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अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-17)

खुदा का वजूद जरूरी क्यों?


इस तरंह खुदा के गुणों के बारे में स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न मस्तिष्क को उद्वेलित कर सकता है। वह यह कि खुदा का वजूद वास्तव में है भी या नहीं? हो सकता है किसी अत्यन्त मेधावी दिमाग ने या कई दिमागों ने एक ऐसी महाशक्ति की कल्पना कर ली हो जिसकी विशेषताएं उपरोक्तानुसार हैं। इस कल्पना के पीछे कई कारण हो सकते हैं। मसलन ये कि कुछ इंसान जो बाकियों से अपने को सम्मान दिलाना चाहते थे, लोगों में एक अदद ईश्वर के बारे में कहानियां फैलाने लगे और अपने को ईश्वर का भेजा दूत कहलाने लगे ताकि लोग उनका सम्मान करने लगें और ईश्वर के साथ साथ उनसे भी डर कर उनकी आज्ञा मानें। लेकिन अगर ऐसी बात होती तो यह मान्यता कुछ स्थानों या ज्यादा से ज्यादा कुछ देशों में पहुंचकर समाप्त हो जाती। और अगर हर जगह होती तो भी ईश्वर की कल्पना हर जगह पर अलग अलग तरीके से की जाती। कहीं उसका कुछ और रूप बताया जाता तो कहीं किसी और रूप में उसके अस्तित्व के बारे में कहा जाता। लेकिन हम देखते हैं कि कुछ भ्रमों को अगर छोड़ दिया जाये तो अल्लाह के गुण हर जगंह समान मिलते हैं।



अज़मते ख़ान ए काबा

इस दुनिया में ख़ुदा का पहला घर ख़ान ए काबा है। तारीख़े अतीक़ भी इस बात की गवाह है कि इससे क़ब्ल कोई एक भी ऐसी इबादत गाह कायनात में मौजूद नही थी जिसे ख़ुदा का घर कहा गया हो। इस की तसदीक़ क़ुरआने मजीद भी इन अल्फ़ाज़ में करता है:

(सूर ए आले इमरान आयत 96)

तर्जुमा: बेशक पहला घर जो लोगों की इबादत के लिये मुक़र्रर किया गया था वह यही है बक्का में, जो बा बरकत और सारे जहानों के लिये मुजिबे हिदायत है।

एक तारीख़ी रिवायत के मुताबिक़ ख़ान ए काबा बैतुल मुक़द्दस की मस्जिदुल अक़सा से एक हज़ार तीन सौ साल पहले तामीर हुआ है।

असरे जाहिलियत में भी तमाम अरब अपने जाहिली रस्म व रिवाज के मुताबिक़ ख़ान ए काबा का तवाफ़ और हज किया करते थे।

हज़रत इब्राहीम (अ) ने हज़रत मूसा (अ) से नौ सौ बरस पहले इस की ज़ाहिरी तामीर मुकम्मल की और बारगाहे हक़ में दुआ की। यह दुआ क़ुरआने करीम में इस तरह बयान हुई है:

(सूर ए इब्राहीम आयत 37) परवरदिगारा, मैंने इस बे आबो गयाह वादी में अपनी औलाद को तेरे मोहतरम घर के पास ला बसाया है......।

हिजरत के अठठारवें महीने माहे शाबान सन 2 हिजरी में जंगे बद्र से एक माह पहले मुसलमानों के क़िबला बैतुल मुक़द्दस से मुन्तक़िल हो कर काबे की सिम्त हो गया। जिसका ज़िक्र क़ुरआने मजीद के सूर ए बकरह में किया गया है।

ख़ुदा वंदे आलम का मुसलमानों पर बड़ा अहसान है कि उसने हमारा क़िबला ख़ान ए काबा क़रार दिया। चूँ कि बैतुल मुक़द्दस ऐसा क़िबला था जिस के कई दावेदार होने की वजह से कई बार काफ़िर फ़ातेहों ने उसे वीरान और नजिस किया और वहाँ के बसने वालों को कई बार ग़ुलाम बनान पड़ा और कई बार वहाँ क़त्ले आम भी जारी रहा, जो आज भी शिद्दत से हो रहा है और तारीख़ मुसलमानों के सुकूत पर महवे हैरत है।

यह एक बड़ी ताज्जुब ख़ेज़ बात है और तारीख़े आलम भी इस बात की गवाह है कि पिछले पाच हज़ार सालों में किसी ने भी ख़ान ए काबा पर अपनी ज़ाती मिल्कियत होने का दावा नही किया। यह ऐसा अनमोल शरफ़ है जो दुनिया की किसी इबादत गाह या मअबद को हासिल नही हुआ।

अरब के बुत परस्त भी उसे बैतुल्लाह ही कहा करते थे। इस्लाम से पहले भी उसकी हुरमत, हिफ़ाज़त, सियानत ख़ुदा मुतआल ने शरीफ़ नस्ल अरबों के ज़रिये फ़रमाई और पैग़म्बरे इस्लाम (स) के ज़रिये से मुसलमानों को क़यामत तक के लिये उसका मुहाफ़िज़ व पासबान बना दिया।

नबी करीम (स) की विदालते बा बरकत से एक महीने बीस रोज़ पहले जब यमन का बादशाह अबरहा अपनी साठ हज़ार हाथियों की मुसल्लह फ़ौज लेकर ख़ान ए काबा को ढाने की ग़रज़ से मक्के की वादियों में आया तो परवर दिगार ने अपने घर के हरीम की हिफ़ाज़त की ख़ातिर किसी इंसानी फ़ौज का सहारा नही लिया बल्कि अबाबीलों जैसे नाज़ुक अंदाम परिन्दों के ज़रिये उन हाथियों पर कंकड़ियाँ बरसा कर उन अफ़वाजे फ़ील को तहस नहस कर दिया। क़ुरआने करीम के सूर ए फ़ील में इसी वाक़ेया का ज़िक्र है।

जन्नत से ख़ास कर उतारे गये दो अहम पत्थर हजरे असवद और मक़ामे इब्राहीम, अहले आदम (अ) और दौरे इब्राहीमी से अब तक मौजूद हैं और दुनिया के सब से ज़्यादा मुक़द्दस पानी का क़दीम चश्मा ज़मज़म इसी ख़ान ए काबा के क़रीब है। इसके पानी के नेकों की शराब कहा गया है, लाखों अक़ीदत मंद मुसलमान दुनिया के गोशा व किनार से इस पानी को तबर्रुक के तौर पर ले जाते हैं।

मक्क ए मुअज़्ज़मा और फ़ज़ाएले ख़ान ए काबा में क़ुरआने हकीम की कई आयात नाज़िल हुई हैं। अल्लाह तआला ने शहरे मक्का को (उम्मुल क़ुरा) यानी बस्तियों का माँ कहा है और सूर ए अत तीन और सूर ए अल बलद में अल्लाह तआला ने इस शहरे पुर अम्न में की क़सम खाई है। इस शहर में यहाँ के शहरियों के अलावा, दूसरे तमाम लोगों को एहराम बाँधे बग़ैर दाख़िल होने की इजाज़त नही है। यह ख़ुसूसियत दुनिया के किसी और शहर को नसीब नही है। मस्जिदुल हराम की इबादत और यहाँ की हर नेकी अक़ताए आलम में की गई नेकियों से एक लाख गुना ज़्यादा बेहतर है। यह मक़ाम इस क़दर मोहतरम और पुर अम्न है कि यहाँ न सिर्फ़ ख़ूनरेज़ी मना है बल्कि न किसी जानवर का शिकार किया जा सकता है व किसी पेड़ को काटा और सबज़े और पौधे को उखाडा़ जा सकता है।

क़ुरआने पाक में उसे बैतुल हराम यानी शौकत का घर कहा गया है। ख़ान ए काबा के महल्ले वुक़ू के बारे में लिखा गया है कि यह ऐन अरशे इलाही और बैतुल मामूर के नीचे है। इल्मे जुग़राफ़िया के माहिरीन का कहना है कि काबे के महल्ले वुक़ू को हम नाफ़े ज़मीन कह सकते हैं।

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-16)

खुदा को कोई चीज़ ईजाद करने के लिए किसी चिंतन या कल्पना की ज़रूरत नहीं पड़ती। इससे पहले कि कोई चीज़ वजूद में आये, उसे इसका ज्ञान रहता है। ये बात भी कुछ अक्ल से परे हो जाती है क्योंकि मनुष्य अगर किसी चीज़ का निर्माण करता है तो पहले उसके बारे में सोचता है उसकी आवश्यकता कहां पड़ सकती है इस बारे में छानबीन करता है। फिर मन ही मन उसकी रूपरेखा (Structure) तैयार करता है, तब जाकर एक वस्तु तैयार होती है। और इस वस्तु में भी अत्यन्त चिंतन के बाद भी कहीं न कहीं कमी रह जाती है। इस कमी को दूर करने के लिए फिर नये सिरे से रिसर्च की जाती है, उस में नयी खोजों और नये आविष्कारों का उपयोग करके सुधार किया जाता है और नया माडल तैयार हो जाता है।


उदाहरण के लिए जब एडीसन ने बल्ब का अविष्कार किया तो बल्ब में आक्सीजन गैस भरी होने के कारण वह बार बार फेल हो जाता था। फिर उसमें सुधार करके आक्सीजन गैस निकाली गयी और कार्बन का फिलामेंट लगाया गया। लेकिन इसमें कुछ खराबियां थीं। जैसे कि वह जल्दी काला पड़ जाता था और फिलामेन्ट बहुत जल्दी गल जाता था। बाद में फिलामेन्ट परिवर्तित करके टंग्स्टन का लगा दिया गया। इस प्रकार बल्ब का विकसित माडल मिला। परन्तु एडीसन को प्रथम बल्ब के आविष्कार के लिए भी वर्षों का परिश्रम करना पड़ा। पहले उसने कल्पना की, फिर चिंतन किया और अन्त में गणना करके उसे वास्तविक रूप में तैयार किया। जब छोटी से छोटी वस्तु का निर्माण बिना कल्पना और चिंतन के नहीं हो सकता तो अल्लाह ने पूरी सृष्टि बिना कल्पना और चिंतन के कैसे तैयार कर दी?


यहां एक बार फिर खुदा का असीमित ज्ञान अपना कार्य करता है। वास्तव में चिंतन की उस समय जरूरत पड़ती है जब ज्ञान की कमी हो। एडीसन ने जब बल्ब बनाने का प्रयास शुरू किया था तो उसे इस बारे में कोई ज्ञान नहीं था कि बल्ब की कार्यप्रणाली क्या होगी। जैसे जैसे उसने एक्सपेरीमेन्ट किये उसके ज्ञान में बढ़ोत्तरी हुई। अपने प्रयोगों के गुण दोषों के बारे में पता चला और एक दिन वह सफल हो गया। गाड़ी का कोई मैकेनिक प्रारम्भ में बहुत कठिनाई पूर्वक किसी गाड़ी की खराबी दूर कर पाता है। क्योंकि उसे इस बारे में ज्ञान कम रहता है लेकिन एक बार सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने के पश्चात जब वह एक्सपर्ट हो जाता है तो मात्र आवाज से खराबी पकड़ लेता है और बिना किसी विचार या चिंतन के मशीनी अंदाज में पुर्जे खोल खालकर ठीक कर देता है। इस तरंह कल्पना की आवश्यकता उस समय पड़ती है जब हमें किसी नयी वस्तु के बारे में कुछ नहीं मालूम रहता। प्रारम्भ में जब एटामिक स्ट्रक्चर वैज्ञानिको के लिए अज्ञात था और इलेक्ट्रान प्रोटान तथा न्यूट्रान की खोज हो चुकी थी उस समय परमाणु माडल के लिए अनेक कल्पनाएं की गयीं। फिर जैसे जैसे विज्ञान प्रगति करता गया और प्रयोगों के आधार पर जो कल्पना सही सिद्ध हुई उसे लागू कर दिया गया। बाकी को निरस्त कर दिया गया। इस तरंह हम देखते हैं कि ज्ञान की कमी कल्पनाओं और विचारों को जन्म देती है। चूंकि खुदा के पास ज्ञान सम्पूर्ण है, उसमें कहीं कोई कमी नहीं है इसलिए उसे कल्पना या चिंतन करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती।


वास्तव में उसका ज्ञान इतना सम्पूर्ण है कि सृष्टि रचने से पहले वह सृष्टि रचने के बारे में सब कुछ जानता था और सृष्टि में आगे क्या होने वाला है, कौन सी घटनाएं घटेंगी, कौन से प्राणी पैदा होंगे इन सब के बारे में उसे पूर्ण ज्ञान था। किस तरंह उसे भविष्य के बारे में पहले से मालूम हो जाता है, इसकी व्याख्या इससे पहले की जा चुकी है।


ये थी अल्लाह के कुछ ऐसे गुणों की व्याख्या जो सरसरी तौर पर विचार करने पर तर्कसंगत नहीं प्रतीत होते हैं। इनका चिंतन लोगों को भ्रम का शिकार बना देता है और वे अनेक प्रश्नों में उलझ कर गलत दिशा में कदम बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि अल्लाह, ईश्वर या गॉड के बारे में अनेक भ्रांतियां फैल गयी हैं। कुछ ये मानने लगे हैं कि ईश्वर सशरीर है। उसके हाथ, पैर, मुंह, आँख सब कुछ है। कहीं ये मान्यता फैल गयी कि सृष्टि की रचना ईश्वर के एक सूक्ष्म अंश से हुई तो कहीं देवताओं और पैगम्बरों को ईश्वर या अल्लाह के नूर से उत्पन्न बताया जाने लगा। जबकि हकीकत यह है कि अल्लाह ने अपना कोई हिस्सा अलग नहीं किया। बल्कि उसने इन सब की रचना की है।



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