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अल्लाह का वजूद – साइंस की दलीलें (पार्ट-12)

धर्मग्रंथों में स्पष्ट कथन मिलता है कि उसने सृष्टि में हर वस्तु की रचना की और उसे उसके टाइम के हवाले किया। यानि कोई प्राणी विशेष पैदा होगा लेकिन अपने वक्त पर। तारों का नोवा बनना और फिर सुपरनोवा बनना अपने वक्त पर होता है, जिसके हवाले यह घटना की जाती है। फूलों का खिलना, कोई वैज्ञानिक आविष्कार या कोई नयी खोज सब कुछ अपने वक्त पर होता है।



यहां पर मानवीय निर्माण और ईश्वरीय निर्माण के बीच एक अन्तर स्पष्ट करना जरूरी है। जब मानव कोई रचना करता है या कोई नया आविष्कार करता है तो उसके आगे कोई उदाहरण मौजूद रहता है। जब उसने बिजली के बल्ब का आविष्कार किया तो उसके सामने गर्म लोहे का उदाहरण था जो कि बहुत ज्यादा ताप मिलने पर लाल होकर प्रकाश देने लगता है। जब मनुष्य ने विद्युत बनायी तो आकाशीय विद्युत का उदाहरण उसके सामने था। पहिए का उदाहरण उसने लकड़ी के गोल लट्‌ठों से लिया। तो कम्प्यूटर का उदाहरण उसने स्वयं के मस्तिष्क से लिया। लेकिन जब अल्लाह ने सृष्टि का निर्माण किया तो उसके सामने कोई उदाहरण पहले से मौजूद नहीं था। क्योंकि सृष्टि से पहले केवल शून्य था, जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है। इसलिए उसने अपनी रचनाओं की किसी से तुलना नहीं की। दूसरा अन्तर ये है कि हम अपने आविष्कारों में वक्त के और पूर्व खोजों के मोहताज रहे हैं। टेलीविजन से पहले पिक्चर ट्‌यूब का आविष्कार हुआ। अगर टेलीफोन और कम्प्यूटर का आविष्कार नहीं होता तो इंटरनेट का निर्माण भी नहीं हो पाता। यानि हर आविष्कार अपने पूर्व आविष्कारों पर निर्भर है। लेकिन अल्लाह की खिलकत इस तरह की नहीं है। उसने सृष्टि की तुच्छ से तुच्छ और बड़ी से बड़ी रचना सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही कर ली थी। और उन्हें उनके समय के साथ कर दिया था। जब वह समय आ गया तो उसके साथ वह रचनाएं भी वास्तविक रूप में आ गयीं। इन कथनों में लोगों को विरोधाभास मिल सकता है लेकिन इसका कारण यही है कि हम सभी बातों की टाइम के साथ तुलना करते हैं। उन नियमो को दृष्टि में रखते हुए जो टाइम पर निर्भर हैं। लेकिन टाइम से अलग हट कर विचार करने पर उपरोक्त विरोधाभास गायब हो जायेंगे।


बात चली है टाइम की तो इससे सम्बंधित कुछ और बातों पर विचार कर लिया जाये। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि टाइम की उत्पत्ति उसी समय हुई जब इस सृष्टि की रचना हुई। और उसी समय दिशाएँ या डाइमेंशन भी बनीं। चूंकि इन सब की रचना शून्य से हुई इसलिए इनका भी निगेटिव होना चाहिए। यानि टाइम के साथ साथ उसका निगेटिव टाइम भी अस्तित्व में होना चाहिए।


अगर हम यूनिवर्स में कहीं भी दृष्टि दौड़ाएं तो निगेटिव टाइम के दर्शन नहीं होते, और हो भी नहीं सकता। क्योंकि हम जिस वातावरण में रह रहे हैं वह टाइम का वातावरण है। जो भी गणनाएं करते हैं, जो भी अवलोकन करते हैं वह टाइम के सापेक्ष होता है। गैलेक्सीज की स्थिति टाइम के सापेक्ष देखी जाती है। आइंस्टीन की थ्योरी आफ रिलेटिविटी में टाइम के सापेक्ष पोजीशन को दर्शाते हैं। टाइम हर पोजीशन का आवश्यक अंग है। लम्बाई चौड़ाई और गहराई के बाद वह पोजीशन की चौथी डाइमेंशन है। स्पष्ट है कि जो स्थितियां और वस्तुएं निगेटिव टाइम में होंगी उनका अवलोकन हमारे लिए असंभव है क्योंकि वहां से किसी भी प्रकार का विकिरण या कोई अन्य चिन्ह् अगर यूनिवर्स में हमारी स्थितियों के पास आता है तो उसे अपने टाइम के विरूद्ध चलना पड़ेगा। जबकि खुदा स्पष्ट कहता है कि उसने हर चीज को उसके टाइम के हवाले किया। प्रश्न उठता है कि फिर कैसे पता किया जाये कि उस निगेटिव टाइम की स्थितियों में क्या है? इसके उत्तर के अनुमान के लिए एक बार फिर उसी नियम की शरण में जाना पड़ेगा कि हर वस्तु का एक निगेटिव होता है। इसके बारे में धर्मग्रंथों में भी खुदा स्पष्ट रूप से कह रहा है, ‘‘हमने हर चीज में जोड़े पैदा किये।’’ तो सृष्टि की रचना के साथ पदार्थ बना और उसके साथ साथ एण्टी मैटर। लेकिन यूनिवर्स में मैटर तो दिखाई देता है, एण्टीमैटर कहीं नहीं। और दिखाई भी कैसे पड़ेगा, वह तो शायद उस दुनिया में है जहां निगेटिव टाइम वक्त को दर्शाता है। अगर इस बात को और स्पष्ट किया जाये तो सम्पूर्ण पदार्थ की स्थिति निगेटिव टाइम की डाइमेंशन में है। अब अगर निगेटिव टाइम में एण्टी मैटर से सम्बंधित कोई भी घटना घटित होगी तो वह हमें नहीं ज्ञात हो सकती। इसी प्रकार यहां घटने वाली कोई घटना एण्टी मैटर क्षेत्र में नहीं देखी जा सकती। इन घटनाओं को वही देख सकता है जो ज्ञान में अपनी मिसाल आप है यानि खुदा। और यूनिवर्स में इस प्रकार का तारतम्य, उसका सममित (Symmetric) होना और घटनाओं का एक क्रम में घटना ईश्वर के अस्तित्व का पूरा पूरा प्रमाण है।


ये थे कुछ विरोधाभासों के स्पष्टीकरण जो अक्सर अल्लाह के बारे में सामने आते हैं। कभी नास्तिकों के साथ बहस में तो कभी स्वयं आस्था रखने वालों के मस्तिष्क में चकराने लगते हैं। और चकराते मस्तिष्क के बीच आस्तिक का विश्वास डाँवाडोल होने लगता है। वह सोचने लगता है कि कहीं ईश्वर को मानकर वह गलती तो नहीं कर रहा है। यह दुनिया तो केवल प्रकृति के नियमों पर चल रही है। लेकिन यह नियम किसने बनाये? प्रकृति को किसने रचा? इस प्रकृति को, उसके नियमों को बनाने वाला खुद अल्लाह है। साइंस उन नियमों का अध्ययन कर लेती है लेकिन नियमों को बनाने वाले के प्रति मौन रहती है। वास्तव में हर सिद्धान्त का रचयिता सिर्फ और सिर्फ अल्लाह है।



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