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अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (अंतिम पार्ट-18)

सृष्टि के मैदान में खुदा की निशानियाँ

गणितीय पथ पर विचार करने के पश्चात अब हम सृष्टि के मैदान में अल्लाह के वजूद की निशानियों की तलाश करेंगे। इसके लिए इस तरंह का अध्ययन करना होगा कि क्या सृष्टि का निर्माण, मानव और दूसरे प्राणियों की उत्पत्ति संयोगवश हुई है या किन्हीं खास प्रकार की घटनाओं के क्रम में? आज दूसरे प्राणियों के साथ अस्तित्व में आये मानव को जीवित रखने के लिए पृथ्वी का जो पर्यावरण है उसके अनुरूप मानव ने अपने को ढाला है या पर्यावरण स्वयं ऐसे रूप में ढला है जो मानव को जीवित रखने के लिए आवश्यक है। यह समस्त विवेचन अवश्य ही हमें अल्लाह के वजूद की सच्चायी की ओर मोड़ देगा।



मानव का वजूद जिन बातों पर निर्भर करता है और साथ साथ सृष्टि का वजूद, उन बातों की एक लम्बी चौड़ी लिस्ट है। मनुष्य के अस्तित्व के लिए कार्बन, हाईड्रोजन और आक्सीजन जरूरी है तथा बहुत कम मात्रा में लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस आदि चाहिए। साथ ही कुछ का अनुपस्थित होना भी जरूरी है। जैसे हमें मीथेन, सल्फर डाई आक्साइड या अमोनिया का वायुमण्डल नहीं चाहिए, जैसा कि सौरमंडल के दूसरे ग्रहों पर है। साथ ही ग्रह का तापमान एक निश्चित सीमा में बना रहना चाहिए वरना हमारे शरीर की जैव रासायनिक प्रक्रियाएं नहीं चल पायेंगी।


तापमान के संतुलन के लिए ग्रह को एक समान ऊर्जा देने वाला तारा चाहिए। ऐसा तारा जिसका जीवनकाल काफी लम्बा हो और वह बिना उतार चढ़ाव के ग्रह को नियमित रूप से ऊर्जा दे। इसके लिए ग्रह की कक्षा भी दीर्घवृत्त न होकर वृत्ताकार होनी चाहिए। ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण इतना होना चाहिए कि वह वायुमंडल को बांधकर रख सके। लेकिन यह गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा भी नहीं होना चाहिए कि चलने फिरने में हडि्‌डयां टूटने की नौबत आ जाये।


हमारी पृथ्वी और सूर्य इन सब शर्तों को बखूबी पूरा करते हैं इसलिए यहां हमारा और दूसरे प्राणियों का वजूद है। क्या ऐसा नहीं लगता कि किसी ने अपनी कुदरत से पृथ्वी को हम सब लोगों के निवास के काबिल बनाया? ऐसी पृथ्वी, जहां बहुत सी सुविधाएं हमें प्राप्त हैं। उदाहरण के लिए वाह्य वायुमंडल में उपस्थित ओजोन की परत सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से हमारी रक्षा करती है। पृथ्वी पर शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र इस पर मौजूद प्राणियों की कास्मिक किरणों और सबएटामिक पार्टिकिल्स की बमबारी से बचाता है।


इसी तरंह आम नियम है कि ताप घटने के साथ साथ द्रव का घनत्व बढता है और जब वह ठोस में बदलने लगता है तो उसका घनत्व द्रव रूप की अपेक्षा कम हो जाता है और भारी होकर वह द्रव की सतह में बैठ जाता है। लेकिन पानी इसका अपवाद है। ताप घटने पर इसका घनत्व पहले चार डिग्री सेण्टीग्रेड तक बढता है लेकिन ताप और कम होने पर इसका घनत्व फिर घटने लगता है। यही कारण है कि बर्फ पानी से हल्की होती है। पानी के इस गुण के कारण ठण्डे स्थानों में जब पूरा तालाब बर्फ में परिवर्तित हो जाता है तो नीचे की सतह पहले की तरंह द्रव रूप में रहती है और उसमें उपस्थित मछलियां अपना जीवन यापन करती रहती हैं।


पृथ्वी सूर्य से एक संतुलित दूरी पर स्थित है। अगर यह सूर्य के पास होती तो ज्वारीय बलों (Tidal Forces) के कारण इसकी घूर्णन गति समाप्त हो जाती। परिणाम यह होता कि ग्रह के एक पृष्ठ पर हमेशा दिन की अवस्था होती जबकि दूसरे पर रात की अवस्था। फलस्वरूप दोनों पृष्ठों पर तापमान चरम सीमा पर पहुंच जाता। और आखिर में एक तरफ पानी और वायुमण्डल समाप्त हो जाते जबकि दूसरी ताफ जमकर बर्फ में परिवर्तित हो जाते। स्पष्ट था कि फिर जीवन पनपने का कोई आसार ही नहीं रह जाता।


यहां पर लगता है कि पृथ्वी को जीवन क्षेत्र बनाने के लिए पूरी तरंह ‘सुविधायुक्त’ किया गया। और यह सब किसी शक्ति की सोच का परिणाम था। यहां पर कुछ लोग इस सोच को संकीर्ण बता सकते हैं। और इस सम्बन्ध में उनके पास कुछ दलीलें भी होंगी। मसलन ये कि अगर पृथ्वी पर इस रूप में वातावरण न होकर किसी और रूप में होता तो जीवधारी उसी रूप में अपने को ढाल लेते। गुरुत्व अधिक होगा तो जीवधारी भी मज़बूत होंगे। ओजोन परत न होती तो पराबैंगनी विकिरण को झेलने की शक्ति वाले प्राणी यहां पनप रहे होते। मीथेन के वायुमंडल में जीवधारियों की जैव रासायनिक क्रिया मीथेन की सहायता से चल सकती है। यानि परिवेश बदलने पर जीवधारी भी उसी के अनुरूप ढल जाते।


इसके उदाहरण भी हम अपनी पृथ्वी पर देखा करते हैं। चाहे तपते रेगिस्तान हों, हिमाच्छादित आर्कटिक प्रदेश, अफ्रीका या साउथ अमेरिका के घने जंगल हों या समुन्द्र की तलहटी के उच्च दबाव वाले क्षेत्र, हर जगंह जीवधारी मिल जाते हैं जो अपने अपने संसार में संतुष्ट हैं और पनप रहे हैं।


लेकिन अगर यह मान लिया जाये कि जीवधारी वातावरण के अनुसार अपने को ढालने में सक्षम हो जाते हैं तो प्रश्न उठता है कि सौरमंडल के दूसरे ग्रहों पर फिर जीवन क्यों नहीं पनपा? इन दोनों बातों पर विचार करने के पश्चात यहां भी अल्लाह का वजूद सिद्ध हो जाता है कि अल्लाह ने हर तरंह के प्राणी सृजित किये हैं और उनके जीवन के लिए उन्हीं का परिवेश प्रदान किया जहां वे बिना किसी रुकावट के अपना जीवनयापन कर रहे हैं। अगर ये सब केवल संयोगवश होता तो एक के बाद एक आने वाली विपरीत परिस्थितियां या तो जीवन पनपने ही न देतीं और अगर पनपता भी तो कुछ समय बाद समाप्त हो जाता। रही बात प्राणियों द्वारा परिवेश के अनुसार अपने को ढालने की तो दूसरे ग्रहों पर भी जीवन पनपना चाहिए था।


ब्रह्माण्ड के जन्म की कहानी हमारी मान्यताओं को और दृढ़ रूप प्रदान कर देगी। वैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुसार आज से लगभग 15 से 20 खरब वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ था। स्पेस-टाइम की गणना भी उसी क्षण से आरम्भ होती है। ब्रह्माण्ड का समस्त पदार्थ, दिशाएँ (डाइमेंशन) व समय सभी उस क्षण एक बिन्दुवत (शून्य) अवस्था में थे। एक महाविस्फोट (बिग बैंग) के द्वारा यह अलग हुए। उसके बाद की अवस्था का अनुमान फन्डामेन्टल पर्टिकिल फिजिक्स और क्वांटम मैकेनिक्स की सहायता से लगाया गया। उस समय ब्रह्माण्ड की संरचना अत्यन्त जटिल थी जिससे आज जैसी सरल रचना वाले ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ। आज हम जिस ब्रह्माण्ड में रह रहे हैं उसका निर्माण भी अपने आप में आश्चर्य समेटे हुए है और यही लगता है मानो इस ब्रह्माण्ड का निर्माण किसी शक्ति ने मनुष्य और दूसरे प्राणियों की उत्पत्ति के लिए किया। निम्न पैरा में काफी कुछ स्पष्ट हो जायेगा।


ब्रह्माण्ड के शुरूआती एलीमेन्ट्‌स एक दूसरे से एकदम अलग थे। उनमें पारस्परिक सूचना का कोई आदान प्रदान नहीं हो रहा था। शुरूआती अवस्था में अगर वह ज़रा भी मार्ग से भटकते तो वह विचलन आज विशाल परिवर्तन ले आता। उदाहरण के लिए आज कास्मिक विकिरण का मान तीन डिग्री परम ताप है। ब्रह्माण्ड में अगर थोड़ी भी शुरूआती हलचल भिन्न होती तो इसी विकिरण का ताप हज़ारों लाखों गुना बढ़ जाता। गणना द्वारा यह ज्ञात किया गया है कि अगर कास्मिक विकिरण का प्रारम्भिक मान मात्र 100 डिग्री परम ताप ज्यादा होता तो पानी द्रव अवस्था में ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं पाया जाता। और पानी के अभाव में जीवन पनपने का प्रश्न ही नहीं था। इसी तरंह तापमान एक हजार डिग्री ज्यादा होता तो तारों का अस्तित्व संकट में पड़ जाता। ऐसे तीव्र विकिरण की उपस्थिति में गैलेक्सीज़ का वजूद मिट जाता।


यहां ये कहा जा सकता है कि अगर विकिरण उपरोक्त ताप पर होता तो हो सकता है कभी न कभी ब्रह्माण्ड के प्रसार द्वारा घट कर 3 डिग्री परम ताप पर पहुंच जाता, जैसा कि वर्तमान में है। लेकिन देखा गया है कि तापमान एक अरब वर्ष में अपने प्रारम्भिक ताप का आधा होता है। और यही तारों का जीवन काल होता है। स्पष्ट है कि जब जीवन के लिए आवश्यक विकिरण का ताप होता तब तक सारे तारे समाप्त हो चुके होते।


प्रारम्भिक ब्रह्माण्ड से वर्तमान ब्रह्माण्ड के विकसित होने के कई रास्ते थे। उन रास्तों में से सृष्टि ने अपने विकास के लिए वह रास्ता चुना जिसपर चलकर जीवन की उत्पत्ति हुई। हालांकि इस रास्ते के चुनने की संभावना जीरो थी। इस तरंह हमारा और दूसरे प्राणियों का अस्तित्व अनेक ऐसी घटनाओं का परिणाम है जिनके घटने की संभावना जीरो होते हुए भी वह घटी। उनके बारे में अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक हैरान रह जाते हैं यह क्रम देखकर, और जो आस्तिक होते हैं वे अनायास ही अपने अल्लाह के सामने नतमस्तक हो जाते हैं जो इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। वरना संभावना जीरो होते हुए अधिक से अधिक एक या दो घटनाएं संयोगवश घट सकती हैं। लेकिन घटनाओं का एक क्रम होना इस बात को सिद्ध करता है कि किसी महाशक्ति को यह सृष्टि रचनी थी। इसमें प्राणियों का वास कराना था, मानव जैसे बुद्धिमान प्राणी को जन्म देना था इसलिए उसने स्वयं उन घटनाओं का ताना बाना बुना।


कुछ वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड और मानव जन्म से सम्बंधित घटनाओं को देखकर एक नये सिद्धान्त पर भी विचार करने लगे हैं जिसे ‘एन्थ्रोपिक प्रिन्सिपल’ का नाम दिया गया है। इस सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड का वर्तमान स्वरूप इसलिए है कि मानव जन्म के लिए ऐसा होना आवश्यक था। यह सृष्टि मानव के लिए बनी है अत: शुरू से आज तक घटी प्रत्येक घटना उद्देश्यपूर्ण थी, पूर्व निर्धारित थी। पूरे घटनाक्रम का केवल एक उद्देश्य था कि एक ऐसे ब्रह्माण्ड को जन्म देना जो ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करे जिससे मानव जन्म ले सके। इस तरंह मानव ब्रह्माण्ड के जन्म का कारण है। अब कई धर्मग्रन्थों में भी इस तरंह के कथन आ चुके हैं जिसमें अल्लाह कहता है कि उसने पूरी कायनात इंसान के लिए बनायी, और इंसान को इसलिए बनाया ताकि वह उसे पहचान कर उसकी इबादत करे।


इसी तरंह ब्रह्माण्ड आज जिस रूप में हैं। चार मूल बलों से बंधे हुए तारे, ग्रह, मण्डल तथा उन्हीं की सूक्ष्म कलाकारी के रूप में परमाणु, इलेक्ट्रान, प्रोटान इत्यादि जो भौतिक नियमों से बंधकर अपने स्थान पर गति करते हुए अपना कार्य कर रहे हैं। यदि इनमें से एक भी अपनी धुरी से हट जाये तो उससे सम्बंधित एक बड़ा सिस्टम तहस नहस हो जाये। लेकिन ऐसा कभी नहीं होता और यहां पर लगता है मानो इन भौतिक नियमों को एक ऐसी महाशक्ति ने बनाया है जो ज्ञान में अपनी मिसाल आप है।


अनेक छोटे बड़े नियम और सिद्धान्त जिन्हें प्रकृति के नियम कहा जाता है, अत्यधिक जटिल ये नियम बिना किसी दिशा देने वाले के स्वयं कैसे बन सकते हैं? प्रकृति का मतलब क्या है? प्रकृति का जन्म कैसे हुआ? अगर इन सवालों पर विचार के लिए वैज्ञानिक अपने मस्तिष्क के द्वारों को खोल दें तो साइंस की नवीन शाखाओं का विस्तार तथा विकास हो सकता है।


आज ज़रूरत इस बात की है कि आधुनिक विज्ञान को पदार्थ तथा ऊर्जा पर चिंतन करने के अलावा उस महाशक्ति पर भी अपनी सोच के दरवाजों को खोल देना चाहिए जिसे धर्मों ने ईश्वर, गॉड या खुदा का नाम दिया है। शायद तब विज्ञान भौतिकवाद, विनाशकारी आविष्कारों तथ प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ से उबर कर सही रूप में मानव जाति बल्कि समस्त जीवधारियों के कल्याण के लिए कार्य कर सकेगा।


----समाप्त----



पिछला भाग
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4 comments: Leave Your Comments

  1. जीशान जी,

    Chaos Theory के बारे मे आप क्या सोचते है ?

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  2. जीशान भाई, बहुत ही बेहतरीन जानकारियाँ दी आपने इस सीरीज में.... ज़बरदस्त मेहनत की है आपने....

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  3. Nice Post!!!


    http://www.answering-christianity.com

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  4. Alhamdilillah u did superb job bhai Allah apko iski jaja de maine ye sare post apni timeline pe dala hai

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