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अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-17)

खुदा का वजूद जरूरी क्यों?


इस तरंह खुदा के गुणों के बारे में स्पष्टीकरण दिया जा सकता है। लेकिन इसके बावजूद भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न मस्तिष्क को उद्वेलित कर सकता है। वह यह कि खुदा का वजूद वास्तव में है भी या नहीं? हो सकता है किसी अत्यन्त मेधावी दिमाग ने या कई दिमागों ने एक ऐसी महाशक्ति की कल्पना कर ली हो जिसकी विशेषताएं उपरोक्तानुसार हैं। इस कल्पना के पीछे कई कारण हो सकते हैं। मसलन ये कि कुछ इंसान जो बाकियों से अपने को सम्मान दिलाना चाहते थे, लोगों में एक अदद ईश्वर के बारे में कहानियां फैलाने लगे और अपने को ईश्वर का भेजा दूत कहलाने लगे ताकि लोग उनका सम्मान करने लगें और ईश्वर के साथ साथ उनसे भी डर कर उनकी आज्ञा मानें। लेकिन अगर ऐसी बात होती तो यह मान्यता कुछ स्थानों या ज्यादा से ज्यादा कुछ देशों में पहुंचकर समाप्त हो जाती। और अगर हर जगह होती तो भी ईश्वर की कल्पना हर जगह पर अलग अलग तरीके से की जाती। कहीं उसका कुछ और रूप बताया जाता तो कहीं किसी और रूप में उसके अस्तित्व के बारे में कहा जाता। लेकिन हम देखते हैं कि कुछ भ्रमों को अगर छोड़ दिया जाये तो अल्लाह के गुण हर जगंह समान मिलते हैं।



इस दलील के बावजूद कुछ लोग ईश्वर को केवल काल्पनिक पात्र मान सकते हैं। इसके पीछे उनकी यह भी दलील हो सकती है कि मानव जीवन की उत्पत्ति पृथ्वी की किसी एक जगंह से हुई हो और फिर धीरे धीरे वह पूरी पृथ्वी पर फैल गये हों। चूंकि उसी एक स्थान पर ईश्वर की कल्पना रची गयी इसलिए वह पूरी पृथ्वी पर समान रूप में पहुंची। इस कल्पना के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है कि मुसीबतों में किसी हमदर्द की तलाश या जालिम को उसके अंजाम से खौफ दिलाना। मनुष्य के जीवन में कई अवसर ऐसे आते हैं जब वह बुरी तरंह मुसीबतों से घिर जाता है, उनसे बचाव का कोई रास्ता उसे सुझायी नहीं देता। तब अपने दिल को दिलासा देने के लिए, आशा की एक किरण पैदा करने के लिए अल्लाह की कल्पना का सहारा लेते हैं, और इससे पूरी तरंह निराशाजनक स्थिति में पहुँचने से बच जाते हैं । इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति अत्याचारी है लोग उससे भयभीत हो रहे हैं, तो उसके अत्याचार से मुक्ति पाने के लिए खुदा या ईश्वर का खौफ दिलाया जाता है। ताकि उसके अत्याचारों पर अंकुश लग सके।


अल्लाह के वजूद के बारे में बहुत से लोग इससे पहले गुणों के स्पष्टीकरण से संतुष्ट हो सकते हैं। क्योंकि अल्लाह के जो भी गुण धर्मों में बयान किये गये हैं, वे आधुनिक साइंस के नियमों पर खरे उतरते हैं और तर्कसंगत हैं। अगर अल्लाह की कल्पना बीते युगों में की जाती तो वह गुण आधुनिक विज्ञान के संदर्भों में विरोधाभास पैदा कर देते। लेकिन उपरोक्त अध्ययन में हमने देखा कि कहीं कोई विरोधाभास नहीं है।


यह एतराज उठाया जा सकता है कि हो सकता है हमने अल्लाह के सिर्फ उन गुणों को लिया है जो आधुनिक साइंस के संदर्भों में खरे उतरते हैं। उदाहरण के लिए कुछ धर्म अल्लाह को सशरीर मानते हैं, यह गुण हमने छोड़ दिया क्योंकि आधुनिक विज्ञान के संदर्भों में यह तर्कसंगत नहीं प्रतीत हुआ। इसी तरंह बन्दे जो कुछ भी काम करते हैं भला या बुरा वह अल्लाह अपनी मर्जी से करवाता है इसे भी हमने अस्वीकार कर दिया और सिर्फ उन गुणों को लिया जो अपने ज्ञान के अनुसार सिद्ध कर सकें। यहां पर देखा जाये तो हमने अल्लाह के कुछ गुणों को तर्कसंगत सिद्ध किया है, अल्लाह के वजुद को नहीं सिद्ध किया है, कि वह वास्तव में मौजूद है या केवल एक सुपरमैन जैसी कल्पना मात्र है। जबकि ब्रह्माण्ड में जो भी वजूद है उसका अस्तित्व सिद्ध होना चाहिए। प्रायोगिक रूप में न सही तो गणितीय रूप में, विभिन्न समीकरणों द्वारा सिद्ध होना चाहिए। क्योंकि बहुत से ऐसे सिद्धान्त या रचनाएं जो पहले अज्ञात थीं, गणितीय समीकरणों के रूप में अस्तित्व में आयीं और बाद में उनकी प्रायोगिक पुष्टि भी हो गयी।


उदाहरण के लिए डी ब्राग्ली की कण तरंग सम्बन्धी परिकल्पना प्रारम्भ में जटिल गणितीय समीकरणों द्वारा अस्तित्व में आयी। बाद में प्रायोगिक रूप से पुष्टि हुई कि प्रत्येक कण तरंग की तरंह व्यवहार करता है। ग्रह सम्बन्धी गणनाओं के दौरान प्लूटो ग्रह का वजूद पता चला। बाद में हाई पावर टेलिस्कोपों की मदद से उस ग्रह को देख भी लिया गया। कंप्यूटर का माडल सर्वप्रथम चार्ल्स बैबेज ने कागजों पर तैयार किया था, गणितीय समीकरणों के रूप में। आज कम्प्यूटर वास्तविक रूप में हमारे सामने है। इस तरंह हम देखते हैं कि कोई भी सिद्धान्त या नियम या वस्तु अगर वास्तविक रूप में संभव है तो उसे गणितीय रूप में सिद्ध किया जा सकता है। फिर तो अल्लाह का वजूद भी गणितीय रूप में सिद्ध होना चाहिए।


अब हम गणितीय नियमों की थोड़ी गहराई में जाते हैं। किसी भी गणितीय समीकरण को हल करते समय या किसी नियम को सिद्ध करते समय हम कुछ ऐसी मान्यताओं का इस्तेमाल करते हैं जो स्वयं सिद्ध होती हैं। उन मान्यताओं को सिद्ध नहीं किया जाता बल्कि सदैव सत्य मानकर उनका उपयोग किया जाता है। इन स्वयं सिद्ध मान्यताओं को एक्ज़ियम (Axiom) कहा जाता है। एक्ज़ियम के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं।


नेचुरल नम्बर सम्बन्धी नियमों को सिद्ध करने के लिए पियानो का एक्जियम कहता है कि ‘एक’ एक नेचुरल नम्बर है और नेचुरल नम्बर में एक जोड़ने पर पुन: एक नेचुरल नम्बर मिलता है। यह ऐसा नियम है जिसे सिद्ध नहीं किया जा सकता। डिस्कार्ट का कथन ‘मैं सोचता हूं इसलिए मेरा अस्तित्व है।’ को सिद्ध नहीं कर सकते। बिन्दु (Point) विमाहीन होता है उसकी लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई कुछ नहीं होती, यह भी एक्जियम है।


इसी तरंह भौतिकी के कुछ नियम जैसे न्यूटन के गति के नियम, प्रकाश का सरल रेखा में चलना, केपलर के ग्रह गति के नियम जैसी अनेक मान्यताएं केवल प्रयोगों के आधार पर महसूस की गयी हैं। इन्हें गणितीय रूप में सिद्ध करना असंभव है।


ज़ाहिर है अल्लाह का वजूद भी एक एक्ज़ियम है। गणितीय नियमों के आधार पर उसका सिद्ध होना असंभव है। उसके वजूद को सिर्फ महसूस किया जा सकता है। क्योंकि हम जो भी गणितीय नियम बनायेंगे उनमें कुछ कमी होगी, जो हमारे अधूरे ज्ञान का परिणाम होगी। इन नियमो के आधार  पर अल्लाह के वजूद को सिद्ध करना केवल एक हास्यास्पद प्रयास होगा। वास्तव में अल्लाह के वजूद की निशानियों को हम सृष्टि में देख सकते हैं और उस महाशक्ति के बारे में विचार कर सकते हैं। उन्हीं निशानियों से यह फैसला किया जा सकता है कि अल्लाह का वजूद वास्तव में है या नहीं। इस प्रकार अगर हम सृष्टि के बारे में विचार करें। किस प्रकार यह सृष्टि बनी, बनने से पहले अब तक जो घटनाओं का क्रम है उसकी तारतम्यता। मनुष्य का जन्म और उसका अद्धितीय होना। प्रकृति के छोटे बड़े नियम। सृष्टि का कण्ट्रोल जैसी अनेक बातों का अध्ययन इस दिशा में सहायता कर सकता है।


इसके अलावा गणितीय कल्पनाएं और नियम, गणितीय समीकरण भी इस दिशा में सहायता कर सकते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि प्रत्येक सिद्धान्त या नियम की एक गणितीय पृष्ठभूमि होती है। उसकी एक उत्पत्ति होती है। अगर किसी वस्तु का वजूद इस सृष्टि में है तो उसका गणितीय वजूद भी अवश्य होता है। इसलिए सर्वप्रथम हम अल्लाह के वजूद को गणितीय सिद्धान्तों और समीकरणों की सहायता से समझने का प्रयास करेंगे। उसके बाद सृष्टि की घटनाओं और नियमों की मदद से उसके वजूद और उसकी निशानियों को देखने की कोशिश करेंगे। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अल्लाह के वजूद को देखना नामुमकिन है। यहां उसके वजूद को देखने का मतलब है कि सृष्टि द्वारा उसके वजूद की पुष्टि करना।


गणित के किसी भी नियम या समीकरण के दर्शन वास्तविक रूप में कहीं न कहीं होते हैं। समान परिमाणों में पाज़िटिव व निगेटिव जुड़ने पर शून्य मिलता है। वास्तविक रूप में अगर किसी एटम में इलेक्ट्रान (जिन पर निगेटिव चार्ज होता है) और प्रोटॉन (जिन पर पाजिटिव चार्ज होता है) बराबर संख्या में मौजूद हैं तो वह एटम उदासीन होता है। यानि उसका चार्ज शून्य होता है। गणित में निर्देशांक ज्यामिति द्वारा विभिन्न प्रकार के वक्रों के समीकरण प्राप्त होते हैं। जैसे दीर्घवृत्त (ellipse), कैटेनरी (catenary), कार्डायड (cardioid) इत्यादि। वास्तविक जीवन में सूर्य के चारों ओर ग्रहों की गति दीर्घवृत्ताकार कक्षा में होती है। दो खम्भों के बीच लटकते तार कैटेनरी बनाते हैं और कई प्रकार की पत्तियां कार्डायड की शक्ल में होती हैं। गणित में फिबोनिकी संख्याएं होती हैं जो संख्याओं का एक विशेष क्रम बनाती हैं। वास्तविक जीवन में खरगोशों का वंश और सूरजमुखी के मुख पर दाने इन संख्याओं के क्रम में वृद्वि करते हैं।


अब गणित में दो प्रकार की परिकल्पनाएं हैं। संतत (continuous) और असंतत (discontinuous)। संतत हम ऐसे वक्र या रचना को कहते हैं जो बीच में कहीं भी टूटती नहीं। रचना में कहीं कोई गैप नहीं होता, जबकि असंतत इसके विपरीत होता है। उदाहरण के लिए खींची गयी कोई रेखा जिसमें बीच में कहीं भी पेन को नहीं उठाया गया है संतत मानी जायेगी। जबकि एक डैशेड या डाटेड (dotted) रेखा असंतत मानी जायेगी। यदि गहराईपूर्वक देखा तो इस सृष्टि में संतत (continuous) कुछ भी नहीं है। पदार्थ परमाणुओं से मिलकर बनता है जिनके बीच गैप रहता है और अगर हम उनके बीच गैप न भी लें तो परमाणु में उपस्थित एलेक्ट्रोन और नाभिक के बीच गैप निश्चित रूप से रहता है। कान्टीन्यूटी का उपरोक्त उदाहरण यानि खींची गयी रेखा भी असंतत होती है। क्योंकि यह जिस इंक से बनी है वह इंक असंतत परमाणुओं से मिलकर बनी है। अगर हम प्रकाश को संतत मानें तो यहां भी संतुष्टि नहीं होगी क्योंकि प्रकाश विशेष प्रकार के कणों की धारा होता है। ये कण फोटॉन कहलाते हैं। यहां तक कि दो वस्तुओं के बीच लगने वाला बल भी असंतत कणों के कारण अस्तित्व में आया है। गुरुत्वाकर्षण ग्रेविटानों के कारण, विद्युत फोटॉनों से और नाभिकीय बल मीसॉनों के वितरण से पैदा होता है।


तो इस प्रकार कान्टीन्यूटी के दर्शन इस सृष्टि में कहीं नहीं होते। तो क्या इस संकल्पना को गणित से हटा देना चाहिए? लेकिन गणित की कोई संकल्पना उसी समय हटायी जा सकती है जब कोई विरोधाभास उसका रास्ता रोक दे। और उपरोक्त संकल्पना के लिए कोई विरोधाभास नहीं मिलता। तो फिर कान्टीनुअस क्या है वास्तविक रूप में?


अगर हम अल्लाह का वजूद मान लें तो उसी के बारे में यह गुण प्रभावी है कि अल्लाह हर जगंह है। कोई जगंह उससे खाली नहीं है। किसी भी प्रकार की असंतता में जगहें खाली बच जाती है। इसलिए हम अल्लाह का यह गुण उसी समय ले सकते हैं जब वह कान्टीनुअस हो। इस तरंह एकमात्र हस्ती जो कान्टीनुअस, सर्वत्र हर जगंह है, वह है अल्लाह का वजूद। इस वजूद के अलावा सब कुछ असंतत है। अल्लाह के वजूद को मानकर ही गणित की उपरोक्त संकल्पना को वास्तविक रूप में साकार किया जा सकता है।


गणित का हर नियम, हर समीकरण का एक विस्तारित रूप (Generalization) होता है। यूक्लिड ने प्रारम्भ में जिस ज्यामिति की रचना की वह दो विमाओं (two dimensional) की ज्यामिति थी, जिसमें कोई रचना एक समतल पर की जाती थी। इस ज्यामिति को विस्तार दिया गया और फिर बनी त्रिविमीय ज्यामिति। इसका और विस्तारित रूप चार विमीय और फिर एन (N) डाइमेंशन के रूप में आया। जहां एन कोई भी प्राकृतिक संख्या हो सकती है। हम जिस ब्रह्माण्ड में निवास कर रहे हैं वह चार डाइमेंशन का है। और ये चार विमाएं लम्बाई, चौड़ाई, ऊंचाई और समय की हैं। जब किसी सिस्टम की डाइमेंशन बढ़ायी जाती है तो सिस्टम की रचनाओं का भी विस्तारित रूप हो जाता है। उदाहरण के लिए द्विविमीय रेखा तीन विमाओं में समतल का रूप धारण कर लेती है। दो विमाओं का इलिप्स तीन विमाओं में इलिप्सॉयड बन जाता है।


जैसे जैसे विमाएं बढ़ती हैं ये आकृतियां और जटिल होती जाती हैं। यह सृष्टि, इसका आकार सीमित है। स्पष्ट है कि इसके डाइमेंशन भी सीमित होंगे। अगर गणितीय रूप में देखा जाये तो डाइमेंशन असीमित भी हो सकते हैं। स्पष्ट है कि असीमित डाइमेंशन की कोई रचना भी असीमित जटिलता की होगी। अब यहां कई सम्भावनाएं हो सकती हैं। पहली ये कि असीमित डाइमेंशन का कोई वजूद नहीं। अगर इस सम्भावना को सत्य माना जाये तो हमारा ये नियम फेल हो जायेगा कि गणित के प्रत्येक नियम का वास्तविक रूप में वजूद है। इसलिए दूसरी संभावना है कि असीमित डाइमेंशन का वजूद सच है मानी जाये। यह व्यवस्था तभी संभव है जब उस असीमित डाइमेंशन से मुताल्लिक कोई वजूद हो।


सवाल उठता है कि असीमित डाइमेंशन से मुताल्लिक किसका वजूद हो सकता है? तो जाहिर है हम इस वजूद को आकारयुक्त नहीं मान सकते। क्योंकि उस अवस्था में असीमित डाइमेंशन का असीमित आकार पूरी सृष्टि को नष्ट कर देगा। यानि वह असीमित वजूद निराकार है और असीमित ज्ञान, शक्ति और न्यायप्रियता से भरा हुआ है। इसी वजूद का नाम ही संभवत: अल्लाह है। यानि वह असीमित डाइमेंशन का स्वामी है।



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