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इस्लाम का इतिहास

आमतौर पर यह समझा जाता है कि इस्लाम 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके ‘प्रवर्तक’ पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) हैं। लेकिन वास्तव में इस्लाम 1400 वर्षों से काफ़ी पुराना धर्म है; उतना ही पुराना जितना धरती पर स्वयं मानवजाति का इतिहास और हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) इसके प्रवर्तक (Founder) नहीं, बल्कि इसके आह्वाहक हैं। आपका काम उसी चिरकालीन / सनातन धर्म की ओर, जो सत्यधर्म के रूप में आदिकाल से ‘एक’ ही रहा है, लोगों को बुलाने, आमंत्रित करने और स्वीकार करने के आह्वान का था। आपका मिशन, इसी मौलिक मानव धर्म को इसकी पूर्णता के साथ स्थापित कर देना था ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यावहारिक रूप साक्षात् रूप में आ जाए।


इस्लाम का इतिहास जानने का अस्ल माध्यम स्वयं इस्लाम का मूल ग्रंथ ‘क़ुरआन’ है। और क़ुरआन, इस्लाम का आरंभ प्रथम  मनुष्य ‘आदम’ से होने का ज़िक्र करता है। इस्लाम धर्म के अनुयायियों के लिए क़ुरआन ने ‘मुस्लिम’ शब्द का प्रयोग हज़रत इबराहीम (अलैहि॰) के लिए किया है जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व एक महान पैग़म्बर (सन्देष्टा) हुए थे। हज़रत आदम (अलैहि॰) से शुरू होकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) तक हज़ारों वर्षों पर फैले हुए इस्लामी इतिहास में असंख्य ईशसंदेष्टा ईश्वर के संदेश के साथ, ईश्वर द्वारा विभिन्न युगों और विभिन्न क़ौमों में नियुक्त किए जाते रहे। उनमें से 26 के नाम कु़रआन में आए हैं और बाक़ी के नामों का वर्णन नहीं किया गया है। इस अतिदीर्घ श्रृंखला में हर ईशसंदेष्टा ने जिस सत्यधर्म का आह्वान दिया वह ‘इस्लाम’ ही था; भले ही उसके नाम विभिन्न भाषाओं में विभिन्न रहे हों। बोलियों और भाषाओं के विकास का इतिहास चूंकि क़ुरआन ने बयान नहीं किया है इसलिए ‘इस्लाम’ के नाम विभिन्न युगों में क्या-क्या थे, यह ज्ञात नहीं है।


इस्लामी इतिहास के आदिकालीन होने की वास्तविकता समझने के लिए स्वयं ‘इस्लाम’ को समझ लेना आवश्यक है। इस्लाम क्या है, यह कुछ शैलियों में क़ुरआन के माध्यम से हमारे सामने आता है, जैसे:


1. इस्लाम, अवधारणा के स्तर पर ‘विशुद्ध एकेश्वरवाद’ का नाम है। यहां ‘विशुद्ध’ से अभिप्राय है: ईश्वर के व्यक्तित्व, उसकी सत्ता व प्रभुत्व, उसके अधिकारों (जैसे उपास्य व पूज्य होने के अधिकार आदि) में किसी अन्य का साझी न होना। विश्व का...बल्कि पूरे ब्रह्माण्ड और अपार सृष्टि का यह महत्वपूर्ण व महानतम सत्य मानवजाति की उत्पत्ति से लेकर उसके हज़ारों वर्षों के इतिहास के दौरान अपरिवर्तनीय, स्थायी और शाश्वत रहा है।


2. इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा’ और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है।


इस्लाम की वास्तविकता, एकेश्वरवाद की हक़ीक़त, इन्सानों से एकेश्वरवाद के तक़ाज़े, मनुष्य और ईश्वर  के बीच अपेक्षित संबंध, इस जीवन के पश्चात (मरणोपरांत) जीवन की वास्तविकता आदि जानना एक शान्तिमय, सफल तथा समस्याओं, विडम्बनाओं व त्रासदियों से रहित जीवन बिताने के लिए हर युग में अनिवार्य रहा है; अतः ईश्वर ने हर युग में अपने सन्देष्टा (ईशदूत, नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त करने (और उनमें से कुछ पर अपना ‘ईशग्रंथ’ अवतरित करने) का प्रावधान किया है। इस प्रक्रम का इतिहास, मानवजाति के पूरे इतिहास पर फैला हुआ है।


4. शब्द ‘धर्म’ (Religion) को, इस्लाम के लिए क़ुरआन ने शब्द ‘दीन’ से अभिव्यक्त किया है। क़ुरआन में कुछ ईशसन्देष्टाओं के हवाले से कहा गया है (42:13) कि ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे ‘दीन’ को स्थापित (क़ायम) करें और इसमें भेद पैदा न करें, इसे (अनेकानेक धर्मों के रूप में) टुकड़े-टुकड़े न करें।


इससे सिद्ध हुआ कि इस्लाम ‘दीन’ हमेशा से ही रहा है। उपरोक्त संदेष्टाओं में हज़रत नूह (Noah) का उल्लेख भी हुआ है और हज़रत नूह (अलैहि॰) मानवजाति के इतिहास के आरंभिक काल के ईशसन्देष्टा हैं। क़ुरआन की उपरोक्त आयत (42:13) से यह तथ्य सामने आता है कि अस्ल ‘दीन’ (इस्लाम) में भेद, अन्तर, विभाजन, फ़र्क़ आदि करना सत्य-विरोधी है-जैसा कि बाद के ज़मानों में ईशसन्देष्टाओं का आह्वान व शिक्षाएं भुलाकर, या उनमें फेरबदल, कमी-बेशी, परिवर्तन-संशोधन करके इन्सानों ने अनेक विचारधाराओं व मान्यताओं के अन्तर्गत ‘बहुत से धर्म’ बना लिए।


मानव प्रकृति प्रथम दिवस से आज तक एक ही रही है। उसकी मूल प्रवृत्तियों में तथा उसकी मौलिक आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक आवश्यकताओं में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। अतः मानव का मूल धर्म भी मानवजाति के पूरे इतिहास में उसकी प्रकृति व प्रवृत्ति के ठीक अनुकूल ही होना चाहिए। इस्लाम इस कसौटी पर पूरा और खरा उतरता है। इसकी मूल धारणाएं, शिक्षाएं, आदेश, नियम...सबके सब मनुष्य की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुकूल हैं।


अतः यही मानवजाति का आदिकालीन तथा शाश्वत धर्म है।


क़ुरआन ने कहीं भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल्-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात् अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक) आदि शब्दों से कराया है।


स्वयं पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्तक’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया। आप (सल्ल॰) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, मेरे (ईशदूतत्व) द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि आप (सल्ल॰) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और आप (सल्ल॰) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (श्रृंखला) का इतिहास।


यह ग़लतफ़हमी फैलने और फैलाने में, कि इस्लाम धर्म की उम्र कुल 1400 वर्ष है दो-ढाई सौ वर्ष पहले लगभग पूरी दुनिया पर छा जाने वाले यूरोपीय (विशेषतः ब्रिटिश) साम्राज्य की बड़ी भूमिका है। ये साम्राज्यी, जिस ईश-सन्देष्टा (पैग़म्बर) को मानते थे ख़ुद उसे ही अपने धर्म का प्रवर्तक बना दिया और उस पैग़म्बर के अस्ल ईश्वरीय धर्म को बिगाड़ कर, एक नया धर्म उसी पैग़म्बर के नाम पर बना दिया। (ऐसा इसलिए किया कि पैग़म्बर के आह्वाहित अस्ल ईश्वरीय धर्म के नियमों, आदेशों, नैतिक शिक्षाओं और हलाल-हराम के क़ानूनों की पकड़ (Grip) से स्वतंत्र हो जाना चाहते थे, अतः वे ऐसे ही हो भी गए।) यही दशा इस्लाम की भी हो जाए, इसके लिए उन्होंने इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म (Muhammadanism)’ का और मुस्लिमों को ‘मुहम्मडन्स (Muhammadans)’ का नाम दिया जिससे यह मान्यता बन जाए कि मुहम्मद ‘इस्लाम के प्रवर्तक (Founder)’ थे और इस प्रकार इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष पुराना है। न क़ुरआन में, न हदीसों (पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल॰ के कथनों) में, न इस्लामी इतिहास-साहित्य में, न अन्य इस्लामी साहित्य में...कहीं भी इस्लाम के लिए ‘मुहम्मडन-इज़्म’ शब्द और इस्लाम के अनुयायियों के लिए ‘मुहम्मडन’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, लेकिन साम्राज्यों की सत्ता-शक्ति, शैक्षणिक तंत्र और मिशनरी-तंत्र के विशाल व व्यापक उपकरण द्वारा, उपरोक्त मिथ्या धारणा प्रचलित कर दी गई।


भारत के बाशिन्दों में इस दुष्प्रचार का कुछ प्रभाव भी पड़ा, और वे भी इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म’ मान बैठे। ऐसा मानने में इस तथ्य का भी अपना योगदान रहा है कि यहां पहले से ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी, ‘‘बौद्ध धर्म’’ के; और महावीर जैन जी ‘‘जैन धर्म’’ के ‘प्रवर्तक’ के रूप में सर्वपरिचित थे। इन ‘धर्मों’ (वास्तव में ‘मतों’) का इतिहास लगभग पौने तीन हज़ार वर्ष पुराना है। इसी परिदृश्य में भारतवासियों में से कुछ ने पाश्चात्य साम्राज्यों की बातों (मुहम्मडन-इज़्म, और इस्लाम का इतिहास मात्र 1400 वर्ष की ग़लत अवधारणा) पर विश्वास कर लिया।



साभार: islamdharma.org

क्या शादी से पहले प्यार करना सही है?

क्या इस्लाम के अनुसार प्यार की कहानी के बाद की जाने वाली शादी अधिक ठीक है या वह शादी जिसे परिवार के लोग संगठित करते हैं ?

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

इस शादी का मामला इस आधार पर भिन्न होता है कि वह प्यार इस (शादी) से पूर्व कैसा था। यदि दोनों पक्षों के बीच जो प्यार था उसने अल्लाह तआला की शरीअत का उल्लंघन नहीं किया और दोनों साथी अवज्ञा (पाप) में नहीं पड़े; तो यह आशा की जाती है कि इस प्यार से निष्किर्षित होने वाली शादी अधिक स्थायी और स्थिर होगी; क्योंकि यह उन दोनों के एक दूसरे में रूचि रखने के नतीजे में हुई है।

यदि किसी आदमी का दिल किसी ऐसी औरत से लग जाये जिस से शादी करना उसके लिए जाइज़ है तो उसके लिए शादी के अलावा कोई अन्य समाधान नहीं है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: "प्रेमियों के लिए शादी के समान हमने कोई चीज़ नहीं देखी।" इसे इब्ने माजा (हदीस संख्या: 1847) ने रिवायत किया है, तथा बोसीरी ने इसे सहीह कहा है इसी तरह अल्बानी ने भी "अस्सिलसिला अस्सहीहा" (हदीस संख्या: 624) में इसे सहीह कहा है।

अल्लामा सिंधी कहते हैं -जैसा कि सुनन इब्ने माजा के हाशिया में है:

"आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के फरमान "प्रेमियों के लिए शादी के समान हमने कोई चीज़ नहीं देखी।" में "प्रेमियों" के शब्द में दो और दो से अधिक दोनों की संभावना है, और सका अर्थ यह है कि: जब दो के बीच प्रेम हो तो उस प्रेम को शादी के समान कोई अन्य संबंध न बढ़ा सकता है और न ही उसे सदैव बाक़ी रख सकता है, यदि उनके बीच उस प्रेम के साथ शादी भी हो जाये तो वह प्रेम प्रति दिन बढ़ता ही जायेगा और उसमें शक्ति पैदा होगी। (सिंधी की बात समाप्त हुई)

और यदि यह शादी अवैध प्रेम संबंध के परिणाम में हुई है जैसे कि उस प्रेम में मुलाक़ातें, एकांत (खल्वत) और चुंबन और इसके समान अन्य चीज़ें होती थीं, तो वह शादी स्थिर नहीं होगी ; इस कारण कि इन लोगों ने शरीअत का उल्लंघन किया है और उस पर अपने जीवन का आधार रखा है जिसके परिणामस्वरूप बर्कत (ईश्वरीय आशीर्वाद) और तौफीक़ में कमी हो सकती है। क्योंकि पाप इस का सबसे बड़ा कारण हैं, यद्यपि बहुत से लोगों को शैतान के आकर्षण से यह प्रतीक होता हैं कि प्रेम -जबकि उसमें शरीअत का उल्लंघन पाया जाता है- शादी को अधिक मज़बूत बनाता है।

फिर ये अवैध संबंध जो उन दोनों के बीच शादी से पूर्व स्थापित थे उन दोनों में से हर एक के दूसरे के बारे में संदेह करने का कारण बन सकते हैं, चुनाँचि पति सोचे गा कि हो सकता है कि उसकी पत्नी इस तरह के (अवैध) संबंध उसके अलावा किसी और के साथ भी रखती रही हो, यदि वह इस सोच को टाल देता है और इसे असंभव समझता है तो वह अपने बारे में सोचे गा कि उसके साथ ऐसा घटित हुआ है। बिल्कुल यही मामला पत्नी के साथ भी होगा, वह अपने पति के बारे में सोचे गी कि संभव है कि वह किसी अन्य महिला के साथ संबंध रखता हो, यदि वह इसे असंभव समझती है तो वह अपने बारे में सोचे गी कि उसके साथ ऐसा हुआ है।

इस तरह पति-पत्नी में से प्रत्येक संदेह, शक और बदगुमानी (अविश्वास) में जीवन व्यतीत करेंगे, और इसके परिणाम स्वरूप दोनों के बीच का रिश्ता जल्दी ही या बाद में नष्ट हो जाये गा। तथा संभव है कि पति अपनी पत्नी की निंदा करे कि उसने अपने लिए इस बात को स्वीकार कर लिया कि उसके साथ शादी से पहले संबंध बनाये, जिसके कारण उसे चोट और पीड़ा पहुँचे गी और उनके बीच का संबंध दुष्ट हो जायेगा।

इसलिए हमारे विचार में वह शादी जो शादी से पूर्व अवैध संबंध पर क़ायम होती है वह अक्सर स्थिर और सफल नहीं होती है।

जहाँ तक परिवार के लोगों (माता पिता) के चयन करने का प्रश्न है, तो वह न तो सब के सब अच्छी होती है और न ही सब के सब बुरी होती है। यदि माता पिता का चुनाव अच्छा है, और महिला धार्मिक और सुंदर है, और यह पति की पसंद के अनुकूल है और वह उस से शादी की इच्छा रखता है: तो आशा है कि उन दोनों की शादी स्थिर और सफल होगी। इसीलिए नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने शादी का प्रस्ताव देने वाले को वसीयत की है कि वह उस महिला को देख ले जिसे शादी का पैगाम दे रहा है। मुग़ीरा बिन शोअबा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि उन्हों ने एक औरत को शादी का पैगाम दिया तो इस पर नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: "तुम उसे देख लो क्योंकि यह इस बात के अधिक योग्य है कि तुम दोनों के बीच प्यार स्थायी बन जाये।’’ इस हदीस को तिर्मिज़ी (हदीस संख्या: 1087) ने रिवायत किया है और उसे हसन कहा है तथा नसाई (हदीस संख्या: 3235) ने रिवायत किया है।

इमाम तिर्मिज़ी ने फरमाया: नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के कथन "तुम्हारे बीच महब्बत पैदा होने के अधिक योग्य है।" का अर्थ यह है कि तुम दोनों के बीच महब्बत और प्यार के स्थायी होने के अधिक सम्भावना है।

यदि माता पिता ने अच्छा चुनाव नहीं किया है, या उन्हों ने चुनाव अच्छा किया परंतु पति उस पर सहमत नहीं है तो आम तौर पर इस शादी को असफलता और अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि जो चीज़ अरूचि और गैरदिल्चस्पी पर आधारित हो वह अक्सर स्थिर नहीं रहती है।

और अल्लाह सर्वशक्तिमान ही अधिक ज्ञान रखता है।




साभार: islam-qa.com

इस्लाम में मानवता, सौहार्द, नैतिकता, भाई-चारे की शिक्षा - डॉ कल्बे सादिक

कुछ दिनों पहले मेरा जाना बाराबंकी हुआ तो वहाँ जनाब रिजवान मुस्तफा के अनुरोध पे एक मजलिस  हुसैन (अ.स) को सुनने का मौक़ा मिला. अरविन्द विद्रोही जी भी वहाँ मजूद थे जिनको  मैंने  वहाँ बड़े ध्यान से
डॉ कल्बे सादिक को सुनते देखा था. आज उनका यह लेख देख के अच्छा लगा. पेश है अमन और शांति का पैग़ाम देता एक  बेहतरीन और इमानदारी से लिखा गया अरविन्द विद्रोही जी का  लेख - "मानवता-सौहार्द-नैतिकता-भाई चारे की शिक्षा देते संत - डॉ कल्बे सादिक"  ...एस एम मासूम


बाराबंकी के कर्बला में मजलिस ए गम में शामिल होने का निमंत्रण वरिष्ट पत्रकार रिजवान मुस्तफा के द्वारा  मुझे प्राप्त  हुआ तो अपने सामाजिक सरोकार व पत्रकारिता के धर्म का पालन करने हेतु मैं वहा पहुच गया | तक़रीबन दोपहर 12 बजे इस्लामिक - शिया धर्म गुरु  डॉ कल्बे सादिक समारोह स्थल पर आये, मंच पर आते ही उन्होंने उपस्थित जनों से मुखातिब होते हुए कार्यक्रम में देरी से आने के लिए माफ़ी मांगी | आज के दौर में जहा पर लोग अपनी बड़ी गलतियो पर सामाजिक-सार्वजनिक रूप से माफ़ी नहीं मांगते है, उस दौर में एक प्रख्यात हस्ती, एक धर्म गुरु द्वारा सामान्य जन से कार्यक्रम  के प्रारंभ में ना आ सकने की माफ़ी मांगना, यकीन मानिये  मैं तो हतप्रभ रह गया | और तो और देर से आने की पूर्व सूचना  भी धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने आयोजक रिजवान मुस्तफा को दे दी थी | उसके बाद भी माफ़ी | आह ! विनम्रता की प्रतिमूर्ति - तुझे मेरा प्रणाम, उसी पल मैंने मन ही मन उन्हें अपना अभिवादन प्रेषित किया | मुझे आभास हुआ की आज यह समारोह कुछ विशिष्ट सन्देश  प्राप्ति का स्थल बनेगा | अपने संबोधन में डॉ कल्बे सादिक ने धर्म क्या है, पर सरल व मृदु वचनों में कहा कि  धर्म  वो है जो आपको गलत रास्ते पर जाने से बचाए |

आज धर्म को बचाने की बात होती है, कोई इन्सान धर्म कैसे बचा सकता है? धर्म तो आपको बचाने, सही रास्ता दिखाने के लिए है | धर्म के नाम पर मतभेद ख़त्म करने की अपील करते हुए धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने कहा  कि आज यहाँ कर्बला में  शिया - सुन्नी, हिन्दू सभी धर्म के मानने वाले मौजूद है | मैं  हज़रत साहेब को मानने वालो से पूछना चाहता हूँ कि हज़रत साहेब  से जंग क्या हिन्दू ने लड़ी थी? बगैर ज्ञान के मनुष्य जानवर से भी बदतर  होता है | खुदा, परमेश्वर जो भी कहिये उसने सबसे बुद्धिमान मनुष्य को बनाया है और यह मनुष्य अपने कर्मो से अपने को सबसे नीचे गिरा लेता है | ज्ञान व विज्ञान इन्सान व  इस्लाम के फायदे के लिए है | ज्ञान हासिल करना नितांत जरुरी है | कई घटनाओ का हवाला देते हुए डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि जुल्म के खिलाफ  लड़ने वाला ही सच्चा मुसलमान होता है, जुल्म  करने वाला मुसलमान हो ही नहीं सकता | आतंकवाद के सवाल पर धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि मैं यह जिम्मेदारी लेता हूँ कि हज़रत मोहम्मद साहेब को मानने वाला कभी भी दहशत गर्त  हो ही नहीं सकता, जो दहशत गर्त  हैं और जो  बेगुनाहों का  खून बहाते है उनसे पूछा जाये यकीनन वो जुल्मी यजीद को मानने वाले ही होंगे | मोहम्मद साहेब को मानने वाला जुल्मी हो ही नहीं सकता | बहकावे और उकसाने वाली कार्यवाहियो से बचे रहने तथा अमन चैन की  पैरोकारी करने की अपील करते हुए डॉ कल्बे सादिक ने एक वाकया सुनाया | उन्होंने बताया की यह बात हज़रत साहेब के दौर की है |

एक अरबी उस मस्जिद में पाहुजा जिसे खुदा की इबादत के लिए रसूल ने अपने हाथो से तामीर की थी | उस अरबी ने मस्जिद में पेशाब करना शुरु कर दिया , वहा रसूल के साथ  मौजूद सेवक  ने उस अरबी को रोकना चाहा, रसूल ने सेवक से कहा - जरा ठहरो, उसे कर लेने दो पेशाब | वहा गन्दगी फैला कर वह  अरबी वापस चल दिया, अब रसूल ने कहा मस्जिद में जो गन्दगी इसने पेशाब करके फैलाई है, उसको पानी से धो कर साफ़ कर दो | खुद रसूल ने कई बाल्टी पानी डाल डाल कर वहा सफाई करवाई | अरबी वहा आया था खलल पैदा करने के मकसद से व मार पीट के इरादे से | रसूल के इस प्रकार के व्यव्हार से वह  अरबी भी रसूल का मुरीद हो गया | यह वाकया सुना कर डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि  यह है हज़रत मोहम्मद साहेब का चरित्र | इस क्षमा और विनम्रता की  राह पर चल कर रसूल ने इस्लाम को विस्तार दिया था और आज आप मुसलमान क्या कर रहे हो ? यह सोचिये... हिन्दुओ के त्यौहार होली में रंग अगर मस्जिद की दीवारों पर पड़ जाये तो आप उत्तेजित हो जाते हो | अरे.. होली का रंग तो पाक  होता है, दीवारों पर  चूना लगा कर दीवारों को फिर से चमका सकते हो लेकिन आप लोग तो इंसानों को चुना लगा सकते हो लेकिन मस्जिद की रंग लगी दीवारों पर चूना नहीं लगा सकते हो | इस्लाम  जुल्म के खिलाफ लड़ने का, आपसी भाईचारे का, विनम्रता का सन्देश देता है |

धर्मगुरु डॉ  कल्बे सादिक ने मुसलमानों से कहा कि  आप कि पहचान क्या है ? आज आप समाज में लम्बे कुरते, ऊँचे पायजामे, लम्बी दाढ़ी, टोपी से पहचाने जा रहे है | जिस जगह मीनारे, गुम्बद , मस्जिद होती है - लोग कहते है यहाँ मुसलमान रहते है | आज आपका बाहरी व्यक्तित्व  आपकी पहचान बन चुका है | इस्लाम व मुसलमान का वास्तविक रूप सामने लाने की जरुरत है | डॉ कल्बे सादिक ने बताया कि सही मायने में मुसलमान बस्ती वो है जहा पर कोई मांगने वाला ना हो सब देने वाले हो | मस्जिद खुदा का घर होता है | वह पाक जमीन पर बननी चाहिए | किसी दुसरे की जमीन पर  जुल्म जबरदस्ती के जोर से मस्जिद बनाने से वो खुदा का घर नहीं हो जाता | जुल्मी शासक  लोग धर्म का इस्तेमाल अपने गुनाहों और जुल्मो को छिपाने के लिए धर्म का बेजा इस्तेमाल करते रहे है | ऐसे जुल्मी कभी भी खुदा के बन्दे नहीं हो सकते | जनाब डॉ कल्बे सादिक ने इस पर भी एक वाकया सुनाया | उन्होंने कहा कि अगर एक जरुरत मंद का मकान बनवा दिया जाये तो खुदा उसको अपना आशियाना मानता है | जरुरतमंदो की मदद करना खुदा के बताये राह पर चलना है | नेक कामों से इस्लाम का विस्तार हुआ , आज नेकी की राह पर सभी को चलने की जरुरत है |

समाज में और विशेष कर मुसलमानों में शिक्षा की कमी पर धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने बार बार चिंता व्यक्त की | उन्होंने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद्  के नेता प्रवीण भाई तोगड़िया ने कहा है कि हर मस्जिद के बगल में मंदिर बनाया जायेगा, मैं उनसे अनुरोध करता हूँ कि वे हर मस्जिद के बगल में विद्या मंदिर की स्थापना जरुर करवा दे | जिससे हिन्दुओ के साथ साथ मुसलमान बच्चे भी शिक्षा ग्रहण करे और ज्ञान कि रौशनी में भारत की  तरक्की में अपना योगदान करे |

अंत में अपनी वाणी को विराम देने के पहले इस्लामिक शिया धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि बैगैर ज्ञान के इन्सान व देश - समाज की तरक्की नामुमकिन है | इसलिए ज्ञान हासिल कीजिये | समापन के अवसर पर कर्बला की जंग के वाकये को याद करते  व दिलाते हुए धर्म गुरु ने सवाल किया कि यह जंग क्या हिन्दुओ से लड़ी गयी थी ? अरे ..वो यजीद और उसके लोग थे, और वो भी पांचो वक़्त के नमाज़ी ही थे.. जिन्होंने रसूल के नवासे को प्यासा ही मार डाला था | यह बात जन समुदाय को उद्वेलित कर गयी | लोगो की सिसकियाँ  रुदन में तब्दील हो चुकी थी, इसी समय डॉ कल्बे सादिक ने कहा कि खुदा ना करे कभी ऐसा हो, लेकिन अगर कही फसाद हो जाये और आप मुसलमान किसी हिन्दू बस्ती में अपने परिवार व बच्चो के साथ पीने का पानी मांगोगे तो यह मेरा यकीन है कि हिन्दू फसाद भूल कर आपको अपने घर में पनाह देंगे, पानी - खाना देंगे, लेकिन इतिहास गवाह है कि उन यजीद के मानने वालो ने प्यासा ही मार डाला था | कर्बला का वह दर्दनाक मंज़र सुनकर रुदन कर रहे जन समुदाय का ह्रदय जुल्म के खिलाफ लड़कर शहीद हुए कर्बला के वीरो को अपने श्रधा सुमन अर्पित करने लगा था | इन्सान मात्र से प्रेम, शिक्षा ग्रहण करने की सलाह, जरुरत मंदों की मदद, अन्याय - जुल्म से लड़ने की सीख़ देते  हुए इस्लामिक शिया धर्म गुरु डॉ कल्बे सादिक ने  अपनी वाणी को विराम दिया



लेखक अरविंद विद्रोही

एक सामाजिक कार्यकर्ता और आज़ाद पत्रकारिता .गोरखपुर में जन्म, वर्तमान में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में निवास है। छात्र जीवन में छात्र नेता रहे हैं। वर्तमान में सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। डेलीन्यूज एक्टिविस्ट समेत इंटरनेट पर लेखन कार्य किया है तथा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा लगाया है। अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 1, अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 2 तथा आह शहीदों के नाम से तीन पुस्तकें प्रकाशित। ये तीनों पुस्तकें बाराबंकी के सभी विद्यालयों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुफ्त वितरित की गई हैं।

इंसाफ के दिन का इंतजार क्यों?

कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि ईश्वर 'इंसाफ के दिन' अर्थात 'क़यामत' का इंतजार क्यों करता है, आदमी इधर हलाक हुआ उधर उसका हिसाब करे.

अल्लाह ने इन्साफ का दिन तय किया, जहाँ वह सभी मनुष्यों को एक साथ इकठ्ठा करेगा ताकि इन्साफ सबके सामने हो। यह इसलिए भी हो सकता है, क्योंकि बहुत से पुन्य और पाप ऐसे होते हैं जिनका सम्बन्ध दुसरे व्यक्ति या व्यक्तियों से होता है. इसलिए "इन्साफ के दिन" उन सभी सम्बंधित लोगो का इकठ्ठा होना ज़रूरी है। जब इन्साफ होगा तब ईश्वर गवाह भी पेश करेगा, कई बार तो हमारे शरीर के अंग ही अच्छे-बुरे कर्मो के गवाह होंगे।

दूसरी बात यह है कि मनुष्य कुछ ऐसे कर्म भी करते हैं जिसका पाप या पुन्य बढ़ने का सिलसिला इस दुनिया के समाप्त होने तक बढ़ता रहेगा। जिस व्यक्ति ने कोई "गुनाह" पहली बार किया, उसने आने वाले समय के लिए उस गुनाह का रास्ता औरों को भी बता दिया। उस "गुनाह" को अमुक व्यक्ति कि बाद जितने भी लोग करते जाएँगे, उन सभी के पापो में उस पहले व्यक्ति की भी ज़िम्मेदारी बनती है, इसलिए उन लोगों के गुनाहों की सजा उस पहले व्यक्ति को भी होगी। जैसे कि जिस इंसान ने पहली बार किसी दुसरे इंसान की हत्या की होगी, तो उसके खाते में जितने भी इंसानों कि हत्या होगी उन सबका पाप लिखा जायेगा। क्योंकि उसने क़यामत तक के इंसानों को कुकर्म का एक नया रास्ता बताया.

इसे इस तरह समझा जा सकता है, मान लीजिये किसी व्यक्ति ने दुसरे व्यक्ति की हत्या के इरादे से किसी सड़क पर गड्ढा खोदा, उसमें वह व्यक्ति गिर कर मर गया। लेकिन गड्ढा कई सालों तक वहां बरकरार रहा और उसमें कई और व्यक्ति भी गिर कर मरे अथवा घायल हुए, इस स्तिथि में इस पाप के लिए केवल पहला ही नहीं बल्कि जितने व्यक्तियों की मृत्यु होगी अथवा घायल होंगे उन सभी का पाप गड्ढा खोदने वाले व्यक्ति के सर पर होगा। ऐसे ही अगर किसी ने कोई बुरा रास्ता किसी दुसरे व्यक्ति को दिखाया तो जब तक उस रास्ते पर चला जाता रहेगा, अर्थात दूसरा व्यक्ति तीसरे को, फिर दूसरा और तीसरा क्रमशः चौथे एवं पांचवे को तथा दूसरा, तीसरा, चौथा एवं पांचवा व्यक्ति मिलकर आगे जितने भी व्यक्तियों को पाप का रास्ता दिखाएंगे उसका पाप पहले व्यक्ति को भी मिलेगा, पहला व्यक्ति सभी के गलत राह पर चलने का जिम्मेदार होगा। क्योंकि उसी ने वह रास्ता दिखाया है, अगर वह बुराई की राह दुसरे को दिखता ही नहीं तो दुसरे, तीसरे, चौथे और इससे आगे के व्यक्तियों तक वह बुराई पहुँचती ही नहीं या कम से कम उसके ज़रिये तो नहीं पहुँचती। इस तरह इस ज़ंजीर में से जो भी व्यक्ति जानबूझ कर और लोगो को पाप के रास्ते पर डालेगा वह भी उससे आगे के सभी व्यक्तियों के पापो का पूरा-पूरा भागीदार होगा.

ठीक इसी तरह अगर कोई भलाई का काम करता है जैसे कि पानी पीने के लिए प्याऊ बनाया तो जब तक वह प्याऊ है, तब तक उसका पुन्य अमुक व्यक्ति को मिलता रहेगा, चाहे वह कब का मृत्यु को प्राप्त हो गया हो. या फिर कोई किसी एक व्यक्ति को भलाई की राह पर ले कर आया, तो जो व्यक्ति भलाई कि राह पर आया वह आगे जितने भी व्यक्तियों को भलाई कि राह पर लाया और अच्छे कार्य किये, उन सभी के अच्छे कार्यो का पुन्य पहले व्यक्ति को और साथ ही साथ सम्बंधित व्यक्तियों को भी पूरा पूरा मिलता रहेगा, यहाँ तक कि इस पृथ्वी के समाप्ति का दिन आ जाये.

इससे पता चलता है कि मृत्यु के बाद फ़ौरन हिसाब-किताब होना और उसका फल मिलना व्यवहारिक नहीं है, कर्मों का हिसाब करते समय अर्थात 'इंसाफ के दिन' धरती के आखिरी कुकर्म अथवा सुकर्म करने वाले की पेशी होना आवश्यक है.

अल्लाह इन्साफ के दिन पर कहता है:

"और हम वजनी, अच्छे न्यायपूर्ण कार्यो को इन्साफ के दिन (क़यामत) के लिए रख रहे हैं. फिर किसी व्यक्ति पर कुछ भी ज़ुल्म न होगा, यद्दपि वह (कर्म) राइ के दाने ही के बराबर हो, हम उसे ला उपस्थित करेंगे. और हिसाब करने के लिए हम काफी हैं. (21/47)"

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