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अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-15)

कुछ लोग यह एतराज़ कर सकते हैं कि दुनिया में बहुत जालिम लोग भी हुए हैं। चंगेज खान जैसे शासकों ने पूरा कत्लेआम मचा दिया था। आधुनिक युग में भी अमेरिका ने एटम बम की मदद से हिरोशिमा और नागासाकी जैसे शहर पूरी तरंह नष्ट कर दिये लेकिन इसके लिए प्रकृति ने उन्हें कोई सजा नहीं दी। और कभी कभी मामूली बातों पर भी सजा मिल जाती है।
इस एतराज का जवाब वही उत्तर हो सकता है जो इससे पहले एक अन्य प्रश्न का जवाब बन चुका है। कि अल्लाह महाशक्ति है और असलियत में उसने बन्दों को सज़ा या जज़ा देने का इरादा कयामत तक के लिए मुल्तवी कर रखा है। इस दुनिया में वह सिर्फ कुछ नमूने दिखाता है और यह नमूने अलग अलग बन्दों के लिए अलग अलग होते हैं। अगर वह सभी बन्दों को एक ही प्रकार की सज़ा या जज़ा देगा तो यह एक अत्यन्त सरल प्रक्रिया हो जायेगी और लोग यह मानने लगेंगे कि यह एक निश्चित प्रक्रिया है ठीक किसी मशीनी सिस्टम की तरंह जो कि वे लोग खुद भी बना सकते हैं। साथ ही वे भले और बुरे काम एक दायरे में रहकर करेंगे। यहां से वे यह सोचना शुरू कर देंगे कि अल्लाह भी उन्हीं जैसी अक्ल रखने वाला कोई प्राणी है जो कहीं अन्य स्थान पर निवास कर रहा है।



लेकिन हर प्राणी को बिल्कुल अलग और अद्वितीय तरीके से कण्ट्रोल करना, उसे सज़ा या जज़ा देना ऐसी प्रक्रिया है जो अक्लों को हैरान कर देती है। और उस वक्त अल्लाह की असीमित शक्तियों का पता चलता है। ऐसी शक्तियां जो न तो मनुष्य पा सकता है और न ही उनकी तह तक जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह बंदों पर अपनी शक्तियों का रोब जमाना चाहता है। वह केवल इतना चाहता है कि बंदे उसके बनाये नियमों का फायदा उठायें। कोई ऐसा काम न करें जिससे प्रकृति के नियम उन्हें हानि पहुंचा दें। उसने एटामिक शक्ति का नियम बनाया। यह एटामिक शक्ति एटम बम के रूप में विनाशकारी भी हो सकती है और न्यूक्लियर रिएक्टर के रूप में कल्याणकारी भी। अब अगर कोई इसका प्रयोग एटम बम के रूप में करता है तो इसमें अल्लाह और उसके बनाये नियमों का कोई कुसूर नहीं होगा। यह तो बंदे की गलती होगी।


प्रश्न ये भी उठता है कि उसने ये नियम क्यों बनाये? सृष्टि की रचना के पीछे उसका उद्देश्य क्या रहा? तो इसके जवाब में अल्लाह कहता है कि मैं एक छुपा हुआ खज़ाना था। मैंने चाहा कि मैं पहचाना जाऊं इसलिए इस कायनात की खिलक़त की। सरल भाषा में इसे यूं समझा जा सकता है कि अगर हमारे पास किसी कार्य को करने की क्षमता है और हम उस कार्य को नहीं करते तो यह विश्व के साथ और स्वयं अपने साथ जुल्म होता है।


अगर हम किसी कार्य को करने के लिए अपने को जिम्मेदार समझ रहे हैं और वह कार्य हमने नहीं किया तो यह हमारा अन्याय होगा। अक्सर हम सरकार को कोसते रहते हैं। क्योंकि वह पानी बिजली और सड़क जैसी समस्याओं से हमें दो चार किये रहती है। यहां चूंकि सरकार के पास इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के साधन हैं लेकिन वह उनका उपयोग नहीं करती तो सरकार को अक्षम और अन्यायी कह दिया जाता है। अगर किसी शिक्षक के पास ज्ञान है लेकिन वह विद्यार्थियों में नहीं बाँटता तो उसे गलत करार दिया जाता है। अर्थात अगर हमने अपनी योग्यताओं का उपयोग नहीं किया तो यह भी एक अपराध होता है।


अब आप अल्लाह के बारे में ख्याल कीजिए। उसके पास हर तरंह की शक्ति है। अगर वह अपनी शक्ति का उपयोग नहीं करेगा, छुपा  हुआ खजाना बना रहेगा तो वह स्वयं अपने साथ नाइंसाफी करेगा। जबकि खुदा नाइंसाफ, जालिम या अज्ञानी नहीं है। इस तरंह सृष्टि का निर्माण करके उसने अपनी योग्यताओं और शक्तियों का इंसाफ किया है। इसीलिए उसने मनुष्य की रचना की और उसे सोचने समझने की शक्ति दी। जिससे वह भला बुरा पहचान कर नियमों को अपनी भलाई में लगाये और अल्लाह के बारे में विचार करे। भ्रमों को छोड़कर सिर्फ उसकी इबादत करे, आराधना करे


अल्लाह में अनगिनत गुण हैं। यह कुछ विषम सा कथन प्रतीत होता है। क्योंकि आप गुणों को गिनते जाईए। एक न एक समय आयेगा जब ये गुण समाप्त हो जायेंगे। लेकिन इसको साइंटिफिक तरीके से विचार करने के बाद ही कोई निष्कर्ष निकाला जा सकता है।


अनन्त या इनफिनिटी की संकल्पना वैज्ञानिक सिद्धान्तों में काफी स्पष्ट है। विशेष रूप से विज्ञान की रीढ़ गणित में। प्राकृतिक संख्याएं एक, दो, तीन--- गिनते जाईए, कोई सिरा इसकी समाप्ति का नहीं मिलेगा। यानि ये संख्याएं अनन्त होती हैं। एक निश्चित या अनिश्चित लम्बाई की रेखा में अनन्त बिन्दु होते हैं। किसी भी समतल पर अनन्त बिन्दु होते हैं। और तो और किसी अशून्य संख्या को शून्य से विभाजित कर दिया जाये तो परिणाम होगा अनन्त। अल्लाह एक है, और ऐसा एक जिसमें कोई कमी नहीं (Absolute One)।


सृष्टि की रचना शून्य से हुई। इसी सृष्टि का अंग है मनुष्य और उसके विचार। स्पष्ट है कि जब इन शून्य विचारों से अल्लाह के बारे में विचार किया जायेगा तो इसका अर्थ होगा कि हम एक को शून्य से विभाजित कर रहे हैं। परिणाम जाहिर है कि अनन्त होगा। ठीक गणित के उपरोक्त नियम की तरंह। वास्तव में अल्लाह के गुण उससे अलग करके नहीं देखे जा सकते, क्योंकि अलग करने का मतलब हुआ कि हम उसे विभाजित कर रहे हैं अपने शून्य विचारों से। स्पष्ट है कि एक, दो, तीन----- अनन्त गुण मिलते जायेंगे, कभी सीमा नहीं मिलेगी।


ऊपर एक और शब्द इस्तेमाल में आया है, ‘‘ऐसा एक, जिसमें कोई कमी नहीं (Absolute One) इस वाक्य की गहराई गणितीय नियमों में डूबने पर पता चलती है। प्रायिकता सिद्धान्त (Probability Theory) आधुनिक विज्ञान की महत्वपूर्ण शाखा है। इस ब्रह्माण्ड में जो भी घटना घटती है उसके होने की एक प्रोबेबिलिटी होती है। उदाहरण के लिए अगर एक सिक्का उछाला जाये तो उसमें हेड आने की प्रोबेबिलिटी आधी होती है। इसी तरंह किसी रेडियोऐक्टिव तत्व के किसी परमाणु का विघटन होना इसकी भी प्रोबेबिलिटी निकाली जा सकती है। प्रोबेबिलिटी का अधिकतम मान एक और न्यूनतम मान जीरो होता है। किसी घटना (Event) के घटने की प्रोबेबिलिटी अगर एक है तो इसका मतलब हुआ कि वह घटना निश्चित रूप से घटेगी। और घटना के घटने की प्रोबेबिलिटी अगर जीरो है तो इसका मतलब हुआ कि उस घटना का होना नामुमकिन है। लेकिन इस नियम के अपवाद भी दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए अगर हमारे पास सभी नेचुरल नम्बर्स का सेट (एक, दो, तीन-----इत्यादि) है और उस सेट से कोई नम्बर निकाला जाये तो उस नम्बर के दो (2) न आने की प्रोबेबिलिटी एक होगी।


इसके बावजूद यह मुमकिन है कि निकलने वाला नम्बर संयोग से 2 हो जाये। इसी बात को सृष्टि की घटनाओं में लिया जा सकता है। किसी घटना को घटने की प्रोबेबिलिटी वन होने का मतलब है कि वह घटना श्योर घटेगी। इसके बावजूद वह घटना कभी कभी घटित होने से रह जाती है। अर्थात घटना की प्रोबेबिलिटी वन होने के बाद भी उसमें कमी है। लेकिन खुदा का वजूद होना एक ऐसा वन है जिसमें कोई कमी नहीं। उसके वजूद की एकात्मकता प्रोबेबिलिटिक वन से भी ऊपर है जिन्हें आलमोस्ट श्योर कहा जाता है। लेकिन खुदा का एक होना परफेक्टली श्योर है। उसके वजूद के अलावा कोई निर्माण या घटना आलमोस्ट श्योर या उससे कम होगी।


इस कथन पर एतराज़ किया जा सकता है। क्योंकि हमें अपने आसपास बहुत सी घटनाएं दृष्टिगत होती हैं जो श्योर (Perfectly Sure) होती हैं।
जैसे अगर हमसे पच्चीस कदम दूर खड़ा कोई व्यक्ति चीखता है तो आवाज़ श्योरली हमारे कानों तक पहुंच जायेगी। लेकिन मान लिया जब वह व्यक्ति चीखता है उसी समय आसपास कोई बड़ा विस्फोट हो जाये तो? स्पष्ट है कि विस्फोट की भीषण आवाज में व्यक्ति की चीख दब जायेगी। इसी तरंह मेज़ पर कोई वस्तु स्थिर रखी है तो हम ये नहीं कह सकते कि वह वस्तु पूरी तरंह स्थिर है क्योंकि उसके अणु कंपन कर रहे हैं। और सूर्य के सापेक्ष जब पृथ्वी गति कर रही है तो साथ साथ वह वस्तु भी गति कर रही है। इस प्रकार कोई भी घटना या किसी चीज़ का वजूद अधिक से अधिक आलमोस्ट श्योर हो सकता है, परफेक्टली श्योर नहीं। सिर्फ खुदा की ज़ात है जो परफेक्टली श्योर है।


खुदा को सृष्टि की रचनाओं में किसी भी तरंह की हरकत की जरूरत नहीं पड़ी। और न ही वह सृष्टि को चलाने के लिए गति करता है। वह बस इरादा करता है और किसी भी तरंह का कार्य अपने अंजाम को पहुंच जाता है। खुदा का यह गुण मस्तिष्क को विषम प्रतीत होता है क्योंकि छोटे से छोटे कार्य को करने के लिए गति आवश्यक होती है। हालांकि कुछ घटनाएं ऐसी हैं जहां गति के दर्शन नहीं होते। उदाहरण के लिए एक टार्च किसी कमरे में जलाकर रख दी जाये तो उसका प्रकाश सामने की दीवार पर एक गोल घेरा बनाने लगेगा। अब यह घेरा लगातार बन रहा है लेकिन प्रकाश में कोई गति नहीं हो रही है। लेकिन यह कथन आधुनिक विज्ञान के अनुसार गलत है क्योंकि इस क्रिया में प्रकाश के कण अर्थात फोटॉन अनवरत रूप से टार्च से निकलते हैं और बीच की दूरी तय करके दीवार पर पड़ते रहते हैं।


अल्लाह वह हस्ती है जिसके पास ज्ञान का असीमित भंडार है। उपरोक्त उदाहरणों में हम देख सकते हैं कि गति ज्ञान के व्युत्क्रमानुपाती होती है। जब ज्ञान बढ़ता है तो गति घटती है। चूंकि अल्लाह का ज्ञान अनन्त है इसलिए उसकी गति शून्य हो जायेगी। कुछ लोग यह कह सकते हैं कि मनुष्य की गति उन मशीनों पर निर्भर हो गयी जिनका उसने आविष्कार किया। अल्लाह ने भी अपनी मशीनें निर्मित कीं जो प्रकृति और उसके सिद्धान्तों के नाम से जानी जाती हैं। गुरुत्वाकर्षण का नियम, सापेक्षिकता का नियम, द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण का नियम और इस तरंह के अनगिनत नियम हैं जो इस सृष्टि को कण्ट्रोल कर रहे हैं। यही अल्लाह की बनायी हुई मशीनें हैं। फिर तो सवाल उठ सकता है कि अल्लाह ने इन मशीनों को बनाने के लिए गति की होगी। लेकिन ऐसा भी नहीं है। गति उस केस में होती जब ये मशीनें पदार्थिक होतीं। तो फिर उनके पदार्थों को आपस में जोड़ने के लिए गति करनी पड़ती। लेकिन प्रकृति के नियम निराकार होते हैं, उनके निर्माण में कोई गति आवश्यक नहीं होती, ठीक उसी तरंह जिस तरंह निराकार कल्पना को करने के लिए मानव मस्तिष्क को कोई गति नहीं करनी पड़ती। हम केवल कल्पना करते हैं और रंग बिरंगी तस्वीरें हमारे मस्तिष्क में बनने लगती हैं। उसी प्रकार अल्लाह ने इरादा किया और नेचर के सारे नियम, सारे उसूल तैयार हो गये।


प्रकृति के यही उसूल और नियम पूरी सृष्टि को चला रहे हैं। सारी वैज्ञानिक खोजें इन नियमों तक बढ़कर ठहर जाती हैं और खुदा तक नहीं पहुंच पातीं। इसलिए कई वैज्ञानिक इस पर सहमत हो गये हैं कि सृष्टि का पूरा कण्ट्रोल इन्हीं नियमों के आधार पर है। अपने प्रयोगों को वे इन्हीं नियमों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं और जब कोई नया आविष्कार करते हैं तो उसे प्रकृति के सिद्धान्तों का उपयोग करके प्राप्त करते हैं। और प्रकृति में जब कोई घटना घटती है तो उसे इन सिद्धान्तों की मदद से समझाया जाता है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हम जिन मशीनों द्वारा कण्ट्रोल किये जा रहे हैं उनमें से कुछ तक पहुंच चुके हैं, लेकिन उन मशीनों को बनाने वाले के प्रति बहुत अधिक भ्रम के शिकार हैं।




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  1. ज़बरदस्त जानकारी ज़ीशन भाई!

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