहरण सामने आते हैं। स्पष्ट है कि आज से पचास वर्ष पहले अगर वैज्ञानिक कोई निष्कर्ष निकाल चुके हैं तो आज वर्तमान में वे गलत सिद्ध हो सकते हैं।


तो अब एक एक कर अल्लाह से सम्बंधित उन गुणों को लेते हैं जो मानव मन में सैंकड़ों सवाल पैदा कर देते हैं।



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इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों का सम्मेलन

समस्त मनुष्यों के लिए आर्थिक गतिविधियां, स्फ़ूर्ति, रचनात्मकता और परिपूर्णता का कारण बनती है। समाज की आधी जनसंख्या के रूप में महिलाएं भी इसी प्रकार का अधिकार रखती हैं। महिलाएं आर्थिक गतिविधियों और प्रयासों द्वारा अपनी क्षमताओं को बढ़ाकर समाज और पारिवारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए प्रभावी और सार्थक भूमिका निभाने में सक्षम हो जाती हैं। अलबत्ता इसी के साथ सरकारों को भी विभिन्न आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की क्षमताओं से लाभ उठाने के लिए कार्यक्रम बनाना चाहिए।


आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक क्षेत्रों और अन्य समस्त क्षेत्रों में महिलाओं को आगे बढ़ाना, महिलाओं की क्षमताओं से लाभ उठाने के लिए मुख्य क़दम है। इसीलिए इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन ओआईसी ने महिलाओं के स्थान को ऊंचा उठाने के उद्देश्य से इस्लामी देशों में महिलाओं की स्थिति की समीक्षा करने के लिए विभिन्न सम्मेलनों का आयोजन किया। इन सम्मेलनों में वर्ष 2005 में इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों के विदेशमंत्रियों ने यमन में निर्णय किया कि अर्थव्यवस्था और परिवार के क्षेत्रों में महिलाओं के स्थान को बढ़ाने के लिए इस संगठन की महिला मंत्रियों का सम्मेलन आयोजित करेंगे। इसका पहला सम्मेलन तुर्की में और दूसरा क़ाहिरा में आयोजित हुआ था। दूसरे सम्मेलन में ईरान के प्रतिनिधियों की ओर से वर्ष 2010 में तेहरान में इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों के तीसरे सम्मेलन के आयोजन का प्रस्ताव रखा गया जो सर्वसम्मति से पारित हो गया।


19 दिसम्बर को इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों का तीसरा सम्मेलन तेहरान में आरंभ हुआ और तीन दिनों तक जारी रहा। इस तीन दिसवीय सम्मेलन में 20 महिला मंत्रियों सहित इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों के 43 प्रतिनिधि सम्मलित हुए। इस सम्मेलन का मुख्य विषय था महिला, परिवार और अर्थव्यवस्था। यह विषय, इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के दस वर्षीय क्रियाकलापों और इस्लामी मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न राजनैतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं के विकास के आधार पर चुना गया था। इस सम्मेलन में समीक्षा किए जाने वाले बिन्दुओं में से एक मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि और उपभोग मानक में सुधार था। प्रस्तुत किए गये अन्य विषयों में से एक वैश्विक आर्थिक संकट से उत्पन्न होने वाली हानियों और इस्लामी देशों में महिलाओं के आर्थिक और राजनैतिक परिवर्तनों में होने वाली हानियों को कम करना है। इस परिधि में फ़िलिस्तीन, पाकिस्तान, इराक़ और दूसरे मुसलमान देशों की महिलाओं को होने वाली हानियों को कम करने के उपायों को बयान करना और समीक्षा करना है। इसी प्रकार इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों और प्रतिनिधियों ने इस्लामी देशों की एकता, आर्थिक क्षेत्रों और कारकों की समीक्षा करते हुए मुसलमान महिलाओं की भागीदारी और विकास के विषय पर भाषण दिए।


राष्ट्रपति डाक्टर महमूद अहमदी नेजाद ने इस सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में महिला, परिवार और अर्थव्यवस्था को महत्त्वपूर्ण तत्व और समाज के कल्याण का कारण बताया और कहा कि महिला, परिवार के गठन का मुख्य बिन्दु और तत्व है। कृपाशील होना, सुख शांति प्रदान करना और प्रबंधक व प्रशिक्षण तीन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में महिलाओं की मुख्य भूमिका उल्लेखनीय है। राष्ट्रपति ने महिलाओं पर पश्चिम की भौतिक दृष्टि की ओर संकेत करते हुए कहा कि हालिया दशक में वर्चस्ववादियों और सम्राज्यवादियों ने महिलाओं का अपमान करने का प्रयास किया है और उन्होंने उनके विकास और परिपूर्णता तक पहुंचने के मार्ग में बाधाएं उत्पन्न की है और परिवार को तोड़ने का प्रयास किया ताकि महिलाओं के प्रेम और स्नेह के स्रोत को समाप्त कर दें और महिलाओं के मुख्य मोर्चे को ध्वस्त कर दें। इसके विपरीत राष्ट्रपति ने इस्लामी देशों की महिलाओं की भूमिका को सामाजिक गतिविधियों और परिवार में महिलाओं के वास्तविक स्थान और हस्तियों को पुनर्जिवित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण बताया और कहा कि इस्लामी देशों और बहुत से देशों की महिलाएं, मानवीय और ईश्वरीय विचार धाराओं पर आधारित शक्तिशाली विचारधारा और वैचारिक आधारभूत संरचना से संपन्न हैं।


महिलाएं लक्ष्यों से भलिभांति अवगत हैं और हज़रत मरियम, हज़रत ख़दीजा और हज़रत फ़ात्मा सलामुल्लाह अलैहा जैसी महिलाओं के आदर्श को अपनाए हुए हैं।


इस समय महिलाओं को पहले से अधिक अपनी पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक भूमिकाओं के मध्य गम्भीर समन्वय की आवश्यकता है। राष्ट्रपति कार्यालय में परिवार और महिला मामलों के केन्द्र की प्रमुख डाक्टर मरियम मुजतहिद ज़ादे ने इस सम्मेलन में आर्थिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि का लक्ष्य आर्थिक प्रगति से बढ़कर बताया और इसका लक्ष्य को सक्रिय और लचकदार मानवीय संपत्ति को उत्पन्न करना बताया और कहा कि समाज में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक उपस्थिति को कभी भी ऐसा नहीं होना चाहिए कि वो व्यक्तिगत सुरक्षा और परिवार में महिलाओं की भूमिका को ख़तरे में डाल दे। मुसलमान महिलाओं को मातृत्व और पत्नी की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर बल देते हुए अपनी योग्यताओं और इस्लामी मूल्यों पर भरोसा करते हुए अर्थ व्यवस्था के ढांचे में गतिविधियां करनी चाहिए।


इस्लामी समाज में यौन भेदभाव से मुक़ाबला करना, महिलाओं में जागरूकता बढ़ाना, उनकी समस्याओं का समाधान करना, यह सब महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ करने की ओर बढ़ाए गये क़दमों में से है। इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के महासचिव अकमलुद्दीन एहसान ओग़लू ने महिला मंत्रियों के सम्मेलन में इस बात की ओर संकेत करते हुए कि इस्लामी जगत की लगभग आधी जनसंख्या मुसलमान महिलाओं की है, कहा कि बहुत सी संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील भूमिका के रूप में महिलाओं की भूमिका को ध्यान में रखना आवश्यक है। इस्लामी देशों की कार्यवाहियां, महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव को मिटाने और उसके विकास और प्रगति में आने वाली बाधाओं को समाप्त करने के लिए होनी चाहिए।


उन्होंने यह बयान करते हुए कि अधिकतर महिलाएं जल्दबाज़ी में किए गये फ़ैसलों, भ्रांतियों और समाज पर छाए नकारात्मक संस्कारों की बलि चढ़ती हैं, स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति उत्पन्न की जानी चाहिए कि पर्याप्त शिक्षाओं और वर्तमान विज्ञान तक महिलाओं की पहुंच सरल बनाई जाए ताकि इस माध्यम से समस्याओं का समाधान किया जाए।


वैज्ञानिक स्तर पर महिलाओं की क्षमताओं को विकसित करना, उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए उठाए गए क़दमों में से एक क़दम है। आज़रबाईजान गणराज्य के प्रतिनिधि मण्डल की प्रमुख सदाक़त क़हरमानू ने इस सम्मेलन में महिलाओं के शिक्षण और वैज्ञानिक स्तर को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि प्रगति और विकास की परिधि में महिलाओं में पायी जाने वाली क्षमताओं को सक्रिय करने के लिए पहला क़दम, विज्ञान, उद्योग, अर्थव्यवस्था और राजनैतिक विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के वैज्ञानिक स्तर को ऊपर उठाना है।


क़हरमानुवा ने इस बात को बयान करते हुए कि महिलाएं, प्रेम, संवेदना और अन्य ईश्वरीय अनुकंपाओं से लाभ उठाते हुए श्रेष्ठ मनुष्यों के प्रशिक्षण में सफलता से कार्य कर सकती हैं, कहा कि शिक्षित महिलाएं और समाज की बुद्धजीवी महिलाएं, अपने ज्ञान से लाभ उठाते हुए समाज की अगली पीढ़ी को बहुत अच्छे ढंग से प्रशिक्षित कर सकती हैं।


इसी आधार पर महिलाओं की क्षमताओं को व्यवहारिक बनाने के लिए महिलाओं को शिक्षित करना अति आवश्यक है। खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि आज़रबाईजान गणतंत्र सहित कुछ देशों ने महिलाओं की धार्मिक गतिविधियों को सीमित करके विशेषकर हेजाब पर प्रतिबंध लगाकर व्यवहारिक रूप से उनके ज्ञान संबंधी विकास में गम्भीर बाधाएं उत्पन्न कर दी हैं।


सर्वकालिक धर्म इस्लाम में महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों और उनके कार्य करने में किसी भी प्रकार की रोक टोक नहीं है। इस युक्ति के साथ कि मुसलमान महिलाओं का कार्य और उनकी गतिविधियां महिलाओं और उनके परिवार के अनुरूप होनी चाहिए। मिस्र की सर्वोच्च महिला परिषद की सचिव श्रीमति फ़रखुंदेह मुहम्मद हसन मुसलमानों की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों में इस्लामी मूल्यों की रक्षा और इस्लामी सिद्धांतों पर कटिबद्धता पर बल देते हुए कहती हैं कि इस्लामी मूल्यों की रक्षा के साथ महिलाओं के कार्य करने या उनके द्वारा आर्थिक गतिविधियों संलग्न होने में किसी भी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। इस्लाम के आरंभिक काल में आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति का स्पष्ट उदाहरण पैग़म्बरे इस्लाम (स) की प्रिय पत्नी हज़रत ख़दीजा हैं। ईरान उन सफल देशों में से है जिसने ईरानी महिलाओं के स्थान को पहचनवाने और उनको पहचान प्रदान करने में बड़ी सफलता प्राप्त की है। यह सफलता इस्लाम धर्म की उच्च शिक्षाओं के पालन, स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह हिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई के मार्ग दर्शक बयानों की अनुकंपाओं की छत्रछाया में प्राप्त की गई है। इसीलिए प्रबंधन, अर्थव्यवस्था, राजनीति, विज्ञान, सांस्कृति और व्यायाम के विभिन्न क्षेत्रों में ईरानी महिलाएं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।


वर्तमान समय में ईरान में महिलाएं सरकार, संसद और प्रबंधन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से उपस्थित हैं। इसी प्रकार ईरान के विश्वविद्यालयों में छात्राओं की संख्या 60 प्रतिशत है। इसीलिए बहुत से पश्चिमी बुद्धिजीवियों ने यह स्वीकार किया है कि इस्लामी जगत में महिलाओं के लिए उचित आदर्श ईरानी महिलाएं हैं। तेहरान में इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन की महिला मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने वाली श्रीमति फ़रखुंदह मुहम्मद हसन सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में ईरानी महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहती हैं कि हमको खुलकर यह मान लेना चाहिए कि ईरानी महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका और उपस्थिति ने हमें आश्चर्य चकित कर दिया है। सामाज और इस्लामी मूल्यों की रक्षा सहित महिलाओं की जिस भूमिका पर भी हम आस्था रखते हैं उसका व्यवहारिक और स्पष्ट उदाहरण ईरानी महिलाएं हैं।


इस्लामी कांफ़्रेंस संगठन के सदस्य देशों की महिला मंत्रियों का तीसरा सम्मेलन 42 अनुच्छेदों पर आधारित घोषणापत्र पारित करके समाप्त हो गया। इस घोषणापत्र में परिवार और समाज में महिलाओं का विकास, इस्लामी देशों में विकास और प्रगति के महत्त्वपूर्ण तत्वों में बताया गया है। इसके अतिरिक्त घोषणापत्र का मुख्य विषय यह है कि परिवार और समाज दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका को पुनर्जिवित करने के लिए ऐसी अर्थव्यवस्था उत्पन्न की जाए जिसमें परिवार को मुख्य केन्द्र और ध्रुव माना गया हो। इसी प्रकार इस घोषणापत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक सम्मान रूप से पहुंच, हिंसा के मुक़ाबले में समर्थन और सहायता प्राप्त होना और फ़ैसले की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष रूप से बल दिया गया है।


घोषणा पत्र में इस्लामी देशों की महिला मंत्रियों और उपस्थित लोगों ने समस्त सदस्य देशों में पीड़ित महिलाओं और बच्चों से सहृदयता व्यक्त करते हुए फ़िलिस्तीनी बच्चों और महिलाओं के अधिकारों को स्वीकार करने और उनको उनके अधिकार दिलवाने पर बल दिया।


साभार: इस्लामी धर्म एकता परिषद


अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें (पार्ट-12)

धर्मग्रंथों में स्पष्ट कथन मिलता है कि उसने सृष्टि में हर वस्तु की रचना की और उसे उसके टाइम के हवाले किया। यानि कोई प्राणी विशेष पैदा होगा लेकिन अपने वक्त पर। तारों का नोवा बनना और फिर सुपरनोवा बनना अपने वक्त पर होता है, जिसके हवाले यह घटना की जाती है। फूलों का खिलना, कोई वैज्ञानिक आविष्कार या कोई नयी खोज सब कुछ अपने वक्त पर होता है।



यहां पर मानवीय निर्माण और ईश्वरीय निर्माण के बीच एक अन्तर स्पष्ट करना जरूरी है। जब मानव कोई रचना करता है या कोई नया आविष्कार करता है तो उसके आगे कोई उदाहरण मौजूद रहता है। जब उसने बिजली के बल्ब का आविष्कार किया तो उसके सामने गर्म लोहे का उदाहरण था जो कि बहुत ज्यादा ताप मिलने पर लाल होकर प्रकाश देने लगता है। जब मनुष्य ने विद्युत बनायी तो आकाशीय विद्युत का उदाहरण उसके सामने था। पहिए का उदाहरण उसने लकड़ी के गोल लट्‌ठों से लिया। तो कम्प्यूटर का उदाहरण उसने स्वयं के मस्तिष्क से लिया। लेकिन जब अल्लाह ने सृष्टि का निर्माण किया तो उसके सामने कोई उदाहरण पहले से मौजूद नहीं था। क्योंकि सृष्टि से पहले केवल शून्य था, जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है। इसलिए उसने अपनी रचनाओं की किसी से तुलना नहीं की। दूसरा अन्तर ये है कि हम अपने आविष्कारों में वक्त के और पूर्व खोजों के मोहताज रहे हैं। टेलीविजन से पहले पिक्चर ट्‌यूब का आविष्कार हुआ। अगर टेलीफोन और कम्प्यूटर का आविष्कार नहीं होता तो इंटरनेट का निर्माण भी नहीं हो पाता। यानि हर आविष्कार अपने पूर्व आविष्कारों पर निर्भर है। लेकिन अल्लाह की खिलकत इस तरह की नहीं है। उसने सृष्टि की तुच्छ से तुच्छ और बड़ी से बड़ी रचना सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही कर ली थी। और उन्हें उनके समय के साथ कर दिया था। जब वह समय आ गया तो उसके साथ वह रचनाएं भी वास्तविक रूप में आ गयीं। इन कथनों में लोगों को विरोधाभास मिल सकता है लेकिन इसका कारण यही है कि हम सभी बातों की टाइम के साथ तुलना करते हैं। उन नियमो को दृष्टि में रखते हुए जो टाइम पर निर्भर हैं। लेकिन टाइम से अलग हट कर विचार करने पर उपरोक्त विरोधाभास गायब हो जायेंगे।


बात चली है टाइम की तो इससे सम्बंधित कुछ और बातों पर विचार कर लिया जाये। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि टाइम की उत्पत्ति उसी समय हुई जब इस सृष्टि की रचना हुई। और उसी समय दिशाएँ या डाइमेंशन भी बनीं। चूंकि इन सब की रचना शून्य से हुई इसलिए इनका भी निगेटिव होना चाहिए। यानि टाइम के साथ साथ उसका निगेटिव टाइम भी अस्तित्व में होना चाहिए।


अगर हम यूनिवर्स में कहीं भी दृष्टि दौड़ाएं तो निगेटिव टाइम के दर्शन नहीं होते, और हो भी नहीं सकता। क्योंकि हम जिस वातावरण में रह रहे हैं वह टाइम का वातावरण है। जो भी गणनाएं करते हैं, जो भी अवलोकन करते हैं वह टाइम के सापेक्ष होता है। गैलेक्सीज की स्थिति टाइम के सापेक्ष देखी जाती है। आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी में टाइम के सापेक्ष पोजीशन को दर्शाते हैं। टाइम हर पोजीशन का आवश्यक अंग है। लम्बाई चौड़ाई और गहराई के बाद वह पोजीशन की चौथी डाइमेंशन है। स्पष्ट है कि जो स्थितियां और वस्तुएं निगेटिव टाइम में होंगी उनका अवलोकन हमारे लिए असंभव है क्योंकि वहां से किसी भी प्रकार का विकिरण या कोई अन्य चिन्ह् अगर यूनिवर्स में हमारी स्थितियों के पास आता है तो उसे अपने टाइम के विरूद्ध चलना पड़ेगा। जबकि खुदा स्पष्ट कहता है कि उसने हर चीज को उसके टाइम के हवाले किया। प्रश्न उठता है कि फिर कैसे पता किया जाये कि उस निगेटिव टाइम की स्थितियों में क्या है? इसके उत्तर के अनुमान के लिए एक बार फिर उसी नियम की शरण में जाना पड़ेगा कि हर वस्तु का एक निगेटिव होता है। इसके बारे में धर्मग्रंथों में भी खुदा स्पष्ट रूप से कह रहा है, ‘‘हमने हर चीज में जोड़े पैदा किये।’’ तो सृष्टि की रचना के साथ पदार्थ बना और उसके साथ साथ एण्टी मैटर। लेकिन यूनिवर्स में मैटर तो दिखाई देता है, एण्टीमैटर कहीं नहीं। और दिखाई भी कैसे पड़ेगा, वह तो शायद उस दुनिया में है जहां निगेटिव टाइम वक्त को दर्शाता है। अगर इस बात को और स्पष्ट किया जाये तो सम्पूर्ण पदार्थ की स्थिति निगेटिव टाइम की डाइमेंशन में है। अब अगर निगेटिव टाइम में एण्टी मैटर से सम्बंधित कोई भी घटना घटित होगी तो वह हमें नहीं ज्ञात हो सकती। इसी प्रकार यहां घटने वाली कोई घटना एण्टी मैटर क्षेत्र में नहीं देखी जा सकती। इन घटनाओं को वही देख सकता है जो ज्ञान में अपनी मिसाल आप है यानि खुदा। और यूनिवर्स में इस प्रकार का तारतम्य, उसका सममित (Symmetric) होना और घटनाओं का एक क्रम में घटना ईश्वर के अस्तित्व का पूरा पूरा प्रमाण है।


ये थे कुछ विरोधाभासों के स्पष्टीकरण जो अक्सर अल्लाह के बारे में सामने आते हैं। कभी नास्तिकों के साथ बहस में तो कभी स्वयं आस्था रखने वालों के मस्तिष्क में चकराने लगते हैं। और चकराते मस्तिष्क के बीच आस्तिक का विश्वास डाँवाडोल होने लगता है। वह सोचने लगता है कि कहीं ईश्वर को मानकर वह गलती तो नहीं कर रहा है। यह दुनिया तो केवल प्रकृति के नियमों पर चल रही है। लेकिन यह नियम किसने बनाये? प्रकृति को किसने रचा? इस प्रकृति को, उसके नियमों को बनाने वाला खुद अल्लाह है। साइंस उन नियमों का अध्ययन कर लेती है लेकिन नियमों को बनाने वाले के प्रति मौन रहती है। वास्तव में हर सिद्धान्त का रचयिता सिर्फ और सिर्फ अल्लाह है।



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