background img

Latest

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-14)

अल्लाह का कोई रूप या आकार नहीं है। वह निराकार है। वह किसी को दिखाई नहीं देता और न किसी को दिखाई देगा। यह बात गले से नहीं उतरती। क्योंकि कोई भी वस्तु जीवधारी या निर्जीव किसी न किसी रूप, आकार में हमें प्रभावित करता है। जो वस्तुएं नहीं भी दिखाई देतीं उन्हें वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से देखा जा सकता है। जैसे हवा नंगी आँखों से नहीं दिखाई देती लेकिन माइक्रोस्कोप की मदद से उसके अणु देखे जा सकते हैं। इलेक्ट्रान, प्रोटॉन, न्यूट्रान वगैरा को कैथोड किरण कम्पनदर्शी, विल्सन क्लाउड चैम्बर और इस प्रकार के दूसरे उपकरणों की मदद से देखा जा सकता है। कुल मिलाकर हमारे आसपास जो भी चीजें हैं उन्हें विभिन्न उपकरणों की मदद से हम देख सकते हैं। फिर अल्लाह, जिसे हर जगह मौजूद माना जाता है क्यों नहीं दिखाई देता?



अगर हम गहराई के साथ विचार करें तो इसका जवाब मिल सकता है। इस संसार में बहुत कुछ ऐसा है जो किसी भी उपकरण से नहीं देखा जा सकता। इसमें शामिल है वक्त, मानव मन में उमड़ते विचार और ऊर्जा (Energy) के विभिन्न रूप। प्रकाश के अलावा ऊर्जा किसी भी रूप में हो नहीं दिखाई देती और न ही उसका कोई आकार होता है। देखा जाये तो सिर्फ प्रकाश ही हमारी आँखों को संवेदित करता है और उसी की मदद से हम दूसरी वस्तुओं को देखते हैं। अगर कोई वस्तु प्रकाश को रोक रही है या वहां से गुजर रहा प्रकाश हमारी आँखों तक नहीं पहुंच रहा है तो वह वस्तु दिखाई नहीं देगी। इसका उदाहरण है ब्लैक होल। दूसरी ऊर्जाओं की बात की जाये तो ऊष्मा हमारी खाल को झुलसा सकती है लेकिन दिखाई नहीं देती। गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) के रूप में ऊर्जा किसी को चोट पहुंचा सकती है लेकिन उसे देखना असंभव है। ऊर्जा का कोई आकार नहीं होता। वह निराकार होती है। ऊर्जा शक्ति का एक सूक्ष्म रूप है। किसी स्थान पर शक्ति ज्यादा होने का मतलब है कि वहां ऊर्जा ज्यादा है। प्रकाश किरणों से अधिक ऊर्जा एक्स किरणों में होती है और एक्स किरणों से ज्यादा गामा किरणें शक्तिशाली होती हैं। लेकिन यह शक्ति निराकार होती है। शक्ति का कोई भी रूप निराकार होता है। अब अल्लाह के बारे में सोचा जा सकता है जो कि महाशक्ति (Super Power) है। और हर तरह की शक्तियों को उसने निर्मित किया है। जब उसकी निर्मित की हुई तुच्छ शक्तियां निराकार होती हैं तो वह स्वयं कैसे आकारयुक्त हो सकता है? उसका तो निराकार होना लाज़मी है।


वास्तव में अगर हम उसे आकारयुक्त मान लें। उसे सशरीर मान लें तो फिर वह सीमित हो जायेगा, एक दायरे में सिमट जायेगा। और फिर वह अन्य प्राणियों की तरह निराकार वस्तुओं को नहीं देख सकेगा। न उसे निराकार का रचयिता माना जा सकेगा। और जगहें उससे खाली हो जायेंगी। एक उदाहरण से यह स्पष्ट हो जायेगा। मान लिया कि मेज पर एक पेन रखा हुआ है। इस पेन का एक आकार है। पेन को हम इसलिए आकारयुक्त देख रहे हैं क्योंकि उसके आसपास का स्थान पेन के पदार्थ से खाली है। इसी खाली स्थान के सापेक्ष पेन एक निश्चित आकार में दिखाई देता है। इस तरह अगर अल्लाह को आकारयुक्त माना जायेगा तो आसपास की जगहें उससे खाली हो जायेंगी और ‘खुदा हर जगह है’ यह कथन झूठा हो जायेगा। किसी भी वस्तु का आकार सदैव सापेक्ष होता है। उसके आसपास के अन्य वातावरण को देखते हुए। ठीक उसी तरह जिस तरह एक लाइन के पास दूसरी लाइन खींच देने पर वह लाइन छोटी हो जाती है। यानि आकारयुक्त होना एक तुलनात्मक बात है और अल्लाह किसी भी तरह की तुलना से बरी है। उसे किसी भी वस्तु के सापेक्ष कम ज्यादा नहीं कहा जा सकता। इसलिए खुदा का निराकार होना ही अधिक तर्कसंगत है।


अल्लाह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। प्रथम दृष्टि में यह कथन कुछ अटपटा लगता है। क्योंकि जब हम अपने आसपास दृष्टि दौड़ाते हैं तो हर चीज नश्वर नजर आती है। और उसकी उत्पत्ति का एक सिरा मिल जाता है। कोई प्राणी कभी न कभी पैदा अवश्य होता है और एक समय बाद समाप्त हो जाता है। बड़ी बड़ी चट्‌टाने और पहाड़ भी वर्षों तक बनते हैं और एक युग बीतने के बाद समाप्त भी हो जाते हैं। यहां तक कि पृथ्वी सूर्य और तारे भी एक आयु रखते हैं और वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार एक समय आता है जब ये समाप्त हो जाते हैं।


बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि के पैदा होने का भी एक समय है। तो फिर अल्लाह के पैदा होने का कोई वक्त क्यों नहीं?


देखा जाये तो ये प्रश्न काफी उलझन भरा लगता है, लेकिन अगर हम गहराईपूर्वक विचार करें? एक वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार यूनिवर्स में समस्त द्रव्यमान व ऊर्जा का योग नियत है। इसे न तो कम किया जा सकता है और न बढ़ाया जा सकता है। इसे द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण का नियम कहते हैं। बहुत पहले ये नियम दो भागों में अलग अलग था द्रव्यमान संरक्षण का नियम और ऊर्जा संरक्षण का नियम। द्रव्यमान संरक्षण के नियम का उदाहरण है कोई रासायनिक अभिक्रिया, जिसमें अभिक्रिया के बाद नये पदार्थ बनते हैं। लेकिन अगर हम अभिक्रिया से पहले भाग लेने वाले समस्त पदार्थों का द्रव्यमान लें और अभिक्रिया के बाद बनने वाले पदार्थों का द्रव्यमान लें तो दोनों बराबर आते हैं। इस तरह द्रव्यमान न तो नष्ट होता है और न उत्पन्न किया जा सकता है। बाद में आइंस्टीन ने द्रव्यमान ऊर्जा के बीच एक नया सम्बन्ध दिया जिसमें द्रव्यमान और ऊर्जा नष्ट भी किये जा सकते हैं और उत्पन्न भी किये जा सकते हैं। हां यह जरूर है कि जितना द्रव्यमान नष्ट होता है उसके समान्तर ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण नियम की उत्पत्ति हुई जिसे नाभिकीय अभिक्रियाओं में देखा जा सकता है। इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार यूनिवर्स की समस्त ऊर्जा व द्रव्यमान का योग नियत है। तो क्या इसी के समान्तर हम यह नहीं मान सकते कि अल्लाह का वजूद नियत है? वह न तो कभी उत्पन्न हुआ और न कभी खत्म होगा।बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि प्रारम्भ में एक बिन्दु में समाहित थी। यूनिवर्स का सम्पूर्ण द्रव्यमान और ऊर्जा उस बिन्दु में मौजूद था। इससे पहले कि हम अल्लाह के बारे में सोचें कि वह कब पैदा हुआ, हमें इस समस्या पर पहले विचार करना पड़ेगा कि वह बिन्दु कहां से आया। और अगर वह बिन्दु हमेशा से था तो यह मानने में भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि अल्लाह का वजूद हमेशा से रहा है। यूनिवर्स एक बार फिर सिमटेगा और सिमटकर एक बिन्दु में समा जायेगा। लेकिन खुदा उसी तरह मौजूद रहेगा, बिना किसी तब्दीली के।


यहां ये स्पष्ट कर देना जरूरी है कि खुदा की तुलना द्रव्यमान ऊर्जा सिद्धान्त या बिग बैंग सिद्धान्त से नहीं की जा रही है। यह सब तो साधन मात्र हैं उस अजीम हस्ती के बारे में विचार करने के लिए जिसने हम सब की रचना की और विचार करने के लिए अद्भुत मस्तिष्क दिया।


उपरोक्त चिंतन से एक साइंटिफिक प्रश्न का भी उत्तर मिल सकता है। यकीनन आइंस्टीन ने द्रव्यमान-ऊर्जा संरक्षण का सिद्धान्त दिया। यानि यूनिवर्स के कुल द्रव्यमान और ऊर्जा का योग नियत है। लेकिन इस नियतांक का मान क्या है? इस बारे में यह सिद्धान्त मौन है। उदाहरण के लिए किसी रासायनिक अभिक्रिया में कोई दो पदार्थ लिये गये। जिनमें से एक का द्रव्यमान बीस ग्राम और दूसरे का दस ग्राम लिया गया। रासायनिक अभिक्रिया के बाद भी दो पदार्थ बन रहे हैं। जिनमें से अगर पहले का द्रव्यमान पन्द्रह ग्राम है तो दूसरे का भी पन्द्रह ग्राम होगा। क्योंकि द्रव्यमान संरक्षण के अनुसार अभिक्रिया से पहले का कुल द्रव्यमान अभिक्रिया के बाद के कुल द्रव्यमान के बराबर होगा। यहां पर द्रव्यमान संरक्षण का नियतांक तीस ग्राम है। सवाल उठता है कि अगर हम ब्रह्माण्ड की समस्त ऊर्जा ले लें और समस्त द्रव्यमान। तो इनका कुल योग कितना आयेगा? बहुत से लोग कह सकते हैं कि योग निकालना असंभव है। यह तो तय है कि योग निश्चित है। लेकिन कितना, यह बताना असंभव है।
लेकिन कोई भी मनुष्य इसपर आश्चर्य कर सकता है कि यह योग न केवल निश्चित है बल्कि बताया भी जा सकता है और एक विलक्षण संख्या के बराबर आता है। यह विलक्षण संख्या है शून्य अर्थात ज़ीरो। कैसे? मेरे पास इस परिणाम को लिखने की दलील है जो वैज्ञानिक रूप में भी मिलती है और धर्मग्रंथों से भी।
जैसा कि इससे पहले बिग बैंग सिद्धान्त में बताया गया है कि प्रारम्भ में समस्त द्रव्यमान और ऊर्जा एक बिन्दु में समाहित थी। ज्योमेट्री के अनुसार बिन्दु उसे कहते हैं जो विमाहीन और द्रव्यहीन होता है। उसकी कोई लम्बाई चौड़ाई या ऊंचाई नहीं होती। फिर उस बिन्दु में विस्फोट हुआ और द्रव्यमान ऊर्जा और समय की उत्पत्ति हुई। स्पष्ट है कि द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण नियम उसी समय लागू हो गया था जब बिन्दु में विस्फोट भी नहीं हुआ था। और यह साफ है कि द्रव्यमान ऊर्जा का कुल योग उस समय शून्य था। जाहिर है उपरोक्त नियम के अनुसार वह योग वर्तमान में भी शून्य रहेगा। धर्मग्रन्थ भी यही कहते हैं कि सृष्टि का निर्माण शून्य से हुआ इसलिए द्रव्यमान ऊर्जा का कुल योग सदैव से शून्य रहा है और सदैव शून्य रहेगा।
अल्लाह छिपी हुई बातों को जानता है। वह किसी भी प्राणी के विचारों तक पहुंच जाता है। और मन के छिपे हुए भेदों को जान जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कथन इसलिए युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता क्योंकि यहां ईश्वर का मानवीकरण करके देखा जाता है। फिर जो कमजोरियां मानव और दूसरे प्राणियों में होती हैं वही उसपर भी लागू कर दी जाती हैं। जबकि देखा गया है कि कई मनुष्य अपनी विलक्षण बुद्धि और तजुर्बे के बल पर सामने वाले के दिल का भेद जान लेते हैं। लेकिन यहां पर अगर हम अल्लाह का मानवीकरण करके न देखें और उसे एक महाशक्ति मान लें तो शक्ति का एक छोटा सा उदाहरण उपरोक्त कथन के लिए मजबूत दलील का कार्य करेगा।


शक्ति अर्थात ऊर्जा का एक रूप ऊष्मा है। तेज गर्मी में ताप की आँच खुले मैदानों से लेकर बन्द घरों में पहुंच जाती है। अगर बहुत ही गर्म मौसम है तो ए0सी0 जैसे उपकरण भी उस गर्मी में असमर्थ हो जाते हैं। अर्थात ऊर्जा के लिए सीमाओं का बंधन गौण होता है। गामा किरणे जो कि ऊर्जा का अन्य रूप हैं लोहे की मोटी चादरों को भी आसानी से भेद देती हैं। एक्स किरणें तो मानव शरीर को भेद कर शरीर का पूरा आंतरिक फोटोग्राफ खींच देती हैं। जब साधारण शक्तियों का यह हाल है तो महाशक्ति  जो इन शक्तियों की खालिक है, के लिए मनुष्य के विचारों तक पहुंचने के लिए भौतिक अवस्था का बंधन मानना अवैज्ञानिक है।


एक और उदाहरण जिससे यह और स्पष्ट हो जायेगा कि किस प्रकार अल्लाह छुपी हुई बातों को जानता है और मन के छुपे हुए भेदों को जान जाता है। मनुष्य ने कम्प्यूटर का आविष्कार किया। प्रत्येक कम्प्यूटर की एक मेमोरी होती है जिसमें भविष्य में किये जाने वाले सभी कार्यों का ब्योरा भी फीड रहता है। यह ब्योरा कम्प्यूटर का निर्माण करने वाला व्यक्ति या कोई अन्य एक्सपर्ट उसमें फीड करता है और इसलिए उसे पूरा ज्ञान रहता है कि कम्प्यूटर भविष्य में क्या करेगा। स्पष्ट है कि जब एक तुच्छ मनुष्य अपने बनाये उपकरण के बारे में सब कुछ जानता है कि उसकी मेमोरी में क्या है तो सम्पूर्ण सृष्टि के रचयिता के बारे में यह सवाल उठाना कि कैसे मन के भेद जानता है, कुछ जँचता नहीं।


अल्लाह क्रोध, भय, घृणा वगैरा से परे है। कोई भावना उसे उद्वेलित नहीं करती। फिर क्यों वह किसी बन्दे को नर्क की आग में फेंक देता है और किसी को स्वर्ग का सुख प्रदान कर देता है? इतिहास में और प्राचीन ग्रन्थों में ऐसी कहानियां भरी पड़ी हैं जब वह किसी मनुष्य से खुश हुआ और उसे बहुत कुछ प्रदान कर दिया। इसी तरह जब वह गज़बनाक हुआ तो पूरी की पूरी कौम खत्म हो गयी। हज़रत मूसा और उसके मानने वालों पर जब मिस्र के शासक फिरऔन के अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ गये तो एक वक्त आया जब फिरऔन को नील नदी में डुबो दिया गया। प्राचीन ऋषि मुनियों की बहुत सी कहानियां मिलती हैं जिनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ईश्वर ने उन्हें अद्भुत शक्तियों का स्वामी बना दिया। जब वह सभी भावनाओं से परे है तो ऐसा क्यों करता है वह?


इस प्रश्न का जवाब बहुत सरल है। खुदा ने कायनात बनायी। लेकिन इससे भी पहले उसने कुदरत ईजाद की। कुदरत यानि प्रकृति क्या है? यह उन नियमों और सिद्धान्तों का कलेक्शन है जो इस सृष्टि को कण्ट्रोल कर रहे हैं। पृथ्वी और दूसरे ग्रह सूर्य के गिर्द चक्कर लगा रहे हैं। यहां गुरुत्वाकर्षण का नियम प्रभावी होता है। परमाणु में नाभिक के गिर्द इलेक्ट्रान विद्युत बल के प्रभाव में चक्कर लगाते हैं। किसी बच्चे के गुण मां बाप के डी-एन-ए- से प्रभावित होते हैं। अग्नि का जला देने का गुण और पानी का ठण्डक पहुंचाने का गुण भी प्रकृति का नियम हैं। इस तरंह अनेकों छोटे बड़े नियम इस सृष्टि को कण्ट्रोल कर रहे हैं। अगर कोई मनुष्य अपनी त्वचा पर ब्लेड चला दे तो उसकी त्वचा कट जायेगी। क्योंकि यही प्रकृति का नियम है।


कहने का तात्पर्य ये है कि अगर कोई मनुष्य या कोई जाति इस पृथ्वी पर एक सीमा से अधिक जालिम बन जाये। पूरी दुनिया उसके अत्याचार से तंग आ जाये तो उस जाति का नष्ट हो जाना भी प्रकृति के नियमों के अन्तर्गत आता है। इसमें अल्लाह के क्रोध का कोई दखल नहीं रहता। अगर हम अपनी खाल पर चाकू फेरकर खाल काट लें और फिर यह कहें कि अल्लाह ने हमसे नाराज होकर हमारी खाल काट दी तो यह एक हास्यास्पद कथन होगा। क्योंकि खाल तो प्रकृति के नियमों के अनुसार कटी।



पिछला भाग
अगला भाग

1 comment: Leave Your Comments

  1. bahut hi behtreen aur dilchasb series hai, zabardast...

    ReplyDelete

Top of the Month

Follow by Email