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अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-13)

खुदा से सम्बंधित विवादास्पद गुण :


विरोधाभासों के स्पष्टीकरण के बाद हम खुदा से सम्बंधित उन गुणों का अध्ययन करते हैं जो विवादास्पद माने जाते हैं। ऐसे गुण जो किसी मनुष्य की अक्ल में नहीं समा पाते और इस वजह से वह यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ईश्वर वास्तव में है या नहीं? क्योंकि उसे वह गुण तर्कसंगत नहीं मालूम होते।


कुछ इस तरह के तर्कसंगत न प्रतीत होने वाले गुण इस प्रकार हैं :


अल्लाह का कोई आकार या रूप नहीं है। वह निराकार है और किसी को दिखाई नहीं देगा। हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार वह कयामत के रोज दिखाई देगा। लेकिन यह मान्यता बेबुनियाद है और कुछ धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी गयी गलतफहमी का परिणाम है। धर्मग्रंथों से इसका कोई सुबूत नहीं मिलता। कुछ मजहब खुदा को सशरीर मानते हैं। लेकिन यह भी एक गलत मान्यता है।  दरअसल अल्लाह का निराकार होना लोगों की अक्ल में नहीं समाता और उपरोक्त मान्यताएं इसी कन्फ्यूजन का परिणाम हैं।


अल्लाह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। यह बात भी अक्सर लोगों के गले नहीं उतरती और वे उस डोर का सिरा तलाश करने में जुट जाते हैं जहां से खुदा की पैदाइश हुई है। जब वे देखते हैं कि उनके आसपास प्रत्येक प्राणी और वस्तु नश्वर है, कभी न कभी मिट जाती है तो वे अल्लाह से सम्बंधित इस गुण के बारे में कन्फ्यूज हो जाते हैं। इसलिए उसकी उत्पत्ति और अंत के बारे में बहुत सी गलत मान्यताएं प्रचलित हो गयीं। कुछ लोग उसकी उत्पत्ति कमल नाल से मानने लगे तो कुछ ने उसका भी वंश चला दिया। जिसमें एक ईश्वर मिटता है तो दूसरा पैदा हो जाता है। कहीं पर ये मान्यता प्रचलित हो गयी कि मनुष्य जैसे प्राणियों को दूसरे प्राणियों ने बनाया और उन प्राणियों को पुन: दूसरे प्राणियों ने बनाया और इस तरह यह क्रम चलता रहता है।


अल्लाह छुपी हुई बातों को जानता है। किसी प्राणी के मस्तिष्क में कौन से विचार उमड़ रहे हैं और कौन से विचार पैदा होने वाले हैं सबसे वह भली भाँती वाकिफ है। ईश्वर का यह गुण भी कुछ समझ में नहीं आता कि इधर मनुष्य के मस्तिष्क में कोई बात आयी और उधर ईश्वर को मालूम हो गयी। यह कुछ तर्कसंगत नहीं मालूम होता।


अल्लाह हर तरह के जज्ब़ात से बेनियाज़ है। उसे न तो जोश आता है, न क्रोध । न वह खुश होता है न नाराज। न उसे किसी से ईर्ष्या होती है और न ही उसे कोई गम सताता है। न सृष्टि के निर्माण में उसने गर्व का अनुभव किया है और न कोई चीज नष्ट होने पर उसे अफसोस होता है। यानि कोई भी भावना उसे उत्तेजित नहीं कर सकती। अल्लाह का भावनाहीन होना भी तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि बहुत से धर्मग्रंथों में इस तरह की कहानियां मिलती हैं जब उसने किसी बन्दे से खुश होकर उसे बहुत कुछ प्रदान कर दिया और किसी जाति से अप्रसन्न होकर प्रलय मचा दी और वह पूरी की पूरी जाति नष्ट हो गयी। हज़रत नूह पैगम्बर के वक्त में आया तूफान इसका उदाहरण है। अगर अल्लाह में क्रोध या प्रसन्न होने की भावना नहीं होती तो क्यों वह इस तरह की घटनाओं को घटित करता है? सृष्टि की रचना के पीछे उसका उद्देश्य क्या है? इस प्रकार के बहुत से सवालों के कारण उसका भावनारहित होना अक्ल से परे हो जाता है।


अगला तर्कसंगत न प्रतीत होने वाला गुण ये है कि वह अनन्त गुणों का स्वामी है। अक्ल से परे लगने वाली बात इसमें ये है कि गुण हम चाहे जितना गिन लें, कहीं न कहीं ये गिनती खत्म हो जायेगी। न्यायप्रियता, ज्ञान, शक्ति इत्यादि शुमार करते चले जाईए। आखिर में हमारे पास शुमार करने के लिए कोई गुण नहीं बचेगा। फिर अल्लाह किसी तरह अनन्त गुणों का स्वामी हो सकता है?


खुदा को सृष्टि की रचना मेंं किसी भी तरह की हरकत की जरूरत नहीं पड़ी। और न ही वह सृष्टि को चलाने के लिए गति करता है। वह बस इरादा करता है और किसी भी तरह का काम अपने अंजाम को पहुंच जाता है। उसका यह गुण भी कुछ विषम प्रतीत होता है। क्योंकि हमें कोई भी कार्य करने के लिए हाथ पैर हिलाने पड़ते हैं, गति करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए बातचीत करने के लिए होंठ हिलाने पड़ेंगे। फोन पर बात करने के लिए नम्बर मिलाना पड़ेगा। कहीं जाने के लिए कदमों का इस्तेमाल करना पड़ता है। जबकि अल्लाह तो जिस्म भी नहीं रखता। बिना किसी हरकत के किस तरंह वह कार्यों को अंजाम दे देता है यह बात कुछ पल्ले नहीं पड़ती।


इसी तरह खुदा को कोई चीज ईजाद करने के लिए किसी चिंतन या कल्पना करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि कोई चीज वजूद में आये, उसे उसका ज्ञान रहता है। यह गुण भी अक्ल को कुछ विषम सा प्रतीत होता है। क्योंकि मानव अगर कोई आविष्कार करता है तो उसके पीछे बरसों की रिसर्च और पूर्व प्रयोगों का दखल रहता है। पहले वह आविष्कार की कल्पना करता है, उसकी जरूरत महसूस करता है। फिर यह कैसे हो सकता है कि खुदा बिना किसी चिंतन या कल्पना के कोई वस्तु निर्मित कर ले?


विवादास्पद गुणों के स्पष्टीकरण : इस तरह हम देखते हैं कि खुदा से सम्बंधित ये गुण ऐसे हैं जो प्रथम दृष्टि में तर्कसंगत नहीं प्रतीत होते हैं और इनका चिंतन करने वाला उलझनों के जाल में फंसकर सही रास्ते से भटक जाता है और कुछ का कुछ समझने लगता है। जिसमें काफी कुछ उसके अधूरे ज्ञान का भी दखल रहता है। अल्लाह के बारे में फैले अनगिनत भ्रम भी इसके जिम्मेदार होते हैं। और गैर साइंटिफिक चिंतन भी अक्सर गलत परिणाम दे देता है। मैं इस बात का दावा तो नहीं करता कि मेरे विचार शत प्रतिशत सही हैं। लेकिन मैं एक रास्ता जरूर सुझा रहा हूं। यह रास्ता है धर्मग्रंथों के बारे में और खुदा के बारे में साइंटिफिक तरीके से चिंतन। क्योंकि वैज्ञानिक अपना चिंतन इस दिशा में बहुत कम करता है और उसकी रिसर्च ईश्वर से अलग होती है। हालांकि इस कथन के अपवाद हैं। कई महान वैज्ञानिक और फिलास्फर अल्लाह के बारे में चिंतन मनन कर चुके हैं। लेकिन बहरहाल हर मनुष्य एक अलग तरीके से सोचता है। दूसरी बात ये है कि साइंस लगातार डेवलप होती रहती है। पुराने नियम खंडित होते हैं नये बनते हैं। किसी बात को सिद्ध करने के लिए नये नये उदाहरण सामने आते हैं। स्पष्ट है कि आज से पचास वर्ष पहले अगर वैज्ञानिक कोई निष्कर्ष निकाल चुके हैं तो आज वर्तमान में वे गलत सिद्ध हो सकते हैं।


तो अब एक एक कर अल्लाह से सम्बंधित उन गुणों को लेते हैं जो मानव मन में सैंकड़ों सवाल पैदा कर देते हैं।



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1 comment: Leave Your Comments

  1. जीशान भाई,

    अल्लाह रब्बुल-इज्ज़त की ज़ात से सम्बंधित इन गुणों के विश्लेषण का इंतज़ार रहेगा... बेहतरीन काम!!!

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