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इस्लाम को हिंसक बनाना चाहते हैं लालची लोग - मौलाना वहीदुद्दीन खान

प्रसिद्ध इस्लामी बुद्धिजीवी मौलाना वहीदुद्दीन खान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनके संदेशों में शांति को प्राथमिकता दी जाती है। यही कारण है कि जब अयोध्या में विवादित ढांचे के ध्वस्तीकरण को लेकर पूरे देश में तूफान मचा हुआ था और लगभग सभी मुसलमान नेता गुस्से में तमतमा रहे थे तब उनका बहुत सुलझा हुआ बयान आया था। उन्होंने कहा था कि हमें अतीत पर आंसू बहाने की बजाय भविष्य की ओर देखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि दु:ख पहुंचाने वाली बातों को भूलने की आदत डालनी चाहिए।

इसी प्रकार, अफ़ग़ानिस्तान में इस्लाम के नाम पर सक्रिय संगठन तालिबान का विरोध आम तौर पर अब हो रहा है, लेकिन मौलाना वहीदुद्दीन खान ने 1996 में ही इस संगठन को रद्द कर दिया था और स्पष्ट शब्दों में कहा था कि तालिबान की ओर से जो कुछ हो रहा है उसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है। मौलाना वहीदुद्दीन खान ने अपनी नई किताब द प्रोफिट ऑफ पीस द्वारा एक बार फिर इस्लाम के वास्तविक संदेश को पेश करने की उत्साहवर्धक कोशिश की है। इसमें साफ कहा गया है कि तालिबान या इस प्रकार के अन्य संगठनों की ओर से जो कुछ किया जा रहा है उसका इस्लाम से कुछ लेना देना नहीं है। पैगम्बर-ए-इस्लाम मोहम्मद (स.) शांति का संदेश लेकर आए थे, प्रारम्भिक इस्लाम के शब्दकोश में हिंसा शब्द है ही नहीं। बाद में कुछ लोगों ने अपने हित के लिए हिंसा को इस्लाम से जोड़कर उसे इसका हिस्सा बना दिया।

मौलाना कहते हैं कि हिंसा द्वारा दुनिया में इस्लामी शासन लाने की कोशिश खतरनाक है। लेखक ने कुरान और हदीस के हवाले से इस्लाम को शांति का धर्म करार देते हुए कहा है कि मुसलमान वह है जिसकी जुबान और हाथ से लोग सुरक्षित रहें। आतंकवाद को राजनीतिक इस्लाम का अंग करार देते हुए मौलाना कहते हैं कि पश्चिम से सत्ता समाप्त होने के बाद एक वर्ग घुटन महसूस करने लगा और वह वर्ग विशेषकर अरब दुनिया इस दुख को बर्दाश्त न कर सकी और दोबारा सत्ता हासिल करने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया। 19वीं शताब्दी में जमालुद्दीन अफ़गानी ने कट्टरपंथी इस्लाम का नज़रिया पेश किया जिसके बाद इस्लामी आंदोलनों का तांता लग गया।

मौलाना उग्र आंदोलनों को गुमराह करने वाले बताते हुए लिखते हैं कि वास्तविक इस्लामी आंदोलन वही हो सकता है जिसमें हिंसा का कोई स्थान न हो। पैगम्बर-ए-इस्लाम के शांतिप्रिय होने का उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने लिखा है कि मक्का पर विजय के बाद मोहम्मद साहब ने उन सब लोगों को माफ कर दिया था जिन्होंने उन्हें और उनके साथियों को काफी दु:ख पहुंचाया था। उनमें वह व्यक्ति भी था जिसने उनके चाचा हज़रत हमज़ा को शहीद किया था। मौलाना के अनुसार इस्लाम को समझने के लिए कुरान और हदीस पढ़ना चाहिए। उन लोगों पर ध्यान नहीं देना चाहिए जो इस्लाम की बदनामी के जि़म्मेदार हैं।


साभार: प्रेसनोट डोट इन

6 comments: Leave Your Comments

  1. डॉ. अयाज़ अहमदMay 28, 2011 at 9:20 AM

    अच्छी पोस्ट

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  2. "....इसी बीच दो और बुद्धिजीवी सैयद कुतुब और सैयद अबुल आला मौदूदी के रूप में सामने आ गए। सैयद कुतुब ने मिस्त्र में 1928 में मुस्लिम ब्रदर हुड का गठन किया, तो मौलाना मौदूदी ने 1941 में लाहौर में जमात-ए-इस्लामी बनाई। मौलाना मौदूदी के मानने वालों ने भारत में स्टूडेंट इस्लामी मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का गठन किया। यह संगठन राजनीतिक थे, लेकिन उनकी ओर से विभिन्न देशों में इस्लाम का सहारा लेकर कट्टरपंथी इस्लाम पेश किया गया।..."

    Maulana Wahiduddin has written many good articles and his insights in religious matter are appreciable, but i differ from him strongly over his above statements. Establishment of Jamaat e Islami was not a result of any fanatic approach or to evoke any rigid Islamic mentality, but to represent Islam to people with sanity in way that intellectuals can understand. SIMI has never been a part of Jamaat e Islami. We can not blame Jamaat e Islami, if any other organisation which concerns Jamaat's values and shows its fanatic approach. Referring someone's literatures doesn't make a sense to be call him as his follower. A killer possessing Mahatma Gandhi's autobiography does not make him Mahatma..!

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  3. ‎"....इसी बीच दो और बुद्धिजीवी सैयद कुतुब और सैयद अबुल आला मौदूदी के रूप में सामने आ गए। सैयद कुतुब ने मिस्त्र में 1928 में मुस्लिम ब्रदर हुड का गठन किया, तो मौलाना मौदूदी ने 1941 में लाहौर में जमात-ए-इस्लामी बनाई। मौलाना मौदूदी के मानने वालों ने भारत में स्टूडेंट इस्लामी मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का गठन किया। यह संगठन राजनीतिक थे, लेकिन उनकी ओर से विभिन्न देशों में इस्लाम का सहारा लेकर कट्टरपंथी इस्लाम पेश किया गया।..."

    Maulana Wahiduddin has written many good articles and his insights in religious matter are appreciable, but i differ from him strongly over his above statements. Establishment of Jamaat e Islami was not a result of any fanatic approach or to evoke any rigid Islamic mentality, but to represent Islam to people with sanity in way that intellectuals can understand. SIMI has never been a part of Jamaat e Islami. We can not blame Jamaat e Islami, if any other organisation which concerns Jamaat's values and shows its fanatic approach. Referring someone's literatures doesn't make a sense to be call him as his follower. A killer possessing Mahatma Gandhi's autobiography does not make him Mahatma..!

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  4. पैगम्बर-ए-इस्लाम के शांतिप्रिय होने का उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने लिखा है कि मक्का पर विजय के बाद मोहम्मद साहब ने उन सब लोगों को माफ कर दिया था जिन्होंने उन्हें और उनके साथियों को काफी दु:ख पहुंचाया था
    .
    बेहतरीन मिसाल दी है. एक आँखें ख़ोल दे ने वाला लेख़

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  5. Excellent post! I wish Maulana saab's voice reaches the whole world and open eyes of the ignorant people.

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