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अल्लाह साकार है अथवा निराकार?

साकार या निराकार की अवधारणा की जगह, वह कुरआन में अपने बारे बताता है कि:


Say: He is Allah, the One and Only! Allah, the Eternal, Absolute; He begetteth not nor is He begotten. And there is none like unto Him. [112:1-4]


कहो: "वह अल्लाह यकता (अकेला ) है, अल्लाह निरपेक्ष (और सर्वाधार) है, न वह जनिता है और न जन्य (अर्थात न वह किसी का बाप / माँ है और न बेटा / बेटी), और न कोई उसका समकक्ष है.

ऊपर वर्णित 'सूराह इखलास' कुरआन की एक बहुत ही महत्वपूर्ण है सूराह है, क्योंकि यह ईश्वर की अखंडता (Tawhid) और बेनियाज़ / निरपेक्ष / असीमित प्रकृति की पहचान बताती है. इससे पता चलता है कि ईश्वर शाश्वत (अर्थात अनन्त / सार्वकालिक / सनातन) है. अर्थात, वह समय और स्थान की सीमा से परे है. वह (एक मां की तरह बच्चे को) जन्म नहीं देता है और न ही उसे किसी ने जन्म दिया है. और आखिरी श्लोक से पता चलता है कि जिस चीज़ की किसी से तुलना की जा सकती है वह ईश्वर नहीं हो सकता है.

इससे पता चलता है कि वह कुछ करने के लिए किसी चीज़ का मोहताज नहीं है, जैसे वह बोलने के लिए मुंह की आवश्यकता से परे है, क्योंकि किसी भी कार्य के लिए किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं है.  जब उसने दुनिया बनाने का फैसला किया तो कहा 'कुन' अर्थात 'हो जा' और वह 'फया कुन' अर्थात हो गई.

यहाँ यह भी जान लेना ज़रूरी है कि वह हमेशा ही हर एक कार्य को करने की पद्धति बनता है, यह उसका तरीका है, हालाँकि उस पद्धति का वह खुद भी मोहताज नहीं है. जैसे कि बच्चे को पैदा करने के लिए नर और नारी के मिलन को तरीका बनाया और पैदाइईश का समय तय किया, लेकिन वहीँ उसने 'ईसा मसीह' को बिना पिता के पैदा किया और पहले पुरुष को बिना माँ-बाप के पैदा किया. ऐसा इसलिए जिससे कि वह मनुष्यों को यह अहसास दिला सके कि बेनियाज़ है अर्थात संसार को चलाने के लिए पद्धति बनता अवश्य है लेकिन उस पद्धति का मोहताज नहीं है.

- Shahnawaz Siddiqui

2 comments: Leave Your Comments

  1. As salam alaykum,
    .....................................Mere Pyare Musalman Bhaiyon Aur baheno Plzzzzz Mughey Request Send Keje, Main Apne Zada Se Zada Bhaiyon Aur Behnon Se Friendship Karna chahti hun. Shukriya.................

    ReplyDelete
  2. क़ुरआन आदमी को जो मिशन देता है वह हक़ीक़त में कोई 'निज़ाम' (व्यवस्था) क़ायम करने का मिशन नहीं है। बल्कि अपने आपको क़ुरआनी किरदार की सूरत में ढालने का मिशन है, क़ुरआन का अस्ल मुखातब फ़र्द (व्यक्ति) है न कि समाज। इसलिए क़ुरआन का मिशन फ़र्द (व्यक्ति) पर जारी होता है न कि समाज पर।

    ताहम अफ़राद की क़ाबिले लिहाज़ तादाद जब अपने आपको क़ुरआन के मुताबिक़ ढालती है तो उसके समाजी नताइज भी लाज़िमन निकलना शुरू होते हैं। ये नताइज हमेशा एक जैसे नहीं होते बल्कि हालात के एतबार से इनकी सूरतें बदलती रहती हैं।

    क़ुरआन में विभिन्न नबियों के वाक़ियात इन्हीं समाजी नताइज या समाजी प्रतिक्रिया के विभिन्न नमूने हैं और अगर आदमी ने अपनी आँखें खोल रखी हों तो वह हर सूरतेहाल की बाबत क़ुरआन में रहनुमाई पाता चला जाता है। क़ुरआन फ़ितरते इंसानी(मानवीय प्राकृतिक स्वभाव) की किताब है। क़ुरआन को वही शख़्स ब.खूबी तौर पर समझ सकता है जिसके लिए क़ुरआन उसकी फ़ितरत का प्रतिरूप बन जाए।

    परिचय
    पवित्र क़ुरआन
    अनुवादक- मौलाना वहीदुद्दीन खाँ
    www.cpsglobal.org www.alrisala.org

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